Saturday, 18 December 2021

बाग बगीचे पीपल बरगद

बाग बगीचे पीपल बरगद 

ताल तलैयां नदियां झरने
चार चिरौंजी ही
नहिं होते
गांवों की पहचान !

सुबह सबेरे रंग विरंगी
फसल पुष्प की झली हवायें
सुरभित मौसम
प्रकृति गोद की
खेला खाया पला किसान!

लाल घड़े काले मटके का
ठंडा पानी
बौली कुआं कुआंरी कंधों
शीश मड़ाये घट पर घट
घैलों का छलका पानी,
झुकी आंख सीधी गर्दन
ठुमक चाल बधुओं के
भीगे घूंघट
झूमर झुमके रुनझुन पायल
खनक चूड़ियां रहट निशानी,

चुलबुल बिटिया चहके जैसे
चुलबुली चिरैया
बहु अबोली
सहे सास की जीभ कटारी
धरे जिया पूंजी अस म्यान !

मेलजोल भाई चारे का
सुखद आचरण
बांह बंदगी
खुशी गमी त्योहार पर्व की
भजन आरती का सहगान हिलोरा,
पूस माघ की ठंड कपाती
डिगला जैसी देह
रंगीला फागुन का मधुमास
पीटता
प्रेमालाप विरह का ढोल ढिढोरा,

नेह नयन अनुराग की
चित्त चितौनी
बेबोलों की नातेदारी
कुल गौरव की जीवित लज्जा
जिये छातियाँ तान !

आम बौर महुओं की बारिस
बरसज तेंदू बेर मुकैयां
गाय बैल
पशुओं के मेले
अनगिन हैं पहचान गांव की,
परिवर्तन क्या बदल सकेगा
घने वनों के चारागाह
खेत तरकारी
रूप प्रकृति का
छापें छोड़ शहर के पांव की,

आई गईं आंधियां कितनी
उड़े पैंतरे पाग
विरत भय अपने पाँव
अडिग
हिमालय सा है अपना हिंदुस्तान !

भोलानाथ

Thursday, 16 December 2021

कौन ककहरा सा गाता है

कौन ककहरा सा गाता है गीत यहां

चेहरा मोहरा
चमक मुखौटा चमकाने की
बेवजह रवायत
मुरदासंख लिपाई
लेप लपेटा धरती धरे न गोड़ !

नदिया के उस पार का धोबी भाई
गाये क ख ग घ अंगा
अखरा घोड़ पिठाहीं
लाद फ़ीन्च फ़रिहाव का माहिर
घाट घाट
चट्टान चढ़ाई का क्या जाने तोड़ !

बजती बीन के आगे नागिन नाच भरोसा
मजमा मौन टेढ़ अंगनाई
गेड़ी पाँव लड़ी घुंघरू की रुनझुन बाजे
मुरबा मुट्ठ उठाये
उंची उंची हांक
जमीनी दरख़्त को
माटी की महिमा समझाये,
पेट पीठ का पिटा जमूरा हूंके
हांक मदारी की सुन मुह की हूँकी
अन्तर्द्वन्दी लय की नाहीं
थिरकन पांव लचारी
लामबंद विपदाओं के
व्यूह घिरा अभिमन्यु जैसा
कौसल कौल रिझाये,

बिगुल फूंक सुन शोर
बजी रणभेरी का
एकतरफा युद्ध विराम
पाग विरत सिर झुके हुजूमों की
अगुआई फरमान
अथर्वा पियें पसीना बंडी बांह निचोड़ !

ओंठ अबाह खुली करियारी
लीद उठाते फोड़े मूंड़ उछाल दुलत्ती
मुट्ठी बांध कसे मुह जबड़े
पिछलगुआ अनुशरण न जाने
किस उपलब्धि के खातिर
दांत निपोर
नाद जयकारों के हिस्से हैं,
मौनी साधक सरबत बोरी गरू बयानी
करु बिक्ख मुह कान हरु
हुरहुर सी छौंक बघार
कचैंधी पेट गरू
अधपचे अम्ल की जलन
घरु उपचार निमौरी नीम गुरिच रस
जस नानी दादी के किस्से हैं,

रंगारंग रंगीले मुखड़े
चकाचौंध मशलों की
सांटा पलटी
चाल चरित चर्चा बाजारू
आन अहम पर उठती गिरती
साख राख सी अदब अदावट होड़!

हेलमेल आल्ह्वाद प्रेम के
नाड़ी नाद
उमड़ते स्वर मुह कान सुरों की तान
कंठ का कोयल जैसा गान
बगीचों बाग घनी अमराई
उपवन की मुस्कान 
तितिलिया शान दिखें न गुंजन भौरों के,
पके खेत खलिहान गडायन दांय
सजे सहगान
बैल के घंटे घुंघरू की पहचान
बरेदी बांस बंसुरिया
सधे न गीत रचाव
बुझक्कड़ रमी पहेली
शीशमहल से फेंके पत्थर घर औरों के,115

नई लकीरों के नव नामकरण
गुण गाथा में
तल्लीन विवेकी
वेद लवेद के विद्याधर हाथों की उठाधरी
काट रही है
जीवन रेखा अजब गजब गठजोड़ !

भोलानाथ








Thursday, 9 December 2021

नाम गांव अनजान पथिक पथ

नाम गांव अनजान पथिक पथ

ठंड ठिठुरती
दुस्वार हवा के झोंकों में
अलगा अंचरा देह छुपाती
सेंके धूप न देखे आँख
हवस अनजान गुजरिया!

क्षितिज का सूरज चुपके चुपके
सरग से झांके
जैसे कुंती का
अभिमंत्रित आवाहन
रात बेधरमी बांग से चांद न चूके
खोजे मौका इंद्र जबरिया !

भक्ति भाव की बही नदी की
लहर धार के सख्त थपेड़े सहन किये
बह निकली हरी दूब सी
अलट पलट पानी मंडराती
तट हिचकोलों की
अनुचित ठोकर खा खा कर के
तना जिया जड़ वक्ष समेटे,
काई कांदो लथपथ
भूखे भैंसों के
अलग अलग जत्थों की रेवड़
देख दूब की हरी लौचियाँ
छोड़ चरौखर छुट्टा चारागाह
थूथुनों लार नकौटी
नाक बहाये शील सिंगौटी मेटे,

मनुज असुर पशु देव समयगत
वसीभूत
वल्गाओं का सिरा न खींचा
मार ठहाका दुस्साशन सा
खीच रहा है शहर गांव
चौपाल चौतरा देह की फरिया !

कंधों कखरी माझा पीठ
मरोड़ी बांह कलाई
भीष्म देह सी बांण बिंधे तन
मन लिखे घाव की पीर असह
किन कापुरुषों के नाम उधारी
खाता बही बिसाद हृदय
रंजोगम के किस्से,

तार तार तन
सड़क चौराहे रेल भीड़ बस अड्डे
चीख सुने सब मरा संवेदन
कैद कैमरे में करने का कोतुहल
किसने कितने फुटेज बनाये
दृश्य बालाती
आया किसके कितना हिस्से,

गूंगी बहरी भीड़
देखती रही धृतराष्ट्र सभा सी
लुटती रही लाज
किरदार कृष्ण का नजर न आया
लाइव चलती रही तस्वीर
होती साझा रही खबरिया !

आईं गईं सल्तनत कितनी
मनोरंजन की स्क्रिप्ट केंद्र में
अबला जीती रही उत्कृष्ट नरक के
नये नये निर्मित
दारुण दुख के दालिद सोपान
कहे किस मौसी से
जलती आग की रोज कहानी,
आते जाते अगल बगल से
कान फब्तियां कटु मस्काने
दे रहीं हिदायत आगी एसिड की
दहशत से थर थर कांपे पांव
चांद सा सुघर सलोना मुखड़ा
हाथ छुपाये
रोज रोज मर रही जवानी,

अँधाखुक्क हदों के बंद किवाड़े
झूठ मूठ उजियारी के
कथा बांचते थकें न अंधे
कोतवाली की रपट रसायन
परख कचहरी
पलटी साक्ष्य लबरिया !

भोलानाथ

Friday, 3 December 2021

कोप भवन में बैठी बहु सा

कोपभवन में बैठी 

बहु सा 

व्यथित विपक्ष 

क्रोध की आग में 

मुह वाणी की 

फोरी लाई परछी फरका डारै। 


रीत रिवाज 

सास की समझाइश 

संदर्भ सगुन के 

सीख सुनै न 

ससुर की बंडी 

चूल्हा चिल्फी लकड़ी जैसे बारै। 


धूप 

देवालय की सुलगन का 

उठता धुआं 

दिखा दुनिया को 

ज्वालामुखी की आड़ में 

गाय गली 

रिछवा सा खूब नचावे,

लिसक नाच सम्मोहन के 

मंत्रोत्चारी 

विविध प्रयोगों का 

लय लहजा 

अंगुलियों घेर 

परिधि के 

बाहर डमरू शंख बजावे, 


झरे बाल 

कंघी के काढ़े 

भर ताबीज़ तैंतियाँ 

नरक भोगती 

भावुक रूह को 

वैतरणी के पार उतारै ! 


चढ़ते सूरज की गति 

आँख दिखे न 

सोन सुनहरी धूप को 

टूटी 

बिखरी घिसी पिटी 

ओजोन परत का 

मलबा बरसात बतावे,

पास पड़ोसी की 

पुस्तक से 

उल्टी गिनती कटा ककहरा 

आड़ी आयत 

फ़टे पेज का 

मार के रट्टा 

रामायण समझावे, 


निजपांव दौड़ती 

नेत नियति के 

पदचिन्हों की 

पुख्ता छाप में 

ओध अंगौछा 

बसन मुरेर निचोय निथारै । 


अर्ध चढ़ा 

माटी का तिलक किये 

जजबात के 

बहके जहन नहीं 

हैं बुद्धि विवेक के 

विश्लेषक 

उत्तम उन्नायक सत्कर्मों के,

पल दो पल ही सही 

जी लेते 

नीति निभा लेते 

सच्चाई 

साथ साथ चल लेते 

बहती विपरीत 

हवा अंधड़ अपकर्मों के, 


डायन डाह अहम में 

चूर 

जेठानी का किरदार 

अटारी 

ठाठ पटौती की 

बोई गाजर मूली रोज उखारै । 


भोलानाथ

Sunday, 28 November 2021

धीरे धीरे उत्तर रही मेंहदी सी

धीरे धीरे उतर रही मेंहदी सी 

मन महक
पनीली आंखों को
लांपों का
बहुत बड़ा विस्तार मिला ।

लंबी दौड़ तितिलियों की
ले भागी खुश्बू
भोगे
दर्द दरारों टूट फूट
दीवार का नातेदार किला ।

तितली का क्या
लेना देना
फूल कली पंखुरियों के
चौगिरदा चकरघिन्नयां
प्रेम अलापी गुंजन से,
रहवासी हों भले
एक फुलवारी के
मकरंद की प्यासी आंखें
फूटें
आंजत आंजत अंजन से,

हेलमेल दुस्वारी से
उजड़ा उजड़ा
मुरझाया अधमरा सा
लगता है उपवन का
रंग विरंगा फूल खिला ।

भरी नदी तालाब तराई
बैर बहाव मछलियों का
साथ साथ
पानी में रहकर
बैरी मंगरा न जाने,
भर भर मुट्ठी
चटपट चारा डार हितैषी
मछुआरे फेंकें जाल
घुमाकर
जाती नस्ल सबकी पहिचाने,

झांसों से अंजान मछलियां
बने निवाला
धोये धीवर धार रगड़ कर
खाल उतारे
पुच्छी मूंड़ हिला ।

सुख दुख हर्ष पर्व के
पावन संगम में
यदि जाति धर्म का जहर
शिलौंटी घिस घिस
घाट घाट न घोला जाता,
कई कई धाराओं का
दहिया महिया
ताल तलैया भांडर पानी
मशक कठौती
रह कर अमृत हो जाता, 

नहीं हेरते हाथी हेराया
औंचक भौंचक
कोठी कुठिला
औना गोड़ बखारी
हाथ डार दीवार बिला ।

भोलानाथ

Friday, 26 November 2021

देश जले न

देश जले न 

इसीलिये खुद

जानबूझ मुहभरा गिरा है 

हवनकुंड की आग में राजा

देश धर्म दोनों बच जायें । 


राजधर्म अभिमान रहे

जितना चाहे

धुआं उठे नभ

पेट पिठाहीं पड़ें फफोले

दाढ़ी मूछ भले जल जायें ! 


वेद विशारद अपने अपने 

विज्ञापन के रंग विरंगे 

पर्चे पोस्टर 

लिख दीवारों में 

जैसा चाहें चिपकायें,

हाथी हौदों नगर भ्रमण में 

काट गये कुत्तों को 

नाहर की संज्ञा दे 

जोग जोगड़िया 

गुर हांका के सिखलायें, 


क्या खोया क्या पाया 

हानि लाभ का जोड़ घटाना 

स्लेटों में लिख लिख 

गली मोहल्लों 

रैयत को समझायें । 


खैनी खा कर सूरज पर 

पिच्च पिच्च पिचकारी 

थूक की मार रहे जो 

गम्मत रम्मत फगुआ की 

निज मुख पर ही होना है,

रात पहर अंत्योदय के 

हुहा हुहा कर

पहचान बता दी 

रंगे सियार के किरदारों ने 

फिर चेहरे क्या धोना है,


बंद कराये क्यों कर 

गाल के बाजा 

राजा को चिंता है जन जन की 

पगडंडी के पग 

कैसे सड़कों पर लायें ! 


मील का पत्थर 

पढ़ पढ़ 

मंजिल से निश्चिंत मुसाफिर 

पहुंच पंथ के पन्नी पुट्ठे 

चुन चुन कर घूरों में फेंक रहे,

जगह जगह जलते अलाव 

घेर कर

अलग अलहदा मंतव्यों के 

जन जन जलती आग में 

हाथ उंगलियां सेंक रहे, 


घर की टूटी ठाठ कोरैयां 

पास पड़ोस से मिल कर 

पत्थरबाज 

हेडियों की हेठी का 

साहस खूब बढ़ायें । 


भोलानाथ

चिट्ठी पत्री

चिट्ठी पत्री 

डाक डाकिया पत्र तार संदेशों के
दिन रहे नहीं
समय है अब तो
मैसेज
मेल मिलन लाइव बतियाने का ।

बीते समय की
चिन्दी चिन्दी
वर्तमान का सूत सिये क्यों
कथरी गोदरी
सहज है
रेडीमेड विलास वस्तु ले आने का ।

खोंपा फेंक कंकड़ियों के
संकेतों का
आनंद निराला
रहे न कोतुहल
प्रेमालिंगन के वाजिब हिस्से,
लिखना
पढ़ना प्रेम पत्र का
बंद किताबों की
क्षेपक सी दबी चिट्ठियों के
संवेदित दिन
हो गये कहानी किस्से,

जीवन जितना सरल हुआ
भाग दौड़ का बढ़ रहा दायरा
कठिन बहुत है
मुह उमेठ
पलकें
झपकाकर घरी घरी इतराने का ।

बचत समय की
बहुत हुई
कर ली मुट्ठी में
दुनिया भर की
सारी क्रिया कलापें
जैसे चाहें वैसे भोगें,
पूंछ परख अनुनय अनुमति
हद बंदिश की
सीमायें टूटीं
बेदाग
बगुलिया रंगत बाहर
भीतर सौ सौ योगें,

उड़ती साँझ गौधूलि की
खटिया मचवा
फरका परछी परकोठों की
लुकाछिपी के
खेल उजड़ गये
शेष शहर शामियाने का ।

तारीफों के गुर गौरव
चिट्ठी के
अब अंश नहीं
मैसेज किये प्रश्नपत्र के
उत्तर नहीं
परिणामों का मेल मिले,
सुबह सुबेरे सुर्ख सुर्खियां
अखबारों की
पढ़ते पढ़ते
चाय की
चुस्की ओंठ से छूटे
कांपे हाथ गिलास हिले,

बदले युग में गारंटी वॉरंटी
नहीं किसी की
यूज थुरु का चलन
हुआ
स्वीकार सभी को

नहीं गिला गम गुठियाने का ।

भोलानाथ 

Wednesday, 24 November 2021

कब मुखर हुआ जग

 

कब मुखर हुआ जग
देख दहन दर
अंधा गूंगा
चूहों जैसा बिल में छुपा रहा ।

लुटती रही भूमि राम की
पके कान
उपदेश कृष्ण का
चौमासों की बाढ़ बहा !

मरे हुये हाथी के
टूटे हौदों से
अकबरी सल्तनत का
रक्तिम इतिहास
चुनौती देने
फिर बंदूकें तान खड़ा,
ध्वस्त
तरासी बुद्ध की प्रतिमा
बैशाली के
शिलालेख संदेश मिटाने
उन्माद बाबरी
जिद पर अपने आज अड़ा,

दो जीभ एक मुह
कब बोलेंगी
रक्तपात का आलम
जाता नहिं अब और सहा !

तोप तमंचा बारूदी बम
गोलों की गंध बराबर
नथुनों में
पीढ़ी दर पीढ़ी
साजिश
साथ सहादत बनी रही,
थमा नहीं सिलसिला
मिजाज हवाओं का
अनुरूप दशा के
दिशा बदलती
मौसम मधुमास की
रुख रेखा से ठनी रही,

मिटते बाग बगीचों की
कथा व्यथा
अनसुना किया
कोयल का दिल दर्द कहा ।

उम्मीद आश की
लौ जली जो जस तस भीतर
उठा पटक के
झंझावाती झोकों की
साजिश से लड़
सपने नयन सजाये,
चील गिद्ध के जत्थों से
लड़ मरी
जो सोन चिरैया
भरी आंख नभ
कौल उड़ानें दूध नदी के तट
का सुख हिलगाये,

पर्वत पानी लांघ यहां तक
किसी तरह हम आये
बचा रहे
मन का संकल्प गहा ।

भोलानाथ


















Sunday, 21 November 2021

ताल तलाइयां

 ताल तलइयां नदियों झरने

बगुलों की जस पट्टेदारी ! 


जीवित मछली चोंच निवाला 

झिन्ना झरनों के व्यापारी ! 


बरगद फुनगी 

चौपाल चर्चना

गहन मंत्रणाओं के माहिर 

भांप रहे 

गति लहर नदी की,

अपने अपने अड़ी अहम के 

आड़े बहमी 

भीष्म सुनें न 

चीख वेदना 

लहू लुहान सदी की, 


पोखर पानी पूर जिरह में 

महके रंग विरंगी फुलबारी । 


रातोंरात 

कुकुरमुत्तों सा 

घूरे पनप 

शाल सी सुबह सुबेरे की 

गुनगुनी धूप ओढ़ ली,

रही ठिठुरती 

माटी की परवरिश लीद सी 

राह लावारिस 

लंजार जिंदगी 

जिये कोढ़ की, 


मर्ज पुराना बढ़े दिनोंदिन

धरी घाव पर आंख शिकारी । 


माखन मिश्री दूध मलाई 

देत 

फाड़ के बुक्का 

नरियाये अघोरी 

छोर के कछनी फिरका नाचे,

बेसुरे स्वरों की 

पृष्ठभूमि में 

अर्जित 

योग युक्तियों के गुर 

द्वारे द्वारे बांचे, 


बिगुल बजाती गंजों की बारात 

न जाने नख की लाचारी ।


भोलानाथ

Thursday, 28 October 2021

ठुमका ठुमको

 ठुमका ठुमको 

बड़ी प्यारी है थिरकन तुम्हारी ! 


चेहरा नहीं भीड़ के 

निभती निहु हिस्सेदारी! 


ओढो बिछाओ 

बेहाली 

गुजारे को हाजिर हैं 

चिथरा चिथरियाँ,

खैरात खाये 

ओढाये उपन्नों के 

भीतर से 

झाकें थेगरियाँ, 


किचराई आखों से 

चुचुआ के झरती लाचारी ! 


गांठों के 

सिरे गिरे कहाँ 

तजबीज बोध 

दूर दृष्टि नही तेरी,

अजायब मठों के 

अजायब अघोरी 

अपने नहीं हैं 

न इनकी फेरी, 


रहने दो जय जयकारों के

स्वर दुनिया दारी ! 


गाये तजुर्बे 

कानों को फबे न 

तुम्हारे

मुनमुनाते बगदर सा झाडा,

जिया औघड़ आराध्य सा 

आंखों जहन के 

सपने 

मुखौटों के बाड़ा, 


अकारथ कटी उमर 

नाचते निभाते जिम्मेदारी ! 


भोलानाथ

Tuesday, 26 October 2021

लोहा लाल पकड़ संसी से

लोहा लाल पकड़ संसी से 

बैठे बैठे
भट्ठी में उकड़ू उकताये
गरमा गरम हथौड़ा
मार न पाये
हचर पचर पचरे खांचे के
रही पलटती निहाई !

रोज रोज का गरम नरम
व्यापार समेटा
फेका गोबर घूरे
फोंका फांक फकीरी
भोर उज्जैनी दुपहरी तक्षशिला
संझा
वृंदावन की हृदय समाई !

उड़ा रंग भीतर का भले
फक्क सफेदी
कभी न बाहर आने दी
रंगीन लबादे के भीतर रह
हंसी खुशी
मेहनत कस पौरुष
भस्मी का किरदार जिया,
बेसुरी भैंस के आगे
बजती रही बीन
लय कभी न टूटी
बदली घरु जरूरत के वाजिब
कोरम की संख्या भरपाई के
अनुपालन का
परिचय हर बार दिया,

राग द्वेष की धूप छांव
आवाजाही के
उभरे पदचिन्हों की
भिन्न भिन्न आकृतियों के
अनुकूल आकलन की
सूची में
अंकित है अकूत गहराई !
निजी स्वार्थ सहन के
बाहर जीने का ख्याल किया न
भवबंधन से बंधे रहे
रेफ न कौंधी जहन गिले की
चल रही परिधि के भीतर
लीला जीवन यापन की,
हांक रहे निर्बाह की रेवड़
जस तस
रजत पुलक दिख रही दूर
बारीक बहुत उम्मीदों की
रंगविरंगी
घिसल पट्टियां
साझेदार हैंअपने ज्ञापन की,

अंदाज छोड़ खारिज कर
पुश्तैनी परम्परा के
तुक्ष्य सुभीते
गहिरे गिरे हैं
हीरे मोती माणिक मणियों की
लोक लुभावन
लाजहीन लहजा की खाई !

अफसोस बहुत है
अक्षय विरासत की जड़ से
कट  वस्त्र विरत हो
स्विममिंग
पूल में तैर नहाने का
याद आते हैं घाट पाट वे
पावन नाव बिहार नदी के,
खाई खन्दक की दलदल से
मुमकिन रहा न बाहर आना
वैताल विक्रमी हाल
सम्हाल सके न
पाँव रेंगते
गांव शहर की ओर
उजली भोर निहार सदी के,

उंची कोठी उजले बंगले
रंगीन
पूछ अजगर की
पकड़ मरोड़ तिलिस्मी
उलट पुलट तन तोड़े
पढ़े न आंखों कान सुने न
संवेदन की चीख रुलाई !

भोलनाथ









Saturday, 23 October 2021

दीवार कवच हैं

दीवार कवच हैं 

राजदार हैं
हर धड़कन की
नहीं खींचती रेखाएं !

रखती हैं
खिड़की दरवाजे
मौसम के अनुकूल
आचरण की आदत अलखाएँ!

गतिरोधों के
परियाय से बाहर
सोच अलहदा
ताक झांक कर
भीतर अपने,
दिवारहीन परिवेश में
रहकर
भावावेग भटकते
जिये उमर भर
टूटे सपने ,

मूंड गोड
मर्यादा की रक्षक
बाहर के कांटा कंटक
कितना भी बल खाएं !

छोड़ भरम के सिरे
फकीरी लीक
भ्रांति के
भुतिया बोली का
केवल झूठ तंत्र है,
पावन मनोगति की
भावभूमि का
बन अनुगामी
सच्ची सच्ची
मुह की कही मंत्र है,

बेतरतीब बहस की
अनुपयोगी
बढी लताओं की
छांट सही कर शाखाएं !

इस उस पार की
बात न कर
सब तेरे अपने हैं
झांक न जंगले
खोल किवाड़े,
धूप छांव सिर
गंध रोटियों की
आने दे
पत पानी की
बतबड़ आये न आड़े,

पके बाल की
चांद सफेदी
पोत न पालिस
लहराने दे अधपकी पखाएँ
भोलनाथ

Friday, 22 October 2021

नटनियों नटों डंगचढ़ियो के करतब

 नटनियों नटों 

डंगचढ़ियों के करतब
कूंचों के
गलियों में रहते
धमनियों शिराओं न बहते !

इष्ट मान
पीछे पीछे जो भागे
शरणागत हो बजाओ
देवालय की घंटियां
अल्ला अजान सांई कहते !

तुम्हारे आदर्शों के
बेधर्मी घोड़ों ने
खाया खेत
चरी गाढ़ी कमाई की
लहलहाती
फसलें तुम्हारी ,
नाचे
पाँव बांध घुंघरू
पड़ोसी के आंगन
बरदौरी विदेशी
जने गांव खच्चर
बेलगाम रही करियारी,

छोरो डांग नटनी रसरिया
भद्द से
भाड़ में गिरेंगे
सिरे आ पंडा के
बकुरेंगे दहिया सा दहते !

हल्दी नेउना लगा
कूट देते पहले नसी
फिर नशेड़ीऔलादें
कैसे परोसती
देश को
ड्रग्स की बियारी,
वंशावली पढ़
न्यालय न आती दलाली
लीप पोत बिल मुसकुर के
चूल्हा चढ़ाने
मिर्चा मसालों की
गबड़ी तरकारी,

चश्मे के पीछे आंखों के
आगे
पुड़िया के सच का
गढ़ते मंसूबा थकते नहीं
झूठ पर झूठ तहते !

खाकर के ठोकर
मुह के बल
गिरता जब जोकर
झाड़ पोंछ मुखड़ा
उठाने उमड़ता है
बुद्धिहीन पुतलों का रेला,
प्राणवान पाप धोने को
कैमरे के आगे
भाग
मीडिया के जागे
कवर हुआ ज्यों
शिप्रा उज्जैनी का मेला,

जाने न कोई समझे न कोई
बीतें दिन
चालबाज
भेड़ियों की खाल में
सियारों की खुराफ़ात सहते !

भोलानाथ

Thursday, 21 October 2021

रूह दिवाल तोड़कर

रूह दिवाल तोड़कर 

विधवा जैसे लाज समेटे
घूंघट में जी गई जिंदगी
खाक अतीत जवानी
थकन छांव से सकुच  निहारे !

महक छोड़ उड़ गई न जाने
सांस चिरैयां
प्रेम विहीन हुईं निरमोही
लावारिस सपनों की खैरात
भविष्य की गणना सगुन विचारे !

खुले केश औंधती
सीप सी पलकें
झर झर अंसुआ खालिश
खरी खोट की सावन झड़ियां
झरे बिरौनी
बुझी बुझी है ओंठ की लाली,
रंगविहीन सफेद घूँघटा
पहचान निरीह
प्रतीक अमंगलकारी
पीड़ा परियाय उंगलियां
मिश्री ओठ
निगाह साध बाघ मतवाली,

चली चाल नातेदारी रिश्तों के
बिम्ब बदलते रहे युगों से
कभी किया न पूंछ परख 
कितने सच्चे हैं
खरबूज छुरी के गुनतारे !

जिया झूठ उधारी बलभर
खाया पिया सुकून विलासी
खौले खून देह जश्न को
निबल निरीह
टेंटुआ
जैसा चाहा वैसा खूब मरोड़ा,
गांव की
बेबा बेटी बहन बनी न
निर्लज्ज आंख की
नजर निहारें तौलें तन
रंगीन लबादे का
कोढ़ चुये भीतर से थोड़ा थोड़ा,

टटिया पेल घनी बौछार
उमड़ती बाढ़ की धार
दिवार की मिट्टी चियां चियां
थर घोले बेबस नीव
लाज छांव कस हालात सम्हारे !

इतिहास का साक्ष्य
समझ में आया
तन अधम अधोगति
जिया हमेशा देवी दुर्गा
काली के काटे भी
जरासंध सा उठ होता रहा खड़ा,
सुमति रही होती यदि गाडर में
मृत्यु परे
क्या हिम्मत होती साउज की
भीड़ चीर खा जाता
अपने नाम किये
भय का तमगा बहुत बड़ा,

जागो उठो दौड़ चलो
परिवर्तन के पथ पर जिये न कोई
अनभल आँचर खिल्ली तंगहाल
टिमटिमी के जैसे
जब चाहे तब फूंके बारे !

भोलानाथ

Tuesday, 19 October 2021

अखर गया बिजली का गुल होना

अखर गया 

बिजली का गुल होना
लिथड़े रहे पसीने से
जैसे घाट गुजरिया का
जल कलश मूंड में फूटा !

बहुतेरी कोशिश विफल हुई
जुड़ सके न
सांझ कलम से
भरी अलाप कंठ की
काव्य पाठ का पहला मौका छूटा !

भौहें खिंची कमान हुईं
रौनक मुह की उतरी
पुलक हृदय की हुई नदारद
हतप्रभ रहे देखते
साख सिराने
शहद की शीशी जैसे फूटी,
बेंडहा बैल समय बन आया
औचक घात भाव
वैभव विक्षोभ के कोडों की
असह वेदना से 
कराह कर
करवट करवट नींद रात की टूटी,

नाक कटी पगरैत तमाशा
बाजा वालों की अगुआई
बुझे बुझे बाराती
जैसे
महुआ मोगरी का कूटा !

चूक मामूली बात बड़ी थी
भरा रहा विस्वास लबालब
संभावित विघ्न का कोई
विकल्प न खोजा
साधनहीन चले
कूबत का करतब दिखलाने,
औचक आई आंधी में
उड़ गई छतरियां
भीगा विग लथपथ
चिकनी चांद के गंजेपन में
रह रह उठती खुजली
उंगली करती रही बहाने,

हूँकी हामी किचिर पिचिर
भीतर की समझ न आये
बेचैन हृदय का
उठता बड़ा बबाल
सुकून जहन का लूटा !

गाते अनुभव अपने
थके नहीं
रहे खोलते गांठ रूढ़ियों की
गोरखधंधा सांठगांठ
बतलबरी के
चढ़े नहीं सोपान सीढियां,
पछतावे की युद्धभूमि में
लड़ रहे निहत्थे
आज स्वम् से
अर्जित ज्ञान ग्रंथि का
सूरज अंधियारे में डूबा
राहगीर सी लगी पीढियां,

आज अकेलेपन का
अहसास हुआ
अवकात हमारी
हमको समझ में आई
भ्रामक भ्रम विवेक का टूटा !

भोलानाथ

Saturday, 16 October 2021

कुछ दूर तक तुम मेरे साथ हो प्रिये

कुछ दूर तक 

तुम मेरे साथ हो प्रिये 

और रिश्तों के रागी बिखरे पड़े हैं !

सहेजा समेटा 

बहुत इन हाथों से अपने 

कंधों के ढोये जिद पर अड़े हैं ! 

समझाऊं कैसे

रटाऊ तोते के जैसे

खोखल के बाहर 

गुलेलों की शातिर निगाहें

बन कर चुनौती खड़ी हैं,

बचने बचाने को इनसे 

कोई गुरुकुल नहीं है 

जुगत शेष रहने की 

अनगिन विधाएँ

जहन में जंग खाती पड़ी हैं,

तुम ही कहो 

गुर कुछ सीखें प्रिये 

अभी नरम टांठ माटी के कच्चे घड़े हैं ! 

तुलसी सुमति का संज्ञान 

रट कर 

आचरण को अपने भिगोयें

भेंट पायी पुरखों के हाथों 

छलकती गंगाजली से,

विद्रोही उमर के ज्वाला मुखी को 

पहिना कर सिंगौटी 

सांड़ों सा साधें 

फिर 

वाणी का अमृत ढारें गली से,

पनघट परिंदों सा चहकें

धूप छाँव 

बरखा के भींजे हम भी खड़े हैं ! 

समझौते समय से हमने किये 

रूठे न खीझे किसी से 

ख्वाहिश की 

आगी में जब तब 

उपलों के जैसे सुलगते रहे हैं, 

न जिद की माँ से 

न बाबू को चिंतित किया है

बह निकले पानी सा 

दशा दिशा तय की काट काट चट्टाने 

नदिया के माफिक बहे हैं,

हिलाई न चौखट कभी 

न तोड़े दरवाजे 

जैसे थे वैसे घुये गहरे गड़े हैं !


भोलानाथ

Friday, 15 October 2021

आखिर मूस घूस सा घुस गया

आखिर मूस घूस सा 

घुस गया
यहां भी
जहर जाति का
पंथ समूहों में बंट
कब तक और नकारोगे!

मलयागिरि रहबासी
भील के
बाड़े रोपा चंदन
जहन बिलोय
महकती लकड़ी
अपने चूल्हे बारोगे!

मूंछ मरोड़ का
समय रहा
न शिकार की आजादी
पूंछ हिलाना
भूल गये
हिरनी के शावक
उंची उंची भरें कुलांचें,
एक जमात एक पंथ के
इतिहासों का
न्याय नहीं
कुटिल इरादों के
व्यापक
षड्यंत्रों का
उजला चिट्ठा बांचें,

भीगी बिल्ली
धूप सेंक
चढ़ गई सिकहरे
जंग लगे
हंथियारों से कैसे
मूंछ के बाल उखारोगे !

चढ़े खराद खुरों सा
उपज रहेआक्रोश
परिधि में
शकुनि वाली चाल
द्रोण दक्षिणा
के गुर
कुछ काम नहीं आएंगे,
अधिकार हनन के
घन का दस्ता टूटा
खीला पचरा मार
जोड़ की
झूठ कवायत
सरगर्मी
पचड़े कितना भरमायेंगे,

साहस नहीं यह
अनुचित जिद की
अड़ी में
नाहक कंधे उचकाये
मगजमार की
शिला लिलारों फोरोगे!

कहना मान छोड़
यह सर्पिल पगडंडी
खींच लकीर नई
सीधी सड़क की दौड़
सभी के
साथ दौड़ कर
साबित कर अपनी गति,
चलन के बाहर की
चिल्हर खनकाकर
धन की
डींग डुगडुगी बजा कर
और हांक न
फाड़ बही चुकता कर
पिछली बिकटअति,

उधर रहीं
परतें पालिश की
हिम्मत बटोर
स्वयं साफ कर 
यह चिन्दी चिन्दी
पपड़ी कब तक टोरोगे !

भोलानाथ

Thursday, 14 October 2021

खोज रहा हूँ शहर शहर

खोज रहा हूँ शहर शहर 

अपने बचपन की 

स्मृतियों का 

वह 

सुघर सलोना हिंदुस्तान ! 


हियोतता 

वह जोत की सरगम 

दांय गडायन

गांव के बाहर 

गोबर लिपे सजे खलिहान ! 


पगडंडी ढर्रों की गौधूलि 

माटी गंध 

गौंखरिया बाड़ा 

बाहर के दालान बैठका 

कंकरीट ने 

चील के जैसे डैनों दाबा,

बाजार दुकानों ने 

घेरा घर 

हांक दिया गौवों की रेवड़ 

रहीं न आंगन रकर कुलांचें 

नकली 

दूध की धार मिलावट मावा, 


घुंघरू घन्टे 

वाले बैलों की 

रुनझुन 

सींग सिंगौटी 

रंगों रंगी कंधौरे शान! 


सुबह सुनहरी धूप 

साँझ रंगीन छटाएं 

हारिल सुआ नीलकंठ की 

आवाजाही बिहग बसेरा 

कलरव जैसे 

हल्दी अवसर के सहगान,

तरह तरह के फसलों वाले 

खेतों की हो रही तरक्की 

उपज विलक्षण 

उत्पाद में बदली

रही न अब जोहड़ 

कस्बे की पिछली पहचान, 


धुआं उगलती 

फैक्ट्रियों के 

हेम कशीदों में 

पकड़ के छाती 

खांस रहा है किसान ! 


देखासिखी अमल से 

बढ़ी जरूरत 

चरम विलास की आपाधापी 

सुध बुध मर्म भूमि का भूली 

देशधरम ढर्रों का 

नहीं कुछ ख्याल किया,

बढ़े पाँव पर पांव

प्रच्छाली 

चादर रही सिकुड़ती 

खींचतान अजमाईस 

फ़टी छोर का चिथड़ा चिथड़ा 

जाता नहीं अब और सिया, 


कहाँ मिलेगी 

मेड पलाशी 

छांव गंध गुड़ घी की 

होने लगे 

गांव शहरी मेहमान! 


भोलानाथ

Monday, 11 October 2021

सुचिता सरलता

सुचिता सरलता 

बोलों कुबोलों से
जब तब
हमने सुना है कलम बोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

संदर्भित सुभीता
सुख सार
दुख छल मसौदों के
बड़े बड़े राज खोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

कई कई रातों के
ख्वाबों कुख्वाबों
मंगल
अमंगल के
गहरे रहस्यों में जाके,
लिपे पुते चेहरों की
परतों के पाप पुण्य
पीड़ा
अनबूझ हैसियत की
कैफियत गिना के,

उल्टी सीधी
युग्मी हवाओं के
रुप रंग 
सरेआम हाट बाट तोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

मुह देख बीड़ा
पोंद देख पीढ़ा
की कथनी नकार
निहित स्वार्थ की
गठान खोल खबर लिखे,
चिकनी चुपड़ी
लीकों के बाहर
अंधेरों के गांव में
हाथों की
जलती मशाल दिखे,

दूध की दोहनियों में
स्याट लय
घिनौचियों में
सुधा सार घोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

ताजो तख्त
सल्तनत की मिली भगत
माठा मथानी के
मलिन स्वांग सदा
हवा में उछाले,
व्यवस्था के
गंधाते आचरण को
वस्त्रों सा
फीच फीच
धार में समय के प्रच्छाले,

प्रतिरक्षा की
ख्वाहिशों में
नदियों की
धार धार नौका सी डोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

भोलानाथ

Wednesday, 6 October 2021

कभी जो अर्जित हुआ नहीं

कभी जो 

अर्जित हुआ नहीं
छूट न जाये
बेगाने भय से
बढ़ी रही धुकधुकी हमारी !

खाया पिया
लगा न जी में
जिया उमर भर
सेतमेत की चिंता
बढ़ती रही बिमारी !

हैरत औचक अचरज में
दिन बीते
रात अतीत की उठाधरी
बुद्धि विवेक के
इस कोठे से उस कोठे के
रेक अलियाँ बनी रही,
कहाँ की घाटी
कहाँ के घोड़े
युद्धभूमि का पता नहीं
कनपथियों की रेवड़ में
चेत चुनौती
उंगली उंगली तनी रही,

जारी जतन
जीवनी जीने की
भिन्न सूत्र से
लड़ते लड़ते
आस्तीनों से हारी !
सिंहासन बत्तीसी की
उड़ती रही पुतलियां
प्रश्नों का
बैताल रहा उलझाये
गिनाता युगों युगों से
दाढ़ी मूछ के बाल,
जद्दोजहद बेनामी मुद्दों की
पान गिलौरी जैसे
गलुओं में दबी रही
पीक स्वाद सी
मजे मजे
दिल धरती रही बबाल,

खाली ख्याल पुलावी
खाली खाली
थाली बरतन जैसे
बजते
मती मौन की मारी !

देखा दंगा
सुना लखीमपुर खेरी का
कौंधी जगी चेतना
जैसे सोते से उठ जागा
लीले मेंड़
खेत नहीं लेय डकारे,
बाहुबली राजा का
सेनापती कसाई
कुचले कार
किसान कमेरे करिन्दे
रोने का अधिकार छीन
सच साक्ष्य को गिन गिन मारे,

बेबात ही
जाया किया समय
सपनों से डर कर
असल जिंदगी का
पल पल जिया उधारी !

भोलानाथ

Monday, 4 October 2021

मेरे मुह में दही जमा है

मेरे मुह में दही जमा है

जब चाहे तब
काट काट के कतरा कतरा
राजा खाये
ले जा तू भी आजा तू भी
लेजा भर भर दोना
काढ़ के माखन घी छांछ बना ले !
आग बहुत है
उंची लपटें दबी कलेजे में
भात पतीला दाल भगौना
अदहन धर
या सेंक रोटियां
फूंक मार बीड़ी सुलगा के
मुह का बीड़ा गांछ बना ले !

लूट मची है गांव इकट्ठा
शहर भौचक्का
मूक बधिर सी सामूहिक सुधबुध
सजग लुटै
घर आंगन गली मोहल्ले
विवस उक्तियाँ
देशधर्म ले डूबा ठाढ़े ठाढ़े,
राजपाट हो गया लुटेरा
राजा लूटे
लूटें करिन्दे
सरेआम बाजार का डाका
पशुवत हांका
प्यासी ओंठ उसेये चेहरे
दिखते तेल के काढ़े काढे,

कभी खत्म न होने वाले
लवण खनिज के
श्रोतों की उद्गम
इस जरजर देह की
अस्थि पंजर पुर्जों को
अपने तृष्णाओं के तरकश
तीर सी भौहें बांछ बना ले !

दर्द कराहों का कितना भी
कुआं जिऊँ मैं
मुह उतरे या देह ढले
जनम जनम से
मेरे अर्थों का पुतला
पलक मुट्ठियां जबड़ा भींचे
मुझमे जीवित रहा सदा,
आईं गईं पीढियां कितनी
बिगुल क्रांति के हाथी हौदे
फूंक पाँव में दबी रही
धूप जेठ कसमसी क्वांर की
पीठ घमोरी
चिलक
चेतना चमकी यदा कदा,

मन की कलप तड़प दिन दूना
अंध आंधियों जैसे
बढ़ती ऊब उबासी
कुंठाओं की गहरी खाई
रह रह उगले
कुबेर खजाना
बसनी बांध लपेटा काँछ बना ले !

कहन कहावत की कथरी का
ओढ़ लबादा
जी रही बेहोशी
फतबों के अल्फाज सुने न
अखबारी ऐलानों की
डुगडुगी के आगे
जख्मों की पीड़ा दर्ज कराये,
जब तक चली चलाई
टूट बिखर कर खूब चलाया
जिया खांड़ सा
उठ बटोर अब
खुद में खुद को सहेज बाँह बल
फेंक हांथ का भारी भरकम
भाला देख जहां तक जाये,

अहसास और न हरदम
ऐसे बौरे रहने की मजबूरी
अब बदल व्यवस्था
पहचान मंत्र
यह प्रजातंत्र का
खर पतवार गुल्म गांछ
दुनियादारी के चांछ बना ले !

भोलानाथ




Saturday, 2 October 2021

भोली प्रजा

भोली प्रजा बेधर्म राज के 

क्रिया कलापों पर
गूंगी बहिर प्रलापी
विपदाओं के
अवतरण द्वार पर कैसे
भारी भरकम शिला चढायें !

नंगा नाच मौत के किस्से
किये गये दुष्कर्मों के
पाप पुण्य का लेखा जोखा
जैसे हतप्रभ बाली को
किरदार
राम के अंतिम पाठ पढ़ायें !

विपरीत प्रकृति के
जब कदम उठाये
भोगे नहीं प्रजा
निर्वाह करे कर्तव्यों का
बेदखल
सिंहासन घोषित करदे
राजधर्म का धर्म निभाये,
नुक्कड़ नुक्कड़ नहीं गिनाये
होती हिंसा हत्याओं की
थाना चौकी
रपट लिखी दुसवार सूचियां
नगर दरोगा
जन गण
मन का विस्वास जगाये,

लगा बुझाई लांच की
आंच से बाहर
धार तेल की देखे
आगी अंगरे न्याय के चूल्हे 
भेदभाव के ख्याल
खलल न खौले चढ़ी कढ़ायें !

गली तिराहे
तिरका तीन चौगड्डे
पर्व प्रबंधन के
प्रस्तावित नक्शे
खींच सके न अलग से रेखा
दहशत हिंसा हत्या
हातिमताई अदहरा,
मौके पर मौके
खोज रही जो भीड़ भाड़ की
चूक फिदाईन
जहन बताशा
हूर बहत्तर गांठ गडाइन
जिमजिम पानी
पीर फकीरों का पहरा,

भूत प्रेत नहीं
वे मरघट के
जीते जी पाले जिन्नों के
जीवित जिगर जिनाउर
आतंकी आकाओं के
मनुहार मरें बेहिचक अढ़ाये!

फीच फीच परदनी के जैसे
घाटों धांधर नहीं निचोयें
ढोरे पानी
धान पान खीरा थर 
अर्चन
तुलसी चौरा
दिया सहारा जले रात भर,
सिंहासन की
अर्दली त्याग कर
क्षितिज का सूरज
देता रहे प्रकाश
अंधियारों की चिकनी चुपड़ी
सुने नहीं
न हो विचलित बगदरी बात पर,

झूठ खरीदे
बिके नहीं आस्था
जयकार जुलूसों के भीतर
चीख न बूडे
फिरें न जुलमी द्वारे द्वारे
भगवा चेहरे फ्रेम मढ़ाये !

भोलानाथ

Thursday, 30 September 2021

कठिन समय की धरी विरासत

कठिन समय की धरी विरासत 

ज्ञान ध्यान
मलियागिर गंध नहाये
कोई सुने न कोई गुने न
शदियां बीतीं
अलख जगाते मगहर मरे कबीर !

झीनी चुनरी कफ़न अंगौछा
करघा सूत चढ़ा कर
झूम झूम के गाया गीत
कभी दिल रोया
ताना बाना की
लमझगड़ी करती रही अधीर !

खुद का काम कमेरे खुद के
सिर पर बोझ अटाला अटहर
पूर परैया मठा भात खा
जिया धूप दिन
हन्नागुन्ना
सांझ पगड़िया भूत उतारा,
फक्कड़ पीर फकीरी जी कर
प्रचलित अंध विधाओं की
गांठ खोलते
परत धूल की
रथियों के आगे
वसन के जैसे हवा में झारा,

कडुआ सच कह पाने का
अंदाज निराला
राजा रंक प्रजा मठ बम्हनौति के
बीमार जहन को
रहे पिलाते
अमृत झोलीदार फ़क़ीर !

ऊंच नीच नफरत के हठटंटे
दर्द खुशी
ख़ुशीहाली गाया
सैलाब समुंदर पी जाने का
भावावेग विवेक जगाया
जैसे अगस्त ऋषी,
विपरीत आंधियों अंधड़ में
तनके खड़े रहे
मानवता के चक्षु पटल पर
दिया जलाते
फुंकी झोपडी खुद की
घीच रसरिया रही कसी,

मौजी अल्हड़ हरफनमौला
फिकर नहीं की खुद के
खारिज होने की
ऊंची नाक की घेराबंदी
चलती रही
घाट बाट और नदी के तीर !

जितना आहत हुये चोट से
होते रहे मुखर
भरी अलाप न मौन हुई
न लय सरगम की टूटी
बजता रहा बिगुल के आगे
मंद मंद एकतारा,
राग द्वेष से ग्रसित
कुकुरिया भोंक भले
नफरत फैलाये
निर्मल निश्छल गंगा जैसे
बह रही कबीरी कथन
सत्य तथ्य की अविरल धारा,

भरे पेट बाजारवाद ने
खूब भुनाया
बिकते रहे कबीर
धोया कालिख रगड़ रगड़ कर
महकाया मन चंदन सा
धरा लिलारे तिलक अबीर!

भोलानाथ

Wednesday, 29 September 2021

हार गए हैं

हार गए हैं

साथी सफर के रपक झुके हैं
फुर्सत किसे जो
गांठी खोले तौले थथोले
देखे पीठाहीं केर गठरिया !

आत्मजयी हुंकार ठसक में
सुने न कुनवा
थके पाँव मन मार सांस को
खांस खांस के सहज बनाते
चढ़ रहे पठरिया !

भवबंधन का बोझ उठाये
पीड़ा अपनी हलक दबाये
बटोर ऊर्जा अस्थिपंजर
आपा हिम्मत न खोने की
यह चल रही कवायद,
कदम कदम के सदमों को
सहज बनाने की
इस कठिन राह में
सुगम युक्ति की कोई किरण पहेली
बुध्दि में कौंधे सायद,

चुनचुन मोती वैभव सारा
ले उड़ भागे रिश्तों के सब सारस
छोड़ हृदय में
केचही के नन्हें शावक
गिन नाखून अठरिया !

आगे पीछे हरिबोल भजन के
सहगान सहारे
खटक विक्षोभ भाव के
खालीपन पर जीवन का
लय राग मरहम सा घाव लगाते,
समय संरचना के मलबे को
झाड़ बटोर फूक आग में
राख बहा देने के
साहस संवेदन के
ताजा टटका बोध जगाते,

व्यामोहों का कूड़ा करकट
कुशल कृषक के जैसे
परसाना होगा
ख्यालों की सैंढ़ी से
कुशियारी की गांठ ठठरिया !

अहसास मार अनुभूति का जीना
सुख सदमों के
बीच नून सा पिसते
शिल बट्टा को पल पल चुभते
रहे स्वाद पर्याय सदा,
पाय विरासत पुरखों की
किया न साझा समय से
लीक न बदली
हिचकोलों के उछले शावक
कुछ इधर गिरे कुछ उधर किनाई किदा,

लैया लड्डू गुड़ शक्कर
दूध सिमैयाँ कलेबा महेरी पुसाई न
पी पी पीना
रहे चबाते मुह भर
भुजिया नमकीन मठरियां !

भोलानाथ





Tuesday, 28 September 2021

कुछ खबर मिली न बहुत दिनों से

 कुछ खबर 

मिली न बहुत दिनों से
कैसी चुप्पी छाई शहर में
न कोई उत्सव
बाजा गाजा
दूर दूर तक दिखे नहीं
न सजे ओठ कविताई !

कोर कसर नहीं
भीड़ भाड़ में
लाईव और अलाईव
मंचों के विज्ञापन में
विस्तार है लेकिन
हलचल
हिया हिलोरी कहीं हिराई !

बड़े नाम थे जिनके
हर चौराहे
गली मोहल्ले
चर्चाओं में रहने वाले
किरदारों के
कलम के किस्से
अब हो गये और बड़े,
दर्शन दुर्लभ हुये
सपन में
संगत का सुख था
चर्चाओं में कब थे
हम उनके
बस्तों में अपने गीत लिये
हरदम पीछे रहे खडे,

रंग भेद न किया फ़ाग में
लिथड़े रहे
कीच में सदा सदा
छुआ कभी न उनकी टोपी
न ही
खोद खुरच कर देखा
प्रतिभा की गहराई !

डार न चूके रहे हमेशा
कोशिश में
फुनगी पर अपनी
उंची कूद के करतब
दिखलाने को
फिर भी खीटे
से मुखियों ने अलग किया,
मौन साध
गुपचुप चूस रहे सब
अर्जित टॉफी
फतह किये सोपानों से
अनभिज्ञ रहे हम
किसी संदेसा
कोई पाती ने सूचित नहीं किया,

फूले कांस
अईताती बारिश
चढ़ गई
उल्टी धार मछलियां
उबी में है खुरी कोरैया
खोट खलल
गुलमछरी की हुद्द बुद्द चतुराई !

कुछ खता हुई हमसे
या प्रभुताई पर
राहु के आ जाने से
अहम का चिड्डा
मौज बखानी में
झूम झूम के नाचा
भूसी की सैंढ़ पर,
वैसे भी रहवास रहा
चने के झाड़ पर
साबित करते रहे सदा
अखरा अखरा
ब्रम्हवाक सा
प्रचलित
ढर्रे की पुस्तैनी ऐंढ़ पर,

अदद आचरण की
आदत गदे पड़ी है
रही लालसा
आत्मसात स्वीकार किये
हर हलचल
रहे पूछते
जिस तिस से सबकी भेंट भलाई !

भोलानाथ

Sunday, 26 September 2021

जी जांगर चोरी कर कथरी ओढ़े

जी जांगर चोरी कर

कथरी ओढे 

घी दूध कहाँ से खाते

हाथ गोड़ की 

कायल मूछें हो गईं टेढ़ी ! 


रही रमहाती 

भूखी प्यासी गैया

ध्यान दिया न चारा डारा

बंधी रही 

निरीह सी अमरा की पेढ़ी ! 


अटे पड़े अंदर से बाहर 

घर के 

स्वारह अटहर में 

कंधों तक डूबी

रही अढाती 

गुड़िया की अम्मा 

हम डारे रहे रुई कान में,

बीड़ी 

फूंकी खैनी खाई 

थूका चारो ओर 

गंद मचाया 

टाले टल्ले बैठे ठाले 

किया नहीं कुछ

आलस हावी रही जान में, 


जागा नहीं विवेक 

झुर झुर चलती रही पुरवैया

झर झर थोड़ी थार 

फुर फुर 

उड़ती रही भुस्स की सेढी ! 


मुह में गाली 

जहन में गुस्सा 

आते जाते कब तक सहती 

दो दो गुच्चा 

पेट पाँव के द्वन्द भला 

रोज रोज 

ऎसे कब तक रहती,

बाहर गई गाय 

फिर कभी 

न वापस लौटी 

होते रहे थकन से चूर 

बैठक में बैठे बैठे 

किये जतन होते 

तो नदिया दूध की बहती, 


अंड़ा अड़ी की 

ठकुर मिजाजी में 

लांक जला जल गई 

दांय गडाइन भागे बैल 

तोड़ कर ठिकधर मेढ़ी ! 


अभद्र आचरण की 

पृष्ठभूमि का अपकर्म 

छोड़ पहचान लिया होता 

खुशहाल जिंदगी के 

मंत्र तंत्र तो 

हम भी 

खाते तालमखाने,

हाथ मीज 

पिडरी सहलाते कैसे 

अच्छे दिन आते 

फुर्र फुर्र उड़ गई चिरैया 

खेत खाय के 

तब भीतर का 

जागा जोगी राय बखाने, 


ऊंची नाक के ऊंचे गिरगिट 

पहचान समय को 

खरभर खरभर सरपट 

भागे 

पास के पतझर बाड़ की रेढी ! 


भोलानाथ

बातें करते चूल्हा लकड़ी आग तवा की

बातें करते चूल्हा लकड़ी 

आग तवा की
थकते कभी नहीं जो
देखा है कभी
सिंकी रोटियां
क्या चूल्हे के घैर की !

पांत में बैठे कभी नहीं
खाया पिया
पेट भर खड़े खड़े
सौ सौ छेद किये
देखे बड़ा बड़े बड़े
थार पतरियों गैर की !

अनजान अनाड़ी
बहुरूपिये
मदारी मजमों के माहिर
लगे सिखाने
काया कल्प करेंगेआलू का
पेर मशीनों में सोना कर देंगे,
चिड़िया चुनगुन पंख पखेरू
सोने के होंगे
नहीं नुचेंगे
न ही शिकारी शिकार करेगा
झोली में वैभव
बोली में अमृत भर देंगे,

खुशहाली के दिन होंगे
भूत प्रेत
मरघट के बासी
बरम सन्यासी
जगवासी ललाटों की
चंदन होगी माटी मैर की !

चना चढ़ाने
जबरा पेल की पोंदीपैया
अंधी अड़ी ने रौंदा खेत फसल को
बारह बाट किया
बेसुधी नहीं
बेसुध होने की लाचारी है,
मिट्टी की खुशबू का
ध्यान रखा न
माटी के मादर बने रहे
बिम्ब प्रतीकों की साझादारी की
किरकिरी रही आंख में
पानी में पानी की मारा मारी है,

गलाफाड चिल्लाने वाले
लावर लट्ठ गवारों की
लबरी चुपरी
समझ सके न
रहे बजाते सच की
पीठ में हकनी बैर की !

कभी इधर कभी उधर के
गठबंधन के
अनुबंध मौज की पुड़िया का
रंग नहीं देखा
न पहचाना पानी में
चूने का ठंडा होता हुआ उराव,
नदिया बदल रही
अपनी जलधारा काट रही
क्यों खुद के निर्मित किये किनारे
क्या थकी हुई है
चाह रही कुछ समय के खातिर
गहरे में ठहराव,

चिल्ला चोंथ की उबी
नई सोच की आगे आगे
बढ़ चली धार की
युवा मछलियों की
दिशा दशा पर
लगी नजर किसी गैर की !

भोलानाथ 

Friday, 24 September 2021

पिछली दौड़ के आगे

पिछली दौड़ के आगे 

दौड़ दौड़ कर मर खप के
मैदानों में रैयत ने
एक एक के
आगे सौ सौ झंडे गाड़े !

नमो नमो का नारा दे कर
राज तिलक कर दिया
चाय के हरकारे का 
दिग दिगंत बज रहे
उसी के ढोल नगाड़े !

उंची उड़ान है उंचे उंचे
अब रही न फुरसत
नीचे की सुधि लेने की
भूल गये अखबार रेवड़ी
मूंमफली रेरी पान के खुंचे,
फुरसत में जिन
बीड़ी वालों के संग
रमी खेलते समय बिताया होगा
या कूद कूद कर
गली मोहल्ले खेले कांच के कंचे,

चुंगी के चर्चों में है
फिर आज अमेरिका
तंगी में रह कर भी पिटें
तालियां झोलीबाड़ा के बाड़े !

सेवा निवृत्त जिन बूढ़ों ने
मजबूती से बांह पकड़ कर
तिलक लगाया मीलों मील चले
जयघोष किया
बोझ हैं सिर के आज वही,
जाना समझा मिला अनेकों बार
सुना फिर भी न संवेदन जागा
न ही संज्ञान लिया
यहां वहां के
रहा दिखाता खाता और बही,

रहने को खोली न कमरा
जहन जवानी देश को दे दी
खुले गगन का
असह गुजारा
गिन गिन तोड़े तन के हाड़े !

निराश हतास नहीं हम
बिल्कुल भी कुछ अच्छा ही
करके लौटेगा देश की खातिर
कभी कभी अपनी पीड़ा
निवारण की गा लेते हैं,
खाना दाल दवा के अभाव में
रोज रोज बढ़ती पेंशन की
आश में शव के ढेर
देख कर सरकारी
उपेक्षा का विष पी लेते हैं,

जिये हों दुर्दिन कैसे भी
उम्मीदों की छांव
नहीं छोड़ी दुख सह कर
स्वागत
अभिनंदन में रहे अगाड़े !

भोलानाथ

Thursday, 23 September 2021

उछल कूद न बहुत

उछल कूद न 

बहुत डार से डार
फल झार न नीचे
अकल का
आका मत बन बंदर !

बहुत बघार न
सेखी
सुन मरे महंत का किस्सा
सड़ गई
खिचड़ी मठ के अंदर !

भक्ति भावना का
खाकर
व्याभिचारी
जीवंत आस्था पर
रहे जूठे हाथ अंचा,
तू आग लगा
कचरे में
जलती है तो
जल जाने दे लंका
सच की आन बचा,

चेता नही तो
पन्नी पुट्ठे में
दब जायेगा
संगम का
यह उठा बबंडर !

सूंघ सुराख न
पुण्य पाप का
चोले के भीतर
ठाठ बाठ का
पलता कोढ़ उजागर कर,
सुन पढ़
अगस्त को
ढोंकी सागर
पोंक रही हैं तोंदें
पचा न पानी औंधी गागर,

विद्या बुद्धि विरत
कुबेर के घर में
कोने कोने
नाच रही है
सजी छछुंदर !

बिना बाल की
खाल निकाले
लम्बी दाढ़ी का
काला तिनका
नोक सुई की कैसे काढ़े,
पुचकार
पूंछ न ऐसे
डार दे उंगली घोंघा
उगलेगी
आंत सभी कुछ ठाढ़े,

पेट के
दांतों ठीहों से
लहरा कर
बह निकलेगा
नरकाकुण्ड समुंदर !

भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...