चलते चलते अजाने सफर के
हारे थके
लड़खड़ाने लगे हैं
समतल सतह के खुरदरिया पांव!
मंजिल का कोई ठिकाना पता न
झुकी रीढ़ के
बोझ पर बोझ
धरती रही है घरौंदों की छाँव!
पग पग पटे पेंतरों के कटीले
वनों के सुख दुख का अनुभव
किस किस
बगलगीर को रोट सिन्नी सा बाटें,
पथ पंथागारी सा छप्पर का विश्राम
मंजिल नहीं है
अनबोली
परछाईयां खाईयां कितनी पाटें,
पिछाड़ी का परचम छूटा पीछे
अगाडी का आलम.
उलेलों में
जैसे फंसी हो मंजिल की नाव!
किनारों का इतिहास पढ़ कर भी
मुमकिन नहीं
मुड़ना पीछे
फीँची फतोहीं के रेशे रुआ चुप पड़े हैं,
अनुभूतियों की उन खाईयों से
आगत क्षणों को
कैसे निकालें
अड़े दैत्य दुविधा के द्वारे खडे हैं,
भोगा भंजाया जख्मी आलम
सागर सा खारा
विलापी
विथायें विधाओं में डूबी निद्धांव!
झाईयाँ ही झाईयाँ हैं, त्योंरियों में
चेहरे
मोहरे छुपाये
थिरकते रहे नट सा गाये बेगाये,
होता रहा हर जखम फिर हरा
बे लक्ष्य ताने धनुष
आसार उम्दा
आँखों के, काँखों में कस के दबाये,
तिड़के चनों सा ज्वाटों से बाहर
बसाते रहे
अपने
मजमों में मनमानी मंजिल के गांव!
भोलानाथ
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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