Tuesday, 30 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [गूंगे मुह]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
चेहरों का
अक्स नहीं उभरा
तरासेंगी चींटियाँ
चमचमाता आइना
फोड़ कर
पाँव से पहाड़,
बरसाती
मेंढकों से
सुन सुन
गंगा की अमर कथा
कुओं की गुलरियाँ
तोड़ रहीं पानी में हाड, 
गोबर की गौरें
बंदन कर
पूजी हैं
कई कई
नदी ताल झरने
समझी विधायें न
पाथ दिये कंडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
गुर क्या सीखेंगे
बडबोले नेवले
पिया जहर
नागों का
उगल रहे ओंठों से
शब्दों के ऊपर, 
संज्ञायें सूरज की
निगल रही
लोमड़ियाँ 
बंजर के
इतिहासी शिलालेख
गुरुकुल में उगी है थूहर,
चुंगी चिलम के
अखबारी चर्चे
कसे हैं
देवालय धुंआ में
बाना लिये
मुह में
नाच रहे पँडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 
सनकी हवाओं की
धमकी दबे पाँव
हलकी सी आहट
सवाली शहर की
हवेली है
कोनों से खंडित,
बरगद की छाती 
अनचाही
पीपल की माया
बामियों बमीठों में
खोज रहा हाथी
जादूगर पंडित,
मुखागर
कहें क्या
सूखी है स्याही
कलम की
ओंठों के
नगमे
कंठों में कैसे हैं ठंडे !
गूंगे मुह
साहस तो देखिये
चूहों ने
मांदों को
भूंसे का
ढेर समझ
गाड दिये पौरुष के झंडे !
बिल्ली
बिलारों की
बात क्या करें
शेरों के
सामने
शिकारी से तने हुये
चींटियों के अंडे ! 

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Monday, 29 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [कच्ची चमेली]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
धुआं देख
छानी के ऊपर
गिरगिट
भाँपें
आगी चूल्हों की,
लूट रही
बारात नखों से
आँख का
काजल
पलकें दूल्हों की,
बर्फ रजाई
हरी घाटियाँ
धूप सेकते
भूल गई हैं
प्यासा पोखर
सूखी नदिया
ताही कंठ पिघलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
उजले दिवस
नहीं हैं मैले
सुर्ख
बारूदी धोबिन
धोये आग से,
फुनगी
बैठे बाज
चील को
नहीं है फुर्सत
भरी जवानी फाग से,
होम की वेदी
हवन नहीं
हंसी आग है
खड़ी होलिका
गोद में लेकर
वंश पूत को
चाह रही है छलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !
ॠषियों की
तपोभूमि में
चूर
हुई हैं
दुर्योधन की जांघें,
सत्य नियोगी
थका नहीं है
औंधी
पाँव पड़ी हैं
फूटी घाघें.
बिजली घर की
चकाचौंध में
देख रहे हैं
जंग लगी
कंदीलों का
जगह जगह से
खूंटी पर ही गलना !
कच्ची चमेली
चोला वंदन
मलियागिर की
तिलक सी मौतें
पगड़ी बाँध
घरों से
नंगे पाँव निकलना !
चापलूस
चंडाल चौकड़ी
छिपकिलियाँ भी
डार के डेरे
सीख रही है
घर मकड़ों के
जीवित गाय निगलना !


भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Sunday, 28 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [पर्वत पहाड़ों को]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
पुरखों के पुस्तैनी
इंद्र धनु
ऊँचे वितानों को
हमने
सूरज के आगे
उतारा नहीं,
साफ़ सुथरी
दीवारों की
ठाठों में
मकड़ों ने जाले बुने
पेट प्रजनन की आगी
धुयें को निहारा नहीं,  
गढ़ गढ़ के
विष कन्या
पौरुष निबल पर
आजमाते रहे
निमुआं निचोड़ा
हमीं ने
दूध सीकों का फारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
सूर्यरथी घोड़ों ने
जन्में हैं खच्चर
धर्मी विधिष्ठिर का
रथ क्या
खींचेंगे आँगे
दुशासन के पाले,  
अधोगामी अकेला
चिंतन विदुर का
अंधी सभा में
सियारों के
जत्थे हैं उधमी
बिन पगहा कैसे सम्हाले,
बकरी बयानों की
लफलफाई
भट्ठी में
जलते पितामह
सुनहरे वनों का
अक्षय शेर
बकरों सा हारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
गाँव शहर
कस्वों के
चौंरे चबुतरे भी 
मुर्दा से लगने लगे हैं
रोज जन्म लेते हैं
तक्षकों के बेटे,
किस्से कहानियों के
मड़राते प्रेतों की
शक्ल नहीं देखी
देखें हैं
अवसादी चेहरे
पीड़ा लपेटे,
आँखों के
कौले
निगाहों के तौले
कौड़ियों के
मोल बिके
बैताली बाबा
गुनियों ने गुलशन उजारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 


 भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763


भोलानाथ के नवगीत [पर्वत पहाड़ों को]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
पुरखों के पुस्तैनी
इंद्र धनु
ऊँचे वितानों को
हमने
सूरज के आगे
उतारा नहीं,
साफ़ सुथरी
दीवारों की
ठाठों में
मकड़ों ने जाले बुने
पेट प्रजनन की आगी
धुयें को निहारा नहीं,  
गढ़ गढ़ के
विष कन्या
पौरुष निबल पर
आजमाते रहे
निमुआं निचोड़ा
हमीं ने
दूध सीकों का फारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
सूर्यरथी घोड़ों ने
जन्में हैं खच्चर
धर्मी विधिष्ठिर का
रथ क्या
खींचेंगे आँगे
दुशासन के पाले,  
अधोगामी अकेला
चिंतन विदुर का
अंधी सभा में
सियारों के
जत्थे हैं उधमी
बिन पगहा कैसे सम्हाले,
बकरी बयानों की
लफलफाई
भट्ठी में
जलते पितामह
सुनहरे वनों का
अक्षय शेर
बकरों सा हारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 
गाँव शहर
कस्वों के
चौंरे चबुतरे भी 
मुर्दा से लगने लगे हैं
रोज जन्म लेते हैं
तक्षकों के बेटे,
किस्से कहानियों के
मड़राते प्रेतों की
शक्ल नहीं देखी
देखें हैं
अवसादी चेहरे
पीड़ा लपेटे,
आँखों के
कौले
निगाहों के तौले
कौड़ियों के
मोल बिके
बैताली बाबा
गुनियों ने गुलशन उजारा !
पर्वत पहाड़ों को
काट काट 
बहती हैं
शदियों से नदियाँ 
जब तब
बदलती हैं धारा
छोड़ कर किनारा ! 
दमघोंटू उबाऊ
व्यवस्था की
जर्जर
संस्कारी छप्पर से
उकताई
पीढी को
कैसे कहें हम अबारा ! 


 भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763


Saturday, 27 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [भीतर मेरे बसी है]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
अजगरी लपेटे
घोट रहे हैं
कंठ गले की सांसें, 
चिथड़े चिथड़े
हुई चिउँटियों
जिया धंसी जो फांसें,
साँस
उंगलियाँ गिन गिन
नब्ज नसी
बेचे हर बनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
चंपईया पन्नों
भर बगरी है
स्याही शेष कमाई,
जुड़े संबंधों ने
फटी पतंगे
ऊँचे बहुत उड़ाई, 
बौने
बांह सिकोड़
रहे हैं
गिरवी धर करधनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
खलिहानों सैंढ़ भूसिया
शिखर सा धसके
लौह इरादे,
खा खा मोती
कौवे नाचे
हंसों के हो रहे किवादे,
सागर सुआ
हवा में
मछली
पाल रहे हैं गुनियाँ  !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

भोलानाथ के नवगीत [भीतर मेरे बसी है]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
अजगरी लपेटे
घोट रहे हैं
कंठ गले की सांसें, 
चिथड़े चिथड़े
हुई चिउँटियों
जिया धंसी जो फांसें,
साँस
उंगलियाँ गिन गिन
नब्ज नसी
बेचे हर बनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
चंपईया पन्नों
भर बगरी है
स्याही शेष कमाई,
जुड़े संबंधों ने
फटी पतंगे
ऊँचे बहुत उड़ाई, 
बौने
बांह सिकोड़
रहे हैं
गिरवी धर करधनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
खलिहानों सैंढ़ भूसिया
शिखर सा धसके
लौह इरादे,
खा खा मोती
कौवे नाचे
हंसों के हो रहे किवादे,
सागर सुआ
हवा में
मछली
पाल रहे हैं गुनियाँ  !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
अजगरी लपेटे
घोट रहे हैं
कंठ गले की सांसें, 
चिथड़े चिथड़े
हुई चिउँटियों
जिया धंसी जो फांसें,
साँस
उंगलियाँ गिन गिन
नब्ज नसी
बेचे हर बनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
चंपईया पन्नों
भर बगरी है
स्याही शेष कमाई,
जुड़े संबंधों ने
फटी पतंगे
ऊँचे बहुत उड़ाई, 
बौने
बांह सिकोड़
रहे हैं
गिरवी धर करधनियाँ !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ ! 
खलिहानों सैंढ़ भूसिया
शिखर सा धसके
लौह इरादे,
खा खा मोती
कौवे नाचे
हंसों के हो रहे किवादे,
सागर सुआ
हवा में
मछली
पाल रहे हैं गुनियाँ  !
भीतर मेरे
बसी है
गीतों की
सतरंगी दुनियाँ ! 
ओंठों धुनती
जैसे
ताज़ा रुई
धुनें धुनियाँ !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Friday, 26 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [अंधेरों का मारा]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...


अंधेरों का
मारा
सूरज बिचारा
पी लेगा
लगता है
बूंद बूंद नदियाँ !
झरनों
तलैयाँ
काबिज बिलैयाँ
बस्तों में
कूप छुपे
खजुआते गदियाँ !  
बेंच कर सितारे
नीले
आकाश को
अमावस
की गोद में
सोई है जोंधैया,
खा खा अंगारे
इंतज़ार भोर का
दूर हुई ढिबरी
प्यासी है
खूंटे की गैया,
चंद्रमुखी
वादे
पीठों में लादे
सागर में
चरवाहे
फोड़ रहे अखियाँ !
 अंधेरों का
मारा
सूरज बिचारा
पी लेगा
लगता है
बूंद बूंद नदियाँ !
झरनों
तलैयाँ
काबिज बिलैयाँ
बस्तों में
कूप छुपे
खजुआते गदियाँ !  
बरगद के नीचे
पनपे बबूलों के
संबोधन
सुनो नहीं
जडमूंल से उखाड़ो,  
दूध धोये कांटे
छेदेंगे ऐंडियाँ
खोद कर
खादनियाँ
पुरसा भर गाडो, 
ऊगे न
दुबारा
कोई लम्यारा
उखारे पछारे
उधेरे न
छैयां की बखियाँ  !
अंधेरों का
मारा
सूरज बिचारा
पी लेगा
लगता है
बूंद बूंद नदियाँ !
झरनों
तलैयाँ
काबिज बिलैयाँ
बस्तों में
कूप छुपे
खजुआते गदियाँ !  
कब तक
जिओगे दमघोटू
गुमनामी का जीवन
कितना पियोगे
नाँदों का माठा,
कूटेंगे धर्मी
निकारेंगे
महुआ का स्यासा
बनायेंगे
लडुओं का लाठा,
बैसाखी
कंधे
सावन के अंधे
ढोते विरासत
बीती हैं
नकुओं में शदियाँ !
अंधेरों का
मारा
सूरज बिचारा
पी लेगा
लगता है
बूंद बूंद नदियाँ !
झरनों
तलैयाँ
काबिज बिलैयाँ
बस्तों में
कूप छुपे
खजुआते गदियाँ !  



भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763


Thursday, 25 April 2013

हिंदी साहित्य के केंद्र में [भोलानाथ के नवगीत]


मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...


घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
आस्तीनों के पाले
दूध धोये
कोबरे गड़ईतों का
कालकूट आखिर
काम नहीं आया, 
अनचीन्हीं
वेदना की बांसुरी
आसमानी
ओंठों में खौलते
अहम् ने जी भर सजाया, 
अंधी लोलुपता का
अनुरागी
वैभव बिचारा
खुद की
जागीर समझ
अपने औरस को
कंचों सा खेला !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
सिरहाने सुलगते
विचारों को
परिभाषित करेगी अहिंसा
दुनियाँ ये कैसे
गीता की बानी, 
खंती में बूड़ीं
फिकर नहीं बीनों की
मस्त हैं
जुगाली में भैंसे
पी पीकर पानी, 
बिसातों में
शल्य के
रंगीले
बजीरों का
पता नहीं
घोड़े हैं गायब
घूम रहा हाथी अकेला !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
नई नई कोंपल की
उलहन सी
दिखते हैं दूर से
जड़ मूँड
ठूँठों डरईयों के तोते,  
खुली आँखों के
इंद्रजाल
फेंक रहे पाँसे
अक्सों का रंग उड़ा
आईने क्या रोते, 
शतरंगी
मंसूबों की
गठरी से
गायब
संकल्प के बगीचे
बंदरिया के
हाँथ खेतों के केले !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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भोलानाथ के नवगीत [घुरुर घुरुर सांसों की भट्ठी में]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...


घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
आस्तीनों के पाले
दूध धोये
कोबरे गड़ईतों का
कालकूट आखिर
काम नहीं आया, 
अनचीन्हीं
वेदना की बांसुरी
आसमानी
ओंठों में खौलते
अहम् ने जी भर सजाया, 
अंधी लोलुपता का
अनुरागी
वैभव बिचारा
खुद की
जागीर समझ
अपने औरस को
कंचों सा खेला !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
सिरहाने सुलगते
विचारों को
परिभाषित करेगी अहिंसा
दुनियाँ ये कैसे
गीता की बानी, 
खंती में बूड़ीं
फिकर नहीं बीनों की
मस्त हैं
जुगाली में भैंसे
पी पीकर पानी, 
बिसातों में
शल्य के
रंगीले
बजीरों का
पता नहीं
घोड़े हैं गायब
घूम रहा हाथी अकेला !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !
नई नई कोंपल की
उलहन सी
दिखते हैं दूर से
जड़ मूँड
ठूँठों डरईयों के तोते,  
खुली आँखों के
इंद्रजाल
फेंक रहे पाँसे
अक्सों का रंग उड़ा
आईने क्या रोते, 
शतरंगी
मंसूबों की
गठरी से
गायब
संकल्प के बगीचे
बंदरिया के
हाँथ खेतों के केले !
घुरुर घुरुर
सांसों की
भट्ठी में
ढलती है कविता
उमड़ता है
ओंठों में
शब्दों का रेला ! 
खजही तलैया में
डूबा दुर्योधन
अपने ही
मनमाफिक
लक्ष्यों का चूका
अर्जुन की
छाल सा उकेला !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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Wednesday, 24 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [आँधियों से]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
शदियों की
संस्कारी रुढियों का
पुख्ता पाखंड
निथरेगा बूंद बूंद
कोढ़ी मवाद सा,
गांधारी
आस्था का दौर
अभी जारी है
अधूरी है भीम की प्रतिज्ञा
भीतरी अवसाद सा,
कई कई
जन्मों की
नींद की खुमारी में
बोझिल हैं आँखें
पूरे होसाबास में
अभी नहीं
आई हैं
और न ही जागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
घाटियों की छातियों के
चट्टानी पत्थर
फोड़कर निकलेगा
पिघल पिघल
मौन लाबा का झरना,
फेंक फेंक
कंकड़ियाँ देखना
धागों से
नापना ठहरी गहराई
फिर पार वैतरिणी करना,
उड़ाईं नावें
हवा में
फूंक में
गलाया है
लोहे सा
औरों का पौरुष
भांज भांज कर जलेबियाँ
पानी में पागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !
नीतियों के नायक
दे दे दुहाई
पंडित चाणक्य की
बैलों सा जोता
खिंचवाई बग्घियाँ,
ध्वस्त हुये
रंग मंच
टूटे संबंधों के नाटक
चिंदी चिंदी जांघिये की
बिखरी हैं धज्जियाँ,
करबर
पथरियों में
खूब घिसा चन्दन
गमगमाते
हाथों के मुरवे
महक रहीं नदियाँ
घाटों में
फूंक रहे गांजा बैरागी !
आँधियों से
ऐंठ रही
जली हुई
रस्सियों की ऐंठन
जाने पहचाने न
राखी का
ढेर हुई कबकी
ख़त्म हुई भीतर की आगी !
गली गली
रौंदेगी
गाडरों की रेवड़
खतही खुरों से
लेंडियों की
भष्मी बनेगी
रेशा रेशा
बिखरेगी धूल में अभागी !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
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संपर्क – 8989139763

Tuesday, 23 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [शरहद में]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

शरहद में
शीश कटे
ओंठों से
शब्द नहीं छूटे  ! 
शिश्नी
सबंध जिये
आँखों में
झांक झाँक झूठे ! 
चेहरों पर चहरे
लगाकर
अपने बेधर्मी
गंगा में
डुबकियां लगाईं,  
पकड़ पकड़
ओलियों में
जीवित मछलियाँ
मूली गाजर सी
भर पेट खाईं,
अक्षय वट के
सुधा कलश
पगडियों में
उनके ही फूटे !
शरहद में
शीश कटे
ओंठों से
शब्द नहीं छूटे  ! 
शिश्नी
सबंध जिये
आँखों में
झांक झाँक झूठे ! 
कितने ही
चूहे पेट में पचाये
बड़की
पंचाईत में
बैठी बिलैयाँ,
अहिंसा की
पक्षधर बताती
घडियाली
आंशुओं से
भर भर सूखी तलैयां,
नारे लगाते
लारियाये
थूथुन
कांडियों के कूटे !
शरहद में
शीश कटे
ओंठों से
शब्द नहीं छूटे  ! 
शिश्नी
सबंध जिये
आँखों में
झांक झाँक झूठे ! 
वस्त्र विरत
नाचती पुतरियों
को देख देख
चोरी छुपे
पीटी हैं तालियाँ,
आँगन में
घर के गाज गिरी
पानी पी
बादलों को
देने लगे गालियाँ,
उद्घाटन के
शिलालेख
मिटे नहीं
पुल सारे टूटे !
शरहद में
शीश कटे
ओंठों से
शब्द नहीं छूटे  ! 
शिश्नी
सबंध जिये
आँखों में
झांक झाँक झूठे !



भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763



Monday, 22 April 2013

छंद प्रसंग

छंद प्रसंग
मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
फिर भी 
घर के अन्दर का
सुन्दर नज़ारा है,
मेहनत कस 
आदमी का
सडक पर गुजारा है,
ठण्ड में ठिठुरते 
सुनता है
किस्से 
कहानी अलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
मेरे या 
औरों के कहने से
क्या होगा,
बदलेगी 
सोच उतरेगा
किस्मत का चोंगा,
सदियों से 
देख रहे 
लोग बाग़
चमकती 
पूंछें छलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
भारी भरकम हैं 
रुढियों के
ऊँचे टीले,
खेमों में 
बटे हुए 
लड़ रहे
कबसे कबीले,
खेतों की 
खबर नहीं
अख़बारों में होती हैं 
बातें पलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की


भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर , 
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०9425885234,8989139763

भोलानाथ के नवगीत [छवियाँ विलावों की]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
फिर भी 
घर के अन्दर का
सुन्दर नज़ारा है,
मेहनत कस 
आदमी का
सडक पर गुजारा है,
ठण्ड में ठिठुरते 
सुनता है
किस्से 
कहानी अलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
मेरे या 
औरों के कहने से
क्या होगा,
बदलेगी 
सोच उतरेगा
किस्मत का चोंगा,
सदियों से 
देख रहे 
लोग बाग़
चमकती 
पूंछें छलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की !
भारी भरकम हैं 
रुढियों के
ऊँचे टीले,
खेमों में 
बटे हुए 
लड़ रहे
कबसे कबीले,
खेतों की 
खबर नहीं
अख़बारों में होती हैं 
बातें पलावों की !
देखा नहीं 
अब तक
ऐसी छवियाँ 
विलावों की !
पकडती हैं 
जब तब
लोमड़ी 
मछलियाँ तलवों की


भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर , 
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०9425885234,8989139763

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...