Wednesday, 10 April 2013

भोलानाथ के नवगीत [रुक जा रे सूरज]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम नवरात्रि की पूर्व बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

रुक जा रे सूरज
रथारूढ़ तू
भरी दुपहरी
उछाल न आगी सिर के ऊपर !
सूखी नदियाँ
धूप नहायी
बुझी नहीं है
आग पेट की छाँव है दूभर !
अब और तुम्हारी
नीम गुरच की
मनमानी
मंजूर नहीं हमको
बने रहो तुम
क्षितिज के लोक नियंता,
उड़ती चीलें
जीवित गाय की
आँख निकालें
निर्भय होकर
सरग में नाचें
फूटी आँख जयंता,
त्राहि त्राहि
अब नहीं करेंगी
सूखी नदियाँ कोई
तेरे सम्मुख आकर !
रुक जा रे सूरज
रथारूढ़ तू
भरी दुपहरी
उछाल न आगी सिर के ऊपर !
सूखी नदियाँ
धूप नहायी
बुझी नहीं है
आग पेट की छाँव है दूभर !
अस्ताचल का
मोड़ नहीं है दूर तुम्हारे
बस पास बहुत है
अपनी मंजिल
सायद
तुमको बिसरी याद नहीं,
तेरे पीछे
अमृत घट लेकर
खड़ी है चंदा
झिलमिल तारों
साथ रहेगी
बरसायेगी सारी रात यहीं,
सात सवारी घोड़ों
का रथ छूटेगा अब
और लगामें
ढलानों पर !
रुक जा रे सूरज
रथारूढ़ तू
भरी दुपहरी
उछाल न आगी सिर के ऊपर !
सूखी नदियाँ
धूप नहायी
बुझी नहीं है
आग पेट की छाँव है दूभर !
पगडी बंधा ताज
तख़्त की
गरिमा के
अनुकूल नहीं हैं
धूमिल धूमिल लगती हैं
रत्नों की लडियाँ,
लेप शहद
ओंठों में
माथे की रोरी
भीतर ही भीतर
परियों की टोली
गिनती हैं हथकड़ियाँ,
प्रज्ञाओं की
आँख की ख्वाहिश
अरझी हैं
पलकों के दर द्वार पर !
रुक जा रे सूरज
रथारूढ़ तू
भरी दुपहरी
उछाल न आगी सिर के ऊपर !
सूखी नदियाँ
धूप नहायी
बुझी नहीं है
आग पेट की छाँव है दूभर !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

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