Tuesday, 18 June 2024

प्यार मिला न गीत मौज का

प्यार मिला न गीत मौज का 

न मुख कोरस 

गाया 

बस छूटी हुई  कहानी है ! 


कुछ तो था उन नम आंखों में 

आकंठ 

अभी तक 

डूबी वहीं जवानी है ! 


खोया ही खोया है 

मन मिला नहीं 

कुछ 

चित्र को मित्र बनाया है,


आंख से आंख का  

देखा 

सपना 

अब तक आंख समाया है, 


पल दो पल के उसी मिलन का 

झर झर के 

अरझा 

आंख बिरौनी का पानी है ! 


उस पार है तू इस पार 


हूँ मैं 

कैसे देता तुझे सहारा, 


गहरी धार की कस्ती 

उथले में 

डूबी

छू छू सतह किनारा, 


घनघोर घुपे बिखरे न बरसे 

बिरह पीर की 

कायल 

काया कसक पुरानी है  ! 


तू नदिया न मैं जल हूँ 

दोनों 

दूर के 

अलग किनारे हैं , 


भरी नदी की बहती 

बहर 

बिराये 

कानो लहरी गुंतारे हैं, 


गाने को कुछ शेष कहां है 

सूली चढ़ी 

मौज की 

मुखरित चतुर बयानी है ! 


भोलानाथ

Monday, 17 June 2024

गाया गुना न सुनी गाथा उनकी

गाया गुना न सुनी गाथा उनकी 

श्रीमुख के मेले ओठों के झूले 

मनचाहा झूले अकेले

ख्याति की खुशबू झरोखों से आई ! 


मन ऊबा ऊबा उथले में डूबा 

वेदांति कुनबों के ठूंठे  

खन खन चंदन वनों को 

कनफुहियाँ महकी जबरन सुंघाई ! 


भगे भूत लातों के छिनरी जमातों के 

चर्चा के नायक ओढ़े आडम्बर 

तुलसी के चौरे 

कबीरा की लय में शैतानी गाने लगे हैं, 


भाव भजनों की घूंटी पिये मन की गंगाजली 

बाबागीरी न जाने 

शातीर मुखौटों के गिरगिट 

गुरमेटी टेंटे टका के केवल सगे हैं , 


फगुआ के रंग में रंगी व्यास गादी के 

आगे थिरकते 

ढांचों के 

बांकापन में पूरी की पूरी रासलीला समाई ! 


फुरकी में नदियां चुरूओं में सागर 

कखरी सरग सुख 

वैतरणी तारण अवतारी बाबा 

पूंछ बछिया की लहरों में डारे खड़े हैं, 


गील गोबर की गौरी चंदन का लीपा 

शिवालय के बाहर 

रगी की ठगी के संकल्प साधे 

छीनी छुड़ाई उपाधियों की जिद में अड़े हैं , 


गोंईडे की गौंखर की हरियर चरौंखर 

चरी गाय की देखा देखी 

खूंटे की बछिया 

चौकड़ियां भरने को भीतर  रम्हाई ! 


कथनी कथाओं के नवसिखिये वाचक के 

कच्चे जहन की 

कचनारी लपेटों लपट की परख नहीं 

नाहक ही घूर सा सुलग रहा गीला गीला , 


पानी पवन की पगड़ियां उछाले 

न समझे मर्म गीत का 

बड़बोली कुबोली का ठिकरा 

मूड़े मूड़े में फोड़े ख़ाली घड़े सा बाबा हठीला, 


लड़ती हवाओं से जलती दिये की पेंदी में 

पनपी 

सूर्य रथ लगाम थांम साजिस 

उबलती रही खीर सी ठंडी ठंडी कढ़ाई ! 


भोलानाथ

Sunday, 9 June 2024

कुछ मत कह कुहनी कखरी की

कुछ मत कह कुहनी कखरी की 

चटकी हडियों 

अधपक खिचड़ी 

निथर निथर बे बाट पड़ी है ! 


चेत,चबुतरे गाड़ न चिमटा 

धूनी धुंध 

धुआं के 

सम्मोहन से रैयत बहुत बड़ी है ! 


दूध भात की दिया दिखाते 

दौड़ न पीछे 

उड़ जाने दे 

ले के पिंजरा तेरा नहीं सुआ, 


मान ले कहना कोस न आंसू ढार 

धीर धर 

बिछ स्वागत में 

लौटी नैहर  छोटी बड़ी बुआ, 


टूटे मन की कान में मिश्री 

धीरे धीरे 

घोल 

चुनौती चकरफंद चौगान खड़ी है ! 


रामद्वार दरबार की पहरेदारी का जिम्मा 

मुंह 

औंधे गिरा 

मलिन मुख किया धरा सब फेल, 


राम की नगरी रमे राम की आरत कीरत 

ध्यान 

दसौना 

रामसिया मय जहन जिया न जाने खेल, 


विचलित तन मन का भ्रम सधे न साधे 

छलकी 

आंख 

हिदायत वक्ष धूप सी बहुत कड़ी है ! 


शपथ सिरोही पांव कटें या देह फटे 

दोफाड़ 

जिया 

दुशवार समय में दीपक सा जलना है, 


विघ्न विनायक किरदार के जैसा 

भौदा 

भरी लीक में 

सधे बैल सा बे पानी पग पग चलना है, 


भिन्न भिन्न मत पंथ पीर में 

उहापोह की 

जीवन 

शैली ,नागमणी सी मुकुट जड़ी है ! 


भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...