Friday, 10 February 2017

क्या कुछ भला करेंगे [ भोलानाथ के नवगीत ]

क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
हुडदंगी की
छीछा लेदर
कब समझेगी उपमानों की
रंग रंगोली,
काकर पाथर पन्नी पुट्ठे
भरे बोरियां
जतन जोगनिया
ताम झाम की हो ली,
अभ्यस्त झूठ रजवाड़े का
लतमार मदारी
रहे न अपनी हद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
डमरू माँदल के तडकारे
भीड़ बरेदी
उलुकानों की
खूब बढ़ी है,
हलाकान बेहाल तबाही
छीना झपटी
मदिरा भांग सी
देह चढ़ी है , 
शैली शिल्प का लाटा फांदा
झलक रहा है
कलम कबाड़ की मद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !
खर पतवार की साझेदारी
उपज की छाती
कितने
और मढेंगे खेत,
पवन फागुनी गाल बजाये
क्या जाने
बैसाख मास की
आंधी पानी रेत,
पोंदी पैंया की खैरातें
गिन गिन कितने
ईंट धरेंगी कद में !
क्या कुछ भला करेंगे
नवगीतों का
घूर उजारों के मजमें !
परम्परा की नीव झेलती
देख देख कर
बूचड़खानों के सदमें !

 भोलानाथ 

लगे नहीं झपकी [भोलानाथ के नवगीत ]

लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
अस्ताचल ढलानों का
बेलगाम सूरज
फिर चाहे
संध्या के जूडे में
बांधना  फुलहरी,
सिन्दूरी घाटियों की
अविरल गोधूली
दिखे नहीं
काबिज सन्नाटे में
सांस की गिलहरी,
एकाकी वनखंडी
परचित पगडण्डी
दुहराये अनुभव की रंग भरी फाग !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
श्रोत चुका पोखर
झुठलाये कैसे
मलबे में दबे दबे
सुकसा सा सूख गईं
भीतरी मछलियाँ,
पपराई माटी पर
घोंघियों के ढेर लगे
बालू से आचमन को
मचल रहीं
कापती अन्जलियाँ,
अलखाये चुप्पियाँ
रंग घोल कुप्पियाँ
चुचुआई शीश पर पारण  के भाग  !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !
उजड़ी कस्तूरी की काया
फिर मायामृग की
कल्पित स्निग्धा
वर्णित सुडौल पर
मशाल सा जली,
रंग भेद आयु आक्षेप गौंड
आन मान
पीहर चौबारों की
शकुन छाँव 
साक्ष्य की धुली,
गंध की पुकारी
गुडहल की डारी
छिड़क रही ठूंठ पर फूल का पराग !
लगे नहीं झपकी
लौ दिया दिया भभकी
पतझर में जैसे फागुन की आग !
वल्गाएँ ढीली
घोड़ों ने पी ली
मरुस्थल में फिर से बासंती राग !

भोलानाथ


चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...