Friday, 31 May 2013

नवगीतों के उत्स में निराला---------[भोलानाथ]

नवगीतों के उत्स में निराला---भोलानाथ
भोलानाथ.....
निराला का आभिर्भाव भारतीय साहित्य-संसार का बसंतोत्सव है !अपने अनुभव और सामर्थ्य से जो भी और जैसा भी जितना भी साहित्य को टटोल और खंगाल पाया हूँ !नवगीत के फूटते हुए उत्स देख और समझ पाया हूँ !निराला जिनमे नवगीत का प्रथम उत्स फूटता हुआ दिखाई देता है संक्षिप्त परिचय नवगीत की गंगोत्री का आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ इस आशा और विस्वास के साथ की सुनी सुनाई भ्रांतियां के बहार निकल कर हम नवगीत की शक्ति और सामर्थ्य को समझ सकें !
विस्मार्क की लौह और रक्त की कूटनीति सेविषाक्त हुए विश्व में उन्नीसवीं शताब्दी जब दम तोड़ रही थी ,निराला का जन्म शताब्दी के अंतिम बसंत में २१फ़रवरी १८९९ के दिन बंगाल के मिदनापुर जिले की महिषादल रियासत में हुआ !निराला गढ़ाकोला का दैन्य और करुना ,महिषादल की सघन हरीत्मा ,बैस्वाडे का ठेठ पौरुष,वैदिक परम्परा पांडित्य लेकर अवतरित हुए ! वे आजीवन शोषण दुरव्यवस्था के अंधमहासगर मथते रहे, विष पीते रहे और अमृत बांटे रहे !निराला के जितने रंग हैं,उनके न रहने पर साहित्यिक बनियों ने उन रंगों से व्यापारिक मेले सजाये और अपने घर भरे,पर निराला के मन में बसे दीन- हीन मनुष्य के भाल का मंगल अभिषेक न हुआ !पुरुषोत्तम दास टंडन और रामचंद्र शुक्ल की उपस्थिति में साहित्य सम्मलेन में पीटने वाला निराला ,जिस भारतीय और भारतीय मनुष्य के गौरव के लिए लड़ता रहा, आज भी वह उतना ही बंधुआ है,उतना ही गिरवी,और उतना ही पराधीन है !
निराला के सामने जितने भी रस्ते थे,वे सब इतने संकीर्ण थे की उनके महाप्राण न तो उन्हें स्वीकार कर सकते थे,न तो उनमें उनका विराट व्यक्तित्व समा सकता था ! तो निराला के कवी को जीवन भर चट्टाने कटनी पड़ीं और पीठ पर नदी ढोनी पड़ी ! बस इसी संघर्ष और श्रजन के बीच अमृत का जो ज्योतिर्मय निर्झर,हजारों सालों से कुचले गए सामान्यजन के चुल्लू तक पहुँच पता है !उसे ही हम नवगीत की संज्ञा देकर निराला और निराला के बाद की छान्दसिक कविता को पंडों और प्रदुषण से मुक्त रखने की च्येष्ठ में जुटे हुए हैं !
निराला के श्रजन में उनके संघर्ष और उनके संघर्ष में इस सृजन को देखे बिना,न तो नवगीत के प्रथम उत्स के रहस्य को समझा जा सकता है और न ही निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व की व्याख्या की जा सकती है !पारम्परिक काव्य और कविता की राजनीती से कविता की विशुद्ध धरा को फोड़ कर निकलने में जहाँ चट्टानें कटीं वहीँ नवगीत का जनम हुआ और जहाँ छेनियाँ टूटीं वहां कविता छंधीन होकर रह गई !
बाद में इसी छंधीन कविता को कविता के बनियों ने नई कविता की संज्ञा देकर बेंचना – भांजना शुरू कर दिया ! फिर तो बाकायदा इसका उत्पादन भी प्रारंभ हो गया !सस्ती चीजें जल्दी बनती हैं और जल्दी बिकती हैं !लोकप्रियता अर्जित करने के के सूत्र खोज निकाले गएऔर इस तरह नई कविता और पारंपरिक सस्ते गीतों के नियोग से अक अलग ही प्रकार की कविता का जन्म हुआ !जिसे आजकल मंच की कविता के नाम से ख़रीदा और बेचा जाता है!कौन कला,परिश्रम और समय के संकट में पड़े !लोग तो आनन् फानन रहीस बनाना चाहते हैं! कविता के रहीसों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है !
निराला के सामने दोहरी कठिनाइयाँ थीं ! अक तो उन्हें निरंतर प्रयोग से गुजरना था दोसरे तमाम तरह के घटिया लोगों के सामने अपनी प्रमाणिकता को बनाये रखना था !यही करण है की प्रयोग के तहत उनहोंने कभी छंद को छोड़ा और कभी छंदों के अभिनव प्रयोग किये !उन्हें निरंतर इन दोनों ही प्रकार की कविताओं की प्रमाणिकता के जिस तत्कालीन मठाधीशों से जूझना पड़ा !महावीर प्रसाद दूवेदी ने गढ़ाकोला से दौलतपुर तक निराला के ढोये आम तो खा लिए उनकी कविताएँ छपने से परहेज ही करते रहे !रामचंद्र शुक्ल से तो उनकी बराबर ठनी रही !रामचंद्र शुक्ल पर निरालाजी की लिखी हुई कविता का यह अंश,उनकी विनोद प्रियता, विरोधिओं को आड़े हांथों लेने को सदा तत्पर रहना तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को प्रतिकूल समय में भी बनाये रखने की अदभुतक्षमता का परिचायक है !
- जब से एफ.ए.फेल हुआ,
- हमारा कालेज का बचुआ !
- हिंदी का लिक्खाड़ बड़ा वह .
- जब देखो तब ऐडा पड़ा वह,
- छायावाद रहस्यवाद के
- भावों का बटुआ !
आरोप की भाषा में अक बात कही जाती है की, लोग अपनी विधा को निराला से जोड़कर महान बन्ने में जुटे हुए हैं ! यह दंभी मनुष्यों की अधकचरी मानसिकता प्रलाप है ! ऐसे लोग न तो निराला को और न ही परवर्ती नवगीतकारों को समझना चाहते !ये लोग तो साहित्य की दलाली करने में सर्वस्य देखते हैं !आज की वामपंथी एवम् दक्षिण पंथी साहित्यिक संस्थाएं ऐसे ही दलालों की गिरोह बनकर रह गेन हैं !ये संस्थाएं पुरोधा कवियों का यश उड़कर बड़ी बनी हैं ! जबकि आज का नवगीतकार भारतीय कविता को आधुनिक संस्कार देने में साधना रत है ! किसी तरह के वाद से मुक्त,राजनैतिक प्रपंच से दूर रहकर छान्दसिक अभिव्यक्ति को नए क्षितिज देने में वह इतना मुग्ध एवम्मस्त है की प्रतिस्पर्धा की घटिया दौड़ में सम्मलित होने का न तो उसके पास समय है और न ही मानसिकता ! स्वयं निराला वादों के संक्रामक रोगों से कितने मुक्त थे,उनकी मास्को डायलाग्स शीर्षक कविता से यह बात समझी जा सकती है !
फिर कहा, मेरे समाज में बड़े बड़े आदमी हैं,
एक से एक मुर्ख,उनको फ़साना है !
XXX XXX XXX XXX XXX
उपन्यास लिखा है,जरा देख दीजिये
अगर कहीं छप जाय
तो प्रभाव पद जाय उल्लू के पट्ठों पर !
XXX XXX XXX XXX
देखा उपन्यास मैंने
श्री गणेश में मिला
पृय अस्नेह्मयी स्यामा मुझे प्रेम है ,
इसको फिर रख दिया, देखा, मास्को डायेलाग्स
देखा गिडवानी को !
निराला का जो अनुभव संसार था उसे चित्रित करने के लिए,उनके पास समय भी तो न था !उसे किसी भी तरह व्यक्त कर देने की गरज से निराला को कभी छंदों से नीचे भी उतरना पड़ा ! यह निराला के लिए निहायत जरुरी था ! किन्तु अपनी रचनात्मक समाधि के क्षणों में उन्होंने जो भी रचा,वे भारतीय कविता के अद्धितीयनमूने हैं !छंद निबद्ध ऐसी ही कविताओं को हम हिंदी के सबसे पहले नवगीत कहते हैं !
बानगी ……
नव गति,नव लय,ताल छंद नव
नव नभ के नव विहगवृन्द को
नव पर नव स्वर दे !
वीणा वादिनी वर दे !
ये पंक्तियाँ नव्यता के प्रति निराला की उत्कट ललक को व्यक्त करती हैं !वीणा वादिनी माँ सरस्वती की वंदना में लिखी गई यह कविता, न केवल निराला के उत्कृष्ट नवगीत, नवगीतकार होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है बल्कि इससे यह भी सिद्ध होता है की वे निरंतर नव्यता के अन्वेषण में लगे रहे ! कवी की यह अन्वेषण शक्ति ही उसकी मौलिकता और वैक्तिक पहचान को विस्तार देती है !छान्दसिक अभिव्यक्ति के लिए ही नहीं नवगीत की मूलभूतविशेषताओं और प्रवृतियों और भविष्य के प्रति निराला कितने सचेष्ट थे,बीज रूप में इन साड़ी चीजों को इस गीत में उन्होंने संचित कर दिया है !उनका “स्व” सदैव का प्रतिनिधि रहा है ! कविता से सबका मंगल हो यह कामना करते हुए कविता नव्यता – भव्यता से समृद्ध हो सभ्यता की अनमोल धरोहर बने,निराला की यह संवेदना-सदभावना ही संभावनाओं के नए द्वार नए आकाश खोलने के लिए उन्हें प्रेरित करती रही !
नव गति,नव लय,ताल छंद नव
नव नभ के नव विहगवृन्द को
नव पर नव स्वर दे !
वीणा वादिनी वर दे !
की प्रार्थना और कामना करने वाला कवी जब अतुकांत और छंद हीन कवितायें लिखता है ! तब यह और भी महत्त्व पूर्ण हो जाता है की कसौतिओं की जांच परख कर ली जाय, फिर सुवर्ण पर हाथ रखा जाय !निराला के मुक्त अथवा रबर या केचुआ छंद एक और साहित्यिक मठाधीशों की आलोचना का शिकार होते रहे और दूसरी और कला और कविता से बाहर की दुनियाँ के लिक्खाडों के कविता लिखने का मार्ग प्रशस्त करते रहे ! और छंद मुक्त कविताओं से किताबें, पात्र पत्रिकाएं ही नहीं कविता के मंच तक भर गए !
किन्तु निराला की छंद मुक्त कविताओं में नवगीत की वे प्रवृतियां जो निराला के समकालीन गीतों और निराला के बाद के नवगीतकारों के के गीतों में विकसित हुईं प्रचुर मात्र में देखि जा सकती हैं !काव्यात्मक अभिव्यक्ति की अनिवार्य शर्त है गति,लय,एवम् ताल, यह निराला की मुक्त छंद कविताओं में भी नए रंग और प्रभाव के साथ मुखरित हुई हैं ! निराला के मुक्त छंद इन शर्तों को नागरिक गेयता के वंचन-वनवास सहकर भी पूरा करते हैं !”जूही की कलि””संध्या सुंदरी”अथवा “जागो फिर एक बार”जैसी कवितायें बिम्ब योजना,चित्रात्मकता, लय और कथ्य की बंकिम नवीनता के अनुपम उदहारण प्रस्तुत करती है !
विजन वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी-स्नेह-स्वप्न-मग्न
अमल-कोमल-तनु तरुणी-जूही की कलि
दृग बंद किये शिथिल पत्रांक में !
               (जूही की कली)
“मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुंदरी पारी सी
धीरे-धीरे-धीरे !
       (संध्या सुंदरी)
“जागो फिर एक बार” उनकी अतुकांत और छंद मुक्त कविता है,किन्तु इसका निम्न अंश देख कर कौन कह सकता है कि,यह कविता छंद हीन होगी
सवा सवा लाख पर
    एक को चढाऊंगा,
गोविन्द सिंह निज
   नाम जब कहाऊंगा,
शेरों की मांड में
   आया है फिर स्यार,
जागो फिर एक बार !
यांत्रिकता के इस दौर में व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति छोभ और आक्रोश के बीज निराला की कविताओं में नए तेवर के साथ प्रस्फुटित होते हैं आज के प्रायः सभी समर्थ नवगीतकारों के नवगीतों में यह छोभ और आक्रोश पूरी समर्थता के साथ व्यक्त होता है ! निराला कुछ इस तरह उगलते हैं यह आग ---
वहीँ गंदे में उगा देता हुआंबुत्ता
पहाड़ी से उठा सर ऐंठ कर बोला कुकुरमुत्ता !
      निराला अपने युग के सबसे विलक्षण कवी थे ! कविता को लेकर जितने प्रयोग उन्होंने किये उनके मुकाबले हिंदी ही नहीं भारतीय संस्कृत साहित्य में भी कोई कवी नहीं टिकता !अन्वेषण और प्रयोग के समय लिखी गई कविताओं में जितने मूल्य,अर्थ और बोध वे दे जाते हैं वह दुर्लभ है !वे सत्य के साधक थे !उन्हें परम्पराओं को तोड़ने और नए प्रतीक निर्मित करने में बड़ा सुख मिलता था !
कुकुरमुत्ता,खजोहरा,भावों का बटुआ,अनामिका,परमिल,जूही की कलि,चमेली,जैसी कविताओं तथा चतुरी चमार,देवी,कुल्लीभाट एवं बिल्लेसुर बकरिहा जैसी कहानियों ने नए नए प्रतीकों को जन्म ही नहीं दिया बल्कि संघर्ष के बीच जन्मने वाली कविता के सामने नए प्रतीकों और पात्रों के सृजन के नवद्वार भी खोले प्रतीकात्मकता लघु कलेवर नवगीतों के आवश्यक तत्व ही नहीं प्रमाणित हुए,आज नवगीत प्रतीकों के न्वान्वेशण के आधार भी बने हैं !
     ध्वनियों के आवर्त, बिम्ब योजना,शब्द लाघव,प्रतीकात्मकता,चित्रात्मकता.एवं,लय संयोजन की आधुनिक प्रवृतियां नवगीत को निराला से ही प्राप्त हुईं !यथार्थ के धरातल पर खुरदरे शब्दों का कलात्मक प्रयोग निराला के पहले नहीं देखा गया !प्रयोगवादी दृष्टि से निराला सबसे अनूठे और अकेले कवी थे !यह अकेलापन उन्होंने सदैव महसूस किया ! नवगीत की तमाम शर्तों को पूरा करने वाला यह गीत उस युग में उनकी एकान्तिक अनुभूति को व्यक्त करता है !
मैं अकेला,
देखता हूँ,आ रही
 मेरे दिवस की सांध्य बेला !
पके आधे बाल मेरे,
हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मंद होती जा रही
           हट रहा मेला !
जानता हूँ, नदी झरने,
जो मुझे थे पार करने,
कर चूका हूँ,हंस रहा यह देख
             कोई नहीं मेला !
निराला जीते जी, नव गति नवलय,-छंद नव तथा नव नभ,नव विहंग,तथा नव पर और नव स्वर से युक्त गीतों के मेले देखने को ललकते तरसते अवश्य रहे !पर आज हिंदी का साहित्य नवगीतों और नवगीत –करों के इस भव्य मेले पर गौरव कर सकता है ,जिसे जिसे नवगीतकारों की चार-चार पीढियां सजाने में व्यस्त हैं !

भोलानाथ

भोलानाथ के नवगीत [हवाओं से पूंछा]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...खेल खेल जज्बातों से

हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
बताऊँ मैं कैसे
समझाउं मैं कैसे
न अपनी
राहें अलग हैं
न अपने
दिल ही जुदा हैं,
तुमसे हम दूर हैं
कितने मजबूर हैं
न मंदिर की
देवी हो तुम
न मस्जिद के
हम ही खुदा हैं,
न ठूंठों को सींचा
न ऊँटों को खींचा
रेतीले टीलों का
अनुभव कुछ ऐसा रहा है
दिल से ही दिल
यों हलाल हो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
न भनक
दूरियों की
न खनक चूड़ियोंकी
भीड़ भाड़े के
सूने हैं दिन
और सूनी हैं रातें,
बिम्ब सभी
प्यार के
आंख में उधार के
लगते हैं ठगे ठगे
कुचले कनेर की
उजड़ी कनातें,
काँटों में बबूल के
पांव छेदे हैं उसूल के
और छज्जों का खालीपन
पसरा सन्नाटा
ऊब और उबासी को
मौन धो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !
रेत के फब्बारों सी
चैत के जवारों की
धुली धुली
यादों में
पहली मुलाकातों की
आधी मुस्कानें,
कथा व्यथा गाँव की
अमुआं के छाँव की
भरती हैं भीतर
चौकड़ियाँ
छूटीं जो
पिछली पहचानें,
घरौंदे वे रेत के
हरे हरे चने खेत के
छोटी तलैया के छूटे दिन
नौका बिहार के
बांसुरिया सुनने का
मन हो रहा है !
हवाओं से पूंछा
फिजाओं से पूंछा
और पूंछा है हमने
समुन्दर के जल से
मेरी वफ़ा का
क्यों दिल रो रहा है !
सन्नाटे आँखों के
बगुलों के पंखो के
उड़ते इशारों ने
कुछ हमसे ऐसा कहा है
आँखों का सपना
आकाश खो रहा है !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -०8989139763

Wednesday, 29 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [खेल खेल में]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...खेल खेल जज्बातों से

खेल खेल
जज्बातों से
दिल
गिरगिट सा
रंग
बदलता है !
जैसे
मेले में
बच्चा
पाने को
हर चीज
मचलता है !
रंग बिरंगी
इस
दुनियां में
कौन से
रंग हैं अपने,
जाने कैसे
पहचानें
कैसे
हवा में
उड़ते सपने,
जब तक
सीने में
दिल है
देंह में
खूब
धडकता है !
कैसा
बंधन
कैसा रिश्ता
कैसा दिल से
दिल का नाता है,
समझ सका
न नब्ज
टटोली
न कोई किसी को
समझाता है,
देख देख कर
पढ पढ
चहरे
रट रट पन्ने
बहुत
पलटता है !
मनमाफिक
सीढी पर है
चाँद
आज का
आधा खिला हुआ,
सोई साँझ
रात की
गाथा
सपनों भरा
पराग चुआ,
कानाफूसी
हुआ
सबेरा
धूप में
दर्द
पिघलता है !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर ,
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989139763

Tuesday, 28 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [पाले हैं अंधे इरादे]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .

पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !  
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
रगड़ते सुमेरु से
टूटी रीढ़
छिली देह
देखे न कोई
वाशुकी की पीड़ा,
चीलों की आँख में
सागर की चट्टानें
दिखतीं
कुबेर का जखीडा,
तिलिस्मी
गुब्बार में
तितली के
पंखों सा
बिखरी है कबसे जवानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !  
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
खौंद खौंद धरती पाताल
सब एक किया
और बने रहे
कातिक के भैंसा, 
बुनते रहे
जालों पर जाले
गिरते रहे मकडजालों से
मकड़े के जैसा,
गा गा
कर लोरी
दे दे कर थपकी
नाती सुलाती
आँगन में नानी !
पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !  
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !
कोबरे गड़ैतों को
घेर घार
नेवलों ने
अपने मुंह पंजों से मारा,
शोक सभा तोड़ रही
बरगद की टहनी
दुबका है
खोखल में सारस बेचारा,
पोथी
पुराणों की
कामधेन 
खींसा कचहरी में
सच सी हेरानी !
 पाले हैं
अंधे इरादे
थके नहीं
देव दानव
हिला नहीं पानी !  
हारे न
मथते समुन्दर
सुन सुन
युगों से
परियों की थोथी कहानी !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763




Saturday, 25 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [दूध धुली पगड़ी के पैंतरों से]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .

दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
चाटुकार
चोरों ने
असली डकैतों को
पहना कर राजमुकुट
दे दी शिव संज्ञा,
भजन मुखी
ओंठों का
रक्त नहीं छूटा
बूचड परनाले सी
गंधाती गंगा,
कोल्हू
कोनैतों में
भैस बंधी
कांडी
कोदई सी
कूट रहीं सामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
ग्रहण लगा सूरज
क्षितिज छोड़
चाह रहा
नालों परनालों में
डूबकर नहाना,
खंती की
छोटी मछलियाँ
क्या जाने
बगुलों की आँखों का
शातिर निशाना,
प्राणभेदी
किरणों की
होती हैं
गुपचुप
भेडियों के
बीच में नीलामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !
कोयले की खानों में
कितने
दधीचों ने
जनहित की खातिर
प्राण तजे अपने,
छूटा है
कोरों का काजल
आँखों में
आये नहीं
अभी तक शतरंगी सपने,
लिपी पुती
ऊपरी
अटारी से
गिरगिट सी
झाँक रहीं
लाल पीली नाकामियाँ !
दूध धूली
पगड़ी के
पैंतरों से
बंधी रहीं
दीमक की
बड़ी बड़ी बामियाँ !
करती रहीं
खोखल
ताजो तख़्त
पलती रहीं
शाही
आस्तीनों में खामियाँ !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Friday, 24 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [एक अरसे से]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं .

एक अरसे से
अपनी उनंगों के
साथ जिये
बेले की गंध सी
महकती आशायें !
काँटों के
वन की
बेपनही यात्रायें
छेदती रहीं पांव
अर्जित सुविधायें !
अपनी
जरूरत पर
मंदिर की मूरत पर
चड़ावे का
चलन चला ऐसा,
अपना कहा
करू हुआ
उनका
कल्पतरु हुआ
गंगा मैया के जैसा,
ओंठों पर
छद्मी मुस्कानों के
छंद लिये
बोलते रहे
मढते रहे घोषणाएँ !
एक अरसे से
अपनी उनंगों के
साथ जिये
बेले की गंध सी
महकती आशायें !
काँटों के
वन की
बेपनही यात्रायें
छेदती रहीं पांव
अर्जित सुविधायें !
हम लिखते रहे
गीत ग़ज़ल
गाते रहे करूणायें
दिवस
दुविधा में बीता,
साँझ ढली
रात में
दिखे नहीं
आँख में
घिनौची घड़ा रीता,
ठाठों में
बाँध रहीं
मकड़ियाँ लार लिये
बुनती हैं जाले
खींच कर सिरायें !
एक अरसे से
अपनी उनंगों के
साथ जिये
बेले की गंध सी
महकती आशायें !
काँटों के
वन की
बेपनही यात्रायें
छेदती रहीं पांव
अर्जित सुविधायें !
घायल हैं पनघट
चोटिल
पनहारियाँ
कुंठित है
भींगा आँचल,
घूँघट की
मृग्छ्लना
आँखों
चौकड़ियाँ
धोती हैं काजल,
आंशू हैं
अपनी आँखों की
शाख लिये
भीतर की लाज सी
सिकुड़ती व्यथायें !
एक अरसे से
अपनी उनंगों के
साथ जिये
बेले की गंध सी
महकती आशायें !
काँटों के
वन की
बेपनही यात्रायें
छेदती रहीं पांव
अर्जित सुविधायें !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर ,
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -8989139763

Thursday, 23 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [कभी कोई पूछे तो हम जीते हैं कैसे]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक विरह नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...

कभी कोई पूछे तो हम जीते हैं कैसे
शब्दों के बीच में रहते हैं कैसे !
ये नगमा ये बातें लगती हैं
हमको अब सपनों के जैसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
आपने तो सुन कर
बहलाया है खुद को
ये गीत ग़ज़ल औरे नगमे,
हमें भी बताओ
कैसे जियें हम
किसके सहारेशब्दों के जग में,
इस तरह मुस्करा कर
याद हमको दिलाया करो ना तुम ऐसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
कभी कोई पूछे तो हम जीते हैं कैसे
शब्दों के बीच में रहते हैं कैसे !
ये नगमा ये बातें लगती हैं
हमको अब सपनों के जैसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
बैठें हैं अभी अभी
अनचीन्हे चेहरों की
तस्वीरें को लेकर,
रात आधी होने को है
सो जायें कैसे और किसे
शुभ रात्रि कह कर,
हमदिल जले हैं
मरहम लगाया करो ना तुम ऐसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
कभी कोई पूछे तो हम जीते हैं कैसे
शब्दों के बीच में रहते हैं कैसे !
ये नगमा ये बातें लगती हैं
हमको अब सपनों के जैसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
टूटे हैं हम
खिलौनों के जैसे
चाहत हमारी मिली ना हमें,
अपनी जुबानी
दर्दे दिल की कहानी
रो रो के कैसे सुनाएँ तुम्हें,
दुखती रग पर फेरो न ऊँगली
समझो व्यथा तुम रुलाओ ना ऐसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !
कभी कोई पूछे तो हम जीते हैं कैसे
शब्दों के बीच में रहते हैं कैसे !
ये नगमा ये बातें लगती हैं
हमको अब सपनों के जैसे !
जिन्दगी को जिन्दगी बनायें हम कैसे !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन.अच्. -७ कटनी रोड मैहर ,
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -8989139763

Monday, 20 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [आड़े तिरछे कुबड़े कन्धों]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का साहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ..

आड़े तिरछे
कुबड़े कन्धों
टाँगे जाल
डाल डाल कर
हाथ का दाना
बाग बगीचे
ओट में हीचे
झुरमुट
भौंचक हुये बहेलिये !    
तीतुर लावा
मोर परेबा
गलगलियों ने
सीख लिया है
जाल काटना
अमुआं डारी
छाँव दुलारी
सुआ हुये
चोंचों घोडचढिये ! 
छोड़ दिया है
कांटेदार बबूल
की टहनी
लिया बसेरा
महुआ बरसज
चोंच पकी है
चार चिरौंजी
तेंदू का विश्राम,
नीम निमौली
शीतल छाया
पके पपीता
आँख बसे हैं
पानी पनघट
की रहवासी
चतुर चिरैया
हो गई चारो धाम,
पिंजरे की
गल गईं
सलाखें
पंख कुतरतीं
कैंची देखें
आँख फाड़कर
मैना बैठी
किले कंगूरे
फतवा फ़ाँसी पढिये !
आड़े तिरछे
कुबड़े कन्धों
टाँगे जाल
डाल डाल कर
हाथ का दाना
बाग बगीचे
ओट में हीचे
झुरमुट
भौंचक हुये बहेलिये !    
तीतुर लावा
मोर परेबा
गलगलियों ने
सीख लिया है
जाल काटना
अमुआं डारी
छाँव दुलारी
सुआ हुये
चोंचों घोडचढिये ! 
नीलकंठ की
चोंच बंधा है
नया दशहरा
क्षितिज को छूने
नई उड़ाने
खोजें आँखे
भूली बिसरी
दूध की नदियाँ,  
सारस सहज नहीं
दिन काटे
भूखे रह कर
लडे चील से
लोहित पखने
हरे घाव हैं
पानी पी पी
बीती कितनी शदियाँ, 
बाज उलूकों
की चालाकी
कोयल भांपे
जब तब
मौन रही
समय समझ
सुर साध के बोली
कठकोली से माफिक
माटी मूरत गढ़िये !
 आड़े तिरछे
कुबड़े कन्धों
टाँगे जाल
डाल डाल कर
हाथ का दाना
बाग बगीचे
ओट में हीचे
झुरमुट
भौंचक हुये बहेलिये !    
तीतुर लावा
मोर परेबा
गलगलियों ने
सीख लिया है
जाल काटना
अमुआं डारी
छाँव दुलारी
सुआ हुये
चोंचों घोडचढिये ! 
कलाबाज कौआ
अचरज में
हंस उड़ानों
के संभावित
चिन्हों की
दिशा दशा
रंगीन तितलियों के
पंखों से पूंछे,
बतबढ़ उद्घोषों का
महारथी
कथा सुनाकर
प्यासे पपीहे को
सागर के
चुल्लू भर
पानी में
डाल रहा घट छूंछे,
गिद्ध गरुण 
चीलों के
पंजों ने
बहुत लिखे
चुनगुन की छाती
मौजी हिंसक
आखेटों के किस्से
हारिल कलगी
घाव नहीं मढिये !
आड़े तिरछे
कुबड़े कन्धों
टाँगे जाल
डाल डाल कर
हाथ का दाना
बाग बगीचे
ओट में हीचे
झुरमुट
भौंचक हुये बहेलिये !    
तीतुर लावा
मोर परेबा
गलगलियों ने
सीख लिया है
जाल काटना
अमुआं डारी
छाँव दुलारी
सुआ हुये
चोंचों घोडचढिये !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Sunday, 19 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [भाषाई समुन्दर की]

गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...


भाषाई
समुन्दर की
गहराई
बामी बमीठियों
की खाई
दीमक
क्या जाने !
पेट और
प्रजनन की
आग में
होम हुए
चन्दन वन
समिधा सी 
राख में समाने ! 
जहर बुझे
प्रश्नों की
जलती अंगीठी में
उबल रही
गंगा गंगोत्री की धारा,
आँख बंद किये
पुरसा भर
मुँह खोले लील रहा
जीवित मछलियाँ
कबंध सा किनारा,
स्तुतियों में
देव जुटे
इन्द्रासन
हिले नहीं
शेष नाग
सोये
बिष्णु के सिराने !
भाषाई
समुन्दर की
गहराई
बामी बमीठियों
की खाई
दीमक
क्या जाने !
पेट और
प्रजनन की
आग में
होम हुए
चन्दन वन
समिधा सी 
राख में समाने ! 
देवधर प्रतिज्ञा
प्रतिबंधों में
बदली
उदंड हुईं
हरी तुलसी परछाईयाँ,
कितने ही
वीरों के
शीश कटे
झुके नहीं राजमुकुट
देह दिखती हैं झाईयां,
अकल
आँखों का
ताल मेल
नीम हुआ
बातों में
बिदुर बँटे
मौन हैं बहाने !
भाषाई
समुन्दर की
गहराई
बामी बमीठियों
की खाई
दीमक
क्या जाने !
पेट और
प्रजनन की
आग में
होम हुए
चन्दन वन
समिधा सी 
राख में समाने ! 
समाधियों में
संत हैं
धुन्धलाये हाशियों में
कुंठित हैं
अंतहीन हादसे, 
फ़तवा
फरमानों की
पढ़ पढ़ के सूची
सहमे मृग छौंने
खबर आई जो माद से,
सगुन
समय नहीं
लिखना है
छेनियों से
शिलालेख
मायावी
द्वार के मुहाने !
भाषाई
समुन्दर की
गहराई
बामी बमीठियों
की खाई
दीमक
क्या जाने !
पेट और
प्रजनन की
आग में
होम हुए
चन्दन वन
समिधा सी 
राख में समाने ! 

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763


Saturday, 18 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [मर खप के]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
बहुत हुआ
परभक्षी बगुलों के
आगे और पीछे
अपनी ही ताकत
नकार कर
पूंछें हिलाते,
बौरों से
देख रहे उनको
हमारे ही
चूल्हों के ईंधन
की होली जलाकर
फगुआ मनाते,
फूटे अंगूठों से
सीखें
गलियों में चलना
तौलें इरादे
फिर देखें
खच्चर की छाती
कितनी तनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
दंतकथा
मर्मों से जाना है
देखा सुना है
हवाओं के आँगे
भूत
परियों सा नाचते,
हिंसा पारायण
गला रेत
डालते डकैती
बनते हैं बाल्मीक
संत सभा
सुधा ग्रन्थ बाचते.
घोड़दाने
खा खाकर
घोड़े खूब हुये मोटे
और जने ख़ूब खच्चर
मोती पगुराते
खच्चर खाक
घोड़े जनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !
सुअरमुहीं
थुथुनों की
चारागाह नहीं भारत
कामधेनु कपिला की
उजर बजर
सोन थाती है,
बंदरबांटी
आँखों का
करमूँहां मुखिया
पीपर और बरगद
सा ऊगा
बोझ भरी छाती है,
काटो उखारो
घूरे में फेंको
घरफोरु कुबड़े
होंगे बाराती
मरघटिया बिज्जू
सज धज
दूल्हे बनेंगे !
मर खप के
उजड़े बगीचों में
गिद्ध और चीलों का
चिंतन कर
बामी बमीठों में
कौन सा
खजाना खनेंगे !
उभरते मतभेदों के
नये नये
अँखुओं की
हरी हरी
उलहन के आगे
मुट्ठियों मशालों में
कितना जलेंगे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Friday, 17 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [भेदों मतभेदों]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

भेदों मतभेदों
तर्कों वितरकों
का जहर
कोई काम
नहीं आएगा
बिल्लियों और
चूहों की पूंछें
देख रहा
खोखल में बैठा उलूक !
पढ़े लिखे
प्रतिकारी दिशाहीन
भटक रहे
वाजिव आक्रोश की
चेहरों में
अंकित है पीड़ा
काँटों
कशालों में
सूखा है ओंठों का थूक !
हजारे आन्दोलन
और सत्य के पुजारी
अहिंसा पुरोधा
मनीषी बाबाओं के
शतरंगी पंख
छांट देते हैं
परभक्षी शातिर,
गुल्ले गुलेलों की
मारी गौरैया
आँखों में देखे
सहलाते झुर्रियां
नामर्द मूछें मुडाते
शूती भर
दारु की खातिर,
चौपाली
दलालों ने
फैलाई
वंशवादी अमरबेल
सूखी है मिर्ची
भाँटे की खेती
तेजाबी पानी में
मरती मछलियाँ
नदियाँ हैं मूक !
भेदों मतभेदों
तर्कों वितरकों
का जहर
कोई काम
नहीं आएगा
बिल्लियों और
चूहों की पूंछें
देख रहा
खोखल में बैठा उलूक !
पढ़े लिखे
प्रतिकारी दिशाहीन
भटक रहे
वाजिव आक्रोश की
चेहरों में
अंकित है पीड़ा
काँटों
कशालों में
सूखा है ओंठों का थूक !
अच्छी है
पत्थर पहाड़ों में
बर्फीली रंगत
घाँस नहीं उगती
न हरियाली सूखती
धूप छाँव संवेदन
स्पर्श नहीं करती,
टकरा कर
लौट आती हैं
बड़ी बड़ी आंधियां
अपने अनुभव
अनुभूतियों के
अर्जित संबोधन
ओंठों के द्वार नहीं धरतीं,
तृप्ती त्योहारों का
सागर
मृग छलना के पीछे
मरुथल में भागा
दुविधा में
झेल रही
कैक्टस की छाँव
रेतीले टीलों की
आगी सी लूक !
भेदों मतभेदों
तर्कों वितरकों
का जहर
कोई काम
नहीं आएगा
बिल्लियों और
चूहों की पूंछें
देख रहा
खोखल में बैठा उलूक !
पढ़े लिखे
प्रतिकारी दिशाहीन
भटक रहे
वाजिव आक्रोश की
चेहरों में
अंकित है पीड़ा
काँटों
कशालों में
सूखा है ओंठों का थूक !
धीरे धीरे
उठती हवाओं के
बनते बवंडर
रोकेंगे कैसे
गाँव शहर महा नगरों के
गणवेशी
वर्दी के बड़े बड़े गुंडे,
सेतु देख
छोड़ेंगे
लंका विभीषण
बांधेगे छोरेंगे
खोलेंगे राज सभी
तोड़ेंगे बुर्ज
ले ले के हांथों में डंडे,
काटी भुजाएं
लिखेंगी
पहचानी मजमूनें
शहीदों की
सूची में
टूटी गदाओं की
मुठिया में होगी
अंकित इतिहासों की
छोटी सी चूक !
भेदों मतभेदों
तर्कों वितरकों
का जहर
कोई काम
नहीं आएगा
बिल्लियों और
चूहों की पूंछें
देख रहा
खोखल में बैठा उलूक !
पढ़े लिखे
प्रतिकारी दिशाहीन
भटक रहे
वाजिव आक्रोश की
चेहरों में
अंकित है पीड़ा
काँटों
कशालों में
सूखा है ओंठों का थूक !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Wednesday, 15 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [बडबोलिये]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

बडबोलिये
अंधों को
गूंगों ने
सौंपे हैं
राज मुकुट
बहरों को दे दीं तलवारें !
कसाइयों के
बूचड में
जलसा सजे हैं
बकरा बली के
राँपियों की
आरती उतारें !
घर की दहलीजों की
अंतहीन शरहद न जाने
भेड़ियों का
आँगन में
करते हैं स्वागत
कंधे उचका कर,
ह्वेनसांग
लिखने को
आतुर हैं फिर से
सीमाओं के शिलालेख
लद्दाखी घाटियों में
आँखें दिखाकर,
शरहद के
सूरवीर
शेरों की खातिर
भेजी हैं
राजा ने
पन्नी में चूड़ी सलवारें !
बडबोलिये
अंधों को
गूंगों ने
सौंपे हैं
राज मुकुट
बहरों को दे दीं तलवारें !
कसाइयों के
बूचड में
जलसा सजे हैं
बकरा बली के
राँपियों की
आरती उतारें !
मुर्गों के
पखनों में
बाँध बाँध छुरियाँ
लड़ायेंगे जगह जगह
भीड़ मजमा लगायेंगे
पिट्ठू दरवारी,
चन्दन और तुलसी के
चौरों को
अपने ही
हाथों से लीपेंगे
गंधाते खच्चर के
गोबर से बारी बारी,
उतनेगे खोंपा
खपरैले
फ़ोड़ेंगे
माटी के चूल्हे
तोड़ेंगे
ठाठ और म्यारें !
बडबोलिये
अंधों को
गूंगों ने
सौंपे हैं
राज मुकुट
बहरों को दे दीं तलवारें !
कसाइयों के
बूचड में
जलसा सजे हैं
बकरा बली के
राँपियों की
आरती उतारें !
नाचेंगे छाती में
पीपर देवारी
मूँडों में
बाँध बाँध
मोर पंख और
मबरी की फूली डरईया,
मादर की
थापों में
झंमका के छाहुर
बांहों दुबका के
दुधपीमा बछिया
बिचकायेंगे खेरका की गईया,
शाह नहीं
मस्जिद के
शाही इमामों की
बांछें
लेकर तलवारें
कलम को ललकारें !
बडबोलिये
अंधों को
गूंगों ने
सौंपे हैं
राज मुकुट
बहरों को दे दीं तलवारें !
कसाइयों के
बूचड में
जलसा सजे हैं
बकरा बली के
राँपियों की
आरती उतारें !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Monday, 13 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [विराजें वहीँ आप]



विराजें वहीँ आप
इंद्र की सभा में
बने रहें
दरबारी
पालें मछलियाँ हवा में !  
मेनका की बाँहों में
रह रह के झूलें
भूलें सभी कुछ
अमृत पियें
आप डालकर दवा में !  
दाबें कखरियों में सूरज
बोयें उगायें
अंधेरों में जुगुनू
चन्दन वनों को
काटें उखारें,
उठती आवाजों को
कैंची से काटें
बाहुबली
बनियों से कह दें
बांहों के बहुँटे उतारें,
बाँधें वरुण को
मन मानी धारा लगायें
कैदी बनायें
छनकायें
सागर का पानी तवा में !
विराजें वहीँ आप
इंद्र की सभा में
बने रहें
दरबारी
पालें मछलियाँ हवा में !  
मेनका की बाँहों में
रह रह के झूलें
भूलें सभी कुछ
अमृत पियें
आप डालकर दवा में !  
बांधे रहें मौरी
दूल्हे बनें आप
बराती बूचड
काठ की बिलईयों की
कर के सवारी चलेंगे,   
कमानें धनु की
ढीली प्रत्यंचा में
कस कर मिसाईल
ओंठों के योधा
पानी में पूड़ी तलेंगे,   
हटायेंगे
शरहद की चौकयाँ
पीछे हटेंगे
जिन्ना की बरखी
मनायेंगे चीनी कवा में !
विराजें वहीँ आप
इंद्र की सभा में
बने रहें
दरबारी
पालें मछलियाँ हवा में !  
मेनका की बाँहों में
रह रह के झूलें
भूलें सभी कुछ
अमृत पियें
आप डालकर दवा में !  
तमाखू सी
नरदों में थूंकें
ओंठों की भाषा
अंग्रेजी चाँटें शहद सी
उड़ायें चिरईयाँ,  
बहने दें मदिरा की नदियाँ
गंगा का
अमृत समझ कर
पीयेगी रियाया
कटने दें कुम्हड़ों सी गईयाँ,
भष्मी भभूती की
ठंडी अनुभूति में
खोजेगी पीढ़ी
भारत का
नक्सा केराई रवा में !
विराजें वहीँ आप
इंद्र की सभा में
बने रहें
दरबारी
पालें मछलियाँ हवा में !  
मेनका की बाँहों में
रह रह के झूलें
भूलें सभी कुछ
अमृत पियें
आप डालकर दवा में !  

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
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संपर्क – 8989139763

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...