Sunday, 12 May 2013

भोलानाथ के नवगीत [बदल गईं कई कई सदियाँ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया नवगीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्ती करण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुशी हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर हैं ...

बदल गईं
कई कई सदियाँ
रुका नहीं
सूर्यरथी पहिया !
ॠतुमती प्रज्ञा
मौन रही हरदम 
हिलती रही
जंग लगी नथिया !
सजी धजी
सिंदूरी संध्या
कजरारी
आँखों में आस लिये,
खड़ी रही
द्वार पर युगों से
ओंठों की
फेफरी प्यास पिये,
आँगन की
तुलसी सा सूखी
हरियाई
बौउलों में बतिया !
बदल गईं
कई कई सदियाँ
रुका नहीं
सूर्यरथी पहिया !
ॠतुमती प्रज्ञा
मौन रही हरदम 
हिलती रही
जंग लगी नथिया !
पलाशी वनों की
पंखुरियां 
रस भींजी
पतझर से बातें,  
संझवाती
गीतों कँठ 
छलती रही हैं
मनमौजी रातें,
अँगनियां कुलांचें
हांथों से
छूटी
कपिला की बछिया !
बदल गईं
कई कई सदियाँ
रुका नहीं
सूर्यरथी पहिया !
ॠतुमती प्रज्ञा
मौन रही हरदम 
हिलती रही
जंग लगी नथिया !
आगी की नदिया
बहते अंगारे
नल कूप
नापे पगों में, 
राजशाही
पगड़ी हैं
मज्मों के भीतर
असली ठगों में, 
ठाढ़े ठठाते
भाँजें
निहत्थों के
मूँड़ों में लठिया !
बदल गईं
कई कई सदियाँ
रुका नहीं
सूर्यरथी पहिया !
ॠतुमती प्रज्ञा
मौन रही हरदम 
हिलती रही
जंग लगी नथिया !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...