Thursday, 30 September 2021

कठिन समय की धरी विरासत

कठिन समय की धरी विरासत 

ज्ञान ध्यान
मलियागिर गंध नहाये
कोई सुने न कोई गुने न
शदियां बीतीं
अलख जगाते मगहर मरे कबीर !

झीनी चुनरी कफ़न अंगौछा
करघा सूत चढ़ा कर
झूम झूम के गाया गीत
कभी दिल रोया
ताना बाना की
लमझगड़ी करती रही अधीर !

खुद का काम कमेरे खुद के
सिर पर बोझ अटाला अटहर
पूर परैया मठा भात खा
जिया धूप दिन
हन्नागुन्ना
सांझ पगड़िया भूत उतारा,
फक्कड़ पीर फकीरी जी कर
प्रचलित अंध विधाओं की
गांठ खोलते
परत धूल की
रथियों के आगे
वसन के जैसे हवा में झारा,

कडुआ सच कह पाने का
अंदाज निराला
राजा रंक प्रजा मठ बम्हनौति के
बीमार जहन को
रहे पिलाते
अमृत झोलीदार फ़क़ीर !

ऊंच नीच नफरत के हठटंटे
दर्द खुशी
ख़ुशीहाली गाया
सैलाब समुंदर पी जाने का
भावावेग विवेक जगाया
जैसे अगस्त ऋषी,
विपरीत आंधियों अंधड़ में
तनके खड़े रहे
मानवता के चक्षु पटल पर
दिया जलाते
फुंकी झोपडी खुद की
घीच रसरिया रही कसी,

मौजी अल्हड़ हरफनमौला
फिकर नहीं की खुद के
खारिज होने की
ऊंची नाक की घेराबंदी
चलती रही
घाट बाट और नदी के तीर !

जितना आहत हुये चोट से
होते रहे मुखर
भरी अलाप न मौन हुई
न लय सरगम की टूटी
बजता रहा बिगुल के आगे
मंद मंद एकतारा,
राग द्वेष से ग्रसित
कुकुरिया भोंक भले
नफरत फैलाये
निर्मल निश्छल गंगा जैसे
बह रही कबीरी कथन
सत्य तथ्य की अविरल धारा,

भरे पेट बाजारवाद ने
खूब भुनाया
बिकते रहे कबीर
धोया कालिख रगड़ रगड़ कर
महकाया मन चंदन सा
धरा लिलारे तिलक अबीर!

भोलानाथ

Wednesday, 29 September 2021

हार गए हैं

हार गए हैं

साथी सफर के रपक झुके हैं
फुर्सत किसे जो
गांठी खोले तौले थथोले
देखे पीठाहीं केर गठरिया !

आत्मजयी हुंकार ठसक में
सुने न कुनवा
थके पाँव मन मार सांस को
खांस खांस के सहज बनाते
चढ़ रहे पठरिया !

भवबंधन का बोझ उठाये
पीड़ा अपनी हलक दबाये
बटोर ऊर्जा अस्थिपंजर
आपा हिम्मत न खोने की
यह चल रही कवायद,
कदम कदम के सदमों को
सहज बनाने की
इस कठिन राह में
सुगम युक्ति की कोई किरण पहेली
बुध्दि में कौंधे सायद,

चुनचुन मोती वैभव सारा
ले उड़ भागे रिश्तों के सब सारस
छोड़ हृदय में
केचही के नन्हें शावक
गिन नाखून अठरिया !

आगे पीछे हरिबोल भजन के
सहगान सहारे
खटक विक्षोभ भाव के
खालीपन पर जीवन का
लय राग मरहम सा घाव लगाते,
समय संरचना के मलबे को
झाड़ बटोर फूक आग में
राख बहा देने के
साहस संवेदन के
ताजा टटका बोध जगाते,

व्यामोहों का कूड़ा करकट
कुशल कृषक के जैसे
परसाना होगा
ख्यालों की सैंढ़ी से
कुशियारी की गांठ ठठरिया !

अहसास मार अनुभूति का जीना
सुख सदमों के
बीच नून सा पिसते
शिल बट्टा को पल पल चुभते
रहे स्वाद पर्याय सदा,
पाय विरासत पुरखों की
किया न साझा समय से
लीक न बदली
हिचकोलों के उछले शावक
कुछ इधर गिरे कुछ उधर किनाई किदा,

लैया लड्डू गुड़ शक्कर
दूध सिमैयाँ कलेबा महेरी पुसाई न
पी पी पीना
रहे चबाते मुह भर
भुजिया नमकीन मठरियां !

भोलानाथ





Tuesday, 28 September 2021

कुछ खबर मिली न बहुत दिनों से

 कुछ खबर 

मिली न बहुत दिनों से
कैसी चुप्पी छाई शहर में
न कोई उत्सव
बाजा गाजा
दूर दूर तक दिखे नहीं
न सजे ओठ कविताई !

कोर कसर नहीं
भीड़ भाड़ में
लाईव और अलाईव
मंचों के विज्ञापन में
विस्तार है लेकिन
हलचल
हिया हिलोरी कहीं हिराई !

बड़े नाम थे जिनके
हर चौराहे
गली मोहल्ले
चर्चाओं में रहने वाले
किरदारों के
कलम के किस्से
अब हो गये और बड़े,
दर्शन दुर्लभ हुये
सपन में
संगत का सुख था
चर्चाओं में कब थे
हम उनके
बस्तों में अपने गीत लिये
हरदम पीछे रहे खडे,

रंग भेद न किया फ़ाग में
लिथड़े रहे
कीच में सदा सदा
छुआ कभी न उनकी टोपी
न ही
खोद खुरच कर देखा
प्रतिभा की गहराई !

डार न चूके रहे हमेशा
कोशिश में
फुनगी पर अपनी
उंची कूद के करतब
दिखलाने को
फिर भी खीटे
से मुखियों ने अलग किया,
मौन साध
गुपचुप चूस रहे सब
अर्जित टॉफी
फतह किये सोपानों से
अनभिज्ञ रहे हम
किसी संदेसा
कोई पाती ने सूचित नहीं किया,

फूले कांस
अईताती बारिश
चढ़ गई
उल्टी धार मछलियां
उबी में है खुरी कोरैया
खोट खलल
गुलमछरी की हुद्द बुद्द चतुराई !

कुछ खता हुई हमसे
या प्रभुताई पर
राहु के आ जाने से
अहम का चिड्डा
मौज बखानी में
झूम झूम के नाचा
भूसी की सैंढ़ पर,
वैसे भी रहवास रहा
चने के झाड़ पर
साबित करते रहे सदा
अखरा अखरा
ब्रम्हवाक सा
प्रचलित
ढर्रे की पुस्तैनी ऐंढ़ पर,

अदद आचरण की
आदत गदे पड़ी है
रही लालसा
आत्मसात स्वीकार किये
हर हलचल
रहे पूछते
जिस तिस से सबकी भेंट भलाई !

भोलानाथ

Sunday, 26 September 2021

जी जांगर चोरी कर कथरी ओढ़े

जी जांगर चोरी कर

कथरी ओढे 

घी दूध कहाँ से खाते

हाथ गोड़ की 

कायल मूछें हो गईं टेढ़ी ! 


रही रमहाती 

भूखी प्यासी गैया

ध्यान दिया न चारा डारा

बंधी रही 

निरीह सी अमरा की पेढ़ी ! 


अटे पड़े अंदर से बाहर 

घर के 

स्वारह अटहर में 

कंधों तक डूबी

रही अढाती 

गुड़िया की अम्मा 

हम डारे रहे रुई कान में,

बीड़ी 

फूंकी खैनी खाई 

थूका चारो ओर 

गंद मचाया 

टाले टल्ले बैठे ठाले 

किया नहीं कुछ

आलस हावी रही जान में, 


जागा नहीं विवेक 

झुर झुर चलती रही पुरवैया

झर झर थोड़ी थार 

फुर फुर 

उड़ती रही भुस्स की सेढी ! 


मुह में गाली 

जहन में गुस्सा 

आते जाते कब तक सहती 

दो दो गुच्चा 

पेट पाँव के द्वन्द भला 

रोज रोज 

ऎसे कब तक रहती,

बाहर गई गाय 

फिर कभी 

न वापस लौटी 

होते रहे थकन से चूर 

बैठक में बैठे बैठे 

किये जतन होते 

तो नदिया दूध की बहती, 


अंड़ा अड़ी की 

ठकुर मिजाजी में 

लांक जला जल गई 

दांय गडाइन भागे बैल 

तोड़ कर ठिकधर मेढ़ी ! 


अभद्र आचरण की 

पृष्ठभूमि का अपकर्म 

छोड़ पहचान लिया होता 

खुशहाल जिंदगी के 

मंत्र तंत्र तो 

हम भी 

खाते तालमखाने,

हाथ मीज 

पिडरी सहलाते कैसे 

अच्छे दिन आते 

फुर्र फुर्र उड़ गई चिरैया 

खेत खाय के 

तब भीतर का 

जागा जोगी राय बखाने, 


ऊंची नाक के ऊंचे गिरगिट 

पहचान समय को 

खरभर खरभर सरपट 

भागे 

पास के पतझर बाड़ की रेढी ! 


भोलानाथ

बातें करते चूल्हा लकड़ी आग तवा की

बातें करते चूल्हा लकड़ी 

आग तवा की
थकते कभी नहीं जो
देखा है कभी
सिंकी रोटियां
क्या चूल्हे के घैर की !

पांत में बैठे कभी नहीं
खाया पिया
पेट भर खड़े खड़े
सौ सौ छेद किये
देखे बड़ा बड़े बड़े
थार पतरियों गैर की !

अनजान अनाड़ी
बहुरूपिये
मदारी मजमों के माहिर
लगे सिखाने
काया कल्प करेंगेआलू का
पेर मशीनों में सोना कर देंगे,
चिड़िया चुनगुन पंख पखेरू
सोने के होंगे
नहीं नुचेंगे
न ही शिकारी शिकार करेगा
झोली में वैभव
बोली में अमृत भर देंगे,

खुशहाली के दिन होंगे
भूत प्रेत
मरघट के बासी
बरम सन्यासी
जगवासी ललाटों की
चंदन होगी माटी मैर की !

चना चढ़ाने
जबरा पेल की पोंदीपैया
अंधी अड़ी ने रौंदा खेत फसल को
बारह बाट किया
बेसुधी नहीं
बेसुध होने की लाचारी है,
मिट्टी की खुशबू का
ध्यान रखा न
माटी के मादर बने रहे
बिम्ब प्रतीकों की साझादारी की
किरकिरी रही आंख में
पानी में पानी की मारा मारी है,

गलाफाड चिल्लाने वाले
लावर लट्ठ गवारों की
लबरी चुपरी
समझ सके न
रहे बजाते सच की
पीठ में हकनी बैर की !

कभी इधर कभी उधर के
गठबंधन के
अनुबंध मौज की पुड़िया का
रंग नहीं देखा
न पहचाना पानी में
चूने का ठंडा होता हुआ उराव,
नदिया बदल रही
अपनी जलधारा काट रही
क्यों खुद के निर्मित किये किनारे
क्या थकी हुई है
चाह रही कुछ समय के खातिर
गहरे में ठहराव,

चिल्ला चोंथ की उबी
नई सोच की आगे आगे
बढ़ चली धार की
युवा मछलियों की
दिशा दशा पर
लगी नजर किसी गैर की !

भोलानाथ 

Friday, 24 September 2021

पिछली दौड़ के आगे

पिछली दौड़ के आगे 

दौड़ दौड़ कर मर खप के
मैदानों में रैयत ने
एक एक के
आगे सौ सौ झंडे गाड़े !

नमो नमो का नारा दे कर
राज तिलक कर दिया
चाय के हरकारे का 
दिग दिगंत बज रहे
उसी के ढोल नगाड़े !

उंची उड़ान है उंचे उंचे
अब रही न फुरसत
नीचे की सुधि लेने की
भूल गये अखबार रेवड़ी
मूंमफली रेरी पान के खुंचे,
फुरसत में जिन
बीड़ी वालों के संग
रमी खेलते समय बिताया होगा
या कूद कूद कर
गली मोहल्ले खेले कांच के कंचे,

चुंगी के चर्चों में है
फिर आज अमेरिका
तंगी में रह कर भी पिटें
तालियां झोलीबाड़ा के बाड़े !

सेवा निवृत्त जिन बूढ़ों ने
मजबूती से बांह पकड़ कर
तिलक लगाया मीलों मील चले
जयघोष किया
बोझ हैं सिर के आज वही,
जाना समझा मिला अनेकों बार
सुना फिर भी न संवेदन जागा
न ही संज्ञान लिया
यहां वहां के
रहा दिखाता खाता और बही,

रहने को खोली न कमरा
जहन जवानी देश को दे दी
खुले गगन का
असह गुजारा
गिन गिन तोड़े तन के हाड़े !

निराश हतास नहीं हम
बिल्कुल भी कुछ अच्छा ही
करके लौटेगा देश की खातिर
कभी कभी अपनी पीड़ा
निवारण की गा लेते हैं,
खाना दाल दवा के अभाव में
रोज रोज बढ़ती पेंशन की
आश में शव के ढेर
देख कर सरकारी
उपेक्षा का विष पी लेते हैं,

जिये हों दुर्दिन कैसे भी
उम्मीदों की छांव
नहीं छोड़ी दुख सह कर
स्वागत
अभिनंदन में रहे अगाड़े !

भोलानाथ

Thursday, 23 September 2021

उछल कूद न बहुत

उछल कूद न 

बहुत डार से डार
फल झार न नीचे
अकल का
आका मत बन बंदर !

बहुत बघार न
सेखी
सुन मरे महंत का किस्सा
सड़ गई
खिचड़ी मठ के अंदर !

भक्ति भावना का
खाकर
व्याभिचारी
जीवंत आस्था पर
रहे जूठे हाथ अंचा,
तू आग लगा
कचरे में
जलती है तो
जल जाने दे लंका
सच की आन बचा,

चेता नही तो
पन्नी पुट्ठे में
दब जायेगा
संगम का
यह उठा बबंडर !

सूंघ सुराख न
पुण्य पाप का
चोले के भीतर
ठाठ बाठ का
पलता कोढ़ उजागर कर,
सुन पढ़
अगस्त को
ढोंकी सागर
पोंक रही हैं तोंदें
पचा न पानी औंधी गागर,

विद्या बुद्धि विरत
कुबेर के घर में
कोने कोने
नाच रही है
सजी छछुंदर !

बिना बाल की
खाल निकाले
लम्बी दाढ़ी का
काला तिनका
नोक सुई की कैसे काढ़े,
पुचकार
पूंछ न ऐसे
डार दे उंगली घोंघा
उगलेगी
आंत सभी कुछ ठाढ़े,

पेट के
दांतों ठीहों से
लहरा कर
बह निकलेगा
नरकाकुण्ड समुंदर !

भोलानाथ

Wednesday, 22 September 2021

घर बैठे बेकार

घर बैठे बेकार 

लाचारी ने
कैसे कैसे
हथकंडे अपनाये !

रंग उड़े
सारी पगड़ी के
कोशिश हुई नाकाम
बचे न सूप ओढाये!

औने पौने बिकी
मिलकियत पुस्तैनी सब
छीन झपट कर अपनों ने ही
खींच के पीढ़ा
थाल की रोटी खाई,
पी कर पूरी दाल
कटोरी उलट दी थाली
हंडिया फोरी
बेदखल किया घर चल गई
घर में घर की ठकुराई,

आग अंगारे
हम उगल सके न
छानी छप्पर
हाथ के अपने बनाये !

नहीं उछाली हमने
उनकी पगड़ी
जिसको हाथों से अपने
उनके शीश आशीष
दुआओं जैसे सजाई,
अपने पराये का भेद
किया न सोच समझ कर
अपना उनका हित
कमी सभी कुछ पूरी की
मांग नहीं ठुकराई,

पहचान न पाये
फिरते
रहे उमर भर
सांप संपोले मूड उठाये !

भरा रहा विश्वास लबालब
जुते रहे दिन रात
कभी खुद का
ख्याल किया न
आगे दिखा कुआं
न पीछे की खाई,
लील गई
रानी के नवलखा हार सी
अपने दीवार की
नन्ही सी खूंटी चली न
आगे समय के हाथापाई,
दिशाहीन आ बैठे
सड़क किनारे
सायद कोई
साथ को हाथ बढ़ाये !

भोलानाथ

स्नेही जन जो अब तक मील हमें

स्नेही जन जो अब तक 

मिले हमें
प्रचलित गलियों में
सुनै न एकौ बात हमारी
अपनी अपनी गावें
सीधा आंगन
टेढ़ बतावे रीछ नचावैं खड़े खड़े !

अपनेपन का ढोंग धतूरा
भांग पिलाते
पहचान
मुलाकातों में बदली
बात बतसिया नातेदारी
चंदन कलफ धुली
सावन में निकरे चीकन घड़े घड़े !

चुप रह मत कह
आगे का सोचा
भनक लगे कि बैरी खाये
पुरखों के मुह
यह सुनी
कहावत बंधी रही बसनी से,
फिर भी जिये
जनम भर
धोखे ही धोखे हम
मतिमारी जहन की
सुधियां समझ
मौन हैं कढ़े न लांपा कछनी से,

दर्द चुभन के बीच छोड़ के
ले उड़ी मल्हम
अपनों की हमदर्दी
कांख कराह
गहिर घावों की मक्खी हाकें
अखबारों की
रद्दी से बिस्तर में पड़े पड़े !

परेसान नहीं
हैरान बहुत है
जीवन की नदिया जीती
क्षीणकाय धार की
हवा में
उड़ती देख मछलियां,
जल जीवअबोधों को
लहरों ने
बहकाया होगा
धूप ताप की धार नहा
सायद
पा लें हूरों की गलियां,

जलती आग अंगारे लपटें
उंचे उंचे
कितनी और उठेंगी
कितना घी तेल जवा
आग में डाला जायेगा
देखेगी दुनिया
कब तक चौखट में जड़े जड़े !

इच्छाहीन झूठ मूठ की
बैठक चर्चा
देश विदेश के
भाषण
जैसे बैठे ठाले की
इधर उधर की उठाधरी,
गुल्लक तोड़ की परंपरा यह
कब तक और चलेगी
धर कर
खाता बही सही
चुकता हिसाब कर
मत गिन चिल्हर घरी घरी,

मन आधा मन
शेर छटाक पाव पाव के
जो धरे बटहरा
माप तौल का पढ़े पहाड़ा
जोर जोर से तोता जैसे
रट रहा ककहरा
फोड़ रहा है फुग्गे बड़े बड़े !

भोलानाथ


Monday, 20 September 2021

बहुत दिनों से जाग रहा हुन

बहुत दिनों से जाग रहा हूँ 

सो लेने दे उत्पात न कर
तू भी कर विश्राम
नींद भरी है
आंखों में रात गुजरने वाली है !

दिन भर नाक बजाती
सोती लंबी चादर तान
करने पड़ते हमें हजारों काम
हारे थके
भाग दौड़ के दो जून की थाली है !

सिरे पकड़ने को जीवन की लय के
कंधे डारे जाल फिरे हम
बंजारों सा टूटा जांगर
छोर मिली न
तुमने खिचड़ी खूब पकाई,
घिरी रही तालीम सीमाओं में
तब तुमने खोला द्वार एक तो
रोक सके न पागल मन को
कविता नाम
बता कर जब तू रूह समाई,

सिरा एक पा दौड़े बल भर
मजबूती से
चले तुम्हारे साथ
रहे निभाते निष्ठा से रस्में
फिर भी दूजा हाथ जेब में खाली है !

रात रात के जागे रूपवान
आकार गढ़ा
सहलाया खूब सम्हारा
उपमानों और प्रतीकों को
मुह धारदार संवाद दिया,
अक्षर अक्षर शब्द शब्द
अपने भावात्मक सूत में
मोती माणिक सा लड़ियों
खूब पिरोया पथ पगड़ी से
राजहितों तक श्रृंगार किया,

ताल तलैया पोखर झरने
सागर नदिया
तारों की बारात दिखाया
धरती भोजन जल पान कराया
हिमहवा हिमालय की झाली है !

परवाह न की जीवनयापन की
हम रहे तुम्हारे साथ सदा
झपक तिरोहित नयन रहीं
बतकही में उलझे
ध्यान दिया न आहट पर,
उन्नीदी करवट की
गरम उसांसों का संकेत
खनक पर खनक चूड़ियों की
सरगम रुनझुन पायल की
झनकार पास मंचवाहट पर,

अमलतास के फूल झरे
पतझर के पात पलाशों पर
ऋतुमति ऋतुओं का
मनभावन संज्ञान लिया न
भीतर मैना बिरह की पाली है !

भोलानाथ



Friday, 17 September 2021

मरा अनार खबर सुन सायद

मरा अनार खबर सुन सायद

बिरह व्यथा से 

सूखी बेल रसाला

बाढ़े बरिहाअमुआ अमरा डार 

रुके न

फ़ैला फुनगी जबरा पेल ! 


दबा सकोच में सहमी 

जैसे 

रस्सी सधी डरैयां

थरथर भय बस कापे

आंख सहायक दिखे न कोई

रह रह सावन सींचे बेल ! 


काली काली रुआ रुआ सी

धरती धंसती  

बादल की आगोश का सूरज

ओढ़ रजाई 

अंग अंग लिख रहा 

जतन से भेंट भलाई लेख,

हवा बाबरी हवा बनाते 

नद नदिया ताल तलैया 

पोखर झरने 

पीपर बरगद को समझाती 

खींच रही 

मन मतलब वाली रेख, 


लाटा फांदा तिकड़म के 

चहकारे 

महुआ अर्क की सूंघ शीशियां 

चूहे बिल्ली छोड़ अदावट 

अंतरा क्वातरा पंसारी बन बैठे 

क्या जाने हल्दी गांठ के खेल ! 


जत्त कत्त कुआंर मास की 

उत्तम बरखा 

तपती धरती रह रह 

मरती हरियाली की 

प्यास बुझा कर 

सदा सदा अमरत्व जी जाती ,

लक्ष्मण रेखा के पीछे का 

खालीपन 

उल्टे पांव न लांघ 

पदचिन्हों में पढ़ 

अतीत के किस्से 

धीरज दुर्दिन धूप पी जाती , 


फुरसत नहीं समय को 

कभी नहीं पूछेगा 

रुक कर तुमसे गौ सेवा

कर मथा जतन से मक्खन 

या बालू से 

काढ़ के खाया तेल ! 


मुह की बात लील 

न रही गुंजाइस पेट बढ़ाने की 

तभी अधपची आग को

जगह देख 

उल्टी कर देने की 

आदत रही जमाने से,

दया प्रेम सदभाव को 

बेरहमी से मारा छल ने

कपट कोठारी बन बैठा 

परजीवी को 

रहा न मतलब 

छाती पेर कमाने से, 


बहुत समय से केर बेर सा 

भिड़े रहे 

धुले दूध के 

स्वच्छ आचरण दरबारी 

झूठ साँच की तुला में 

महिनों तुलता रहा रफेल ! 


भोलानाथ

हुये पस्त पत्थर लड़कर

हुए पस्त पत्थर से लड़कर

दुख का पहाड़ यह
कैसे टूटेगा
पीछे नहीं सहारा कोई
टूटी छैनी
हाथ हथौड़ा बाहर दस्ते से भागा !

हारे थके चूर चूर हो
शिलाखण्ड पर
पसरे कुहनी मार थपेड़े
धूप के सहते
दे रहा तसल्ली साहस
हाथ बंधा विस्वास का धागा !

संचार ऊर्जा का
देह में हो तो
थकन घटे
फिर लेटे लेटे आंख बंद कर
औजार जुटाने की
कोई तरकीब की सोचें,
धूप नहाये निचोयें क्या
आमदनी की उड़ी चिरैया
झरे रुये पखनो की
जाया हुई बचत
लाचारी के दिन
बाल नाक के नोचें,

बिना हाट बाजार के
टेली शॉपिंग मॉल से
बाबा मोल बिकाती
बातों के युग में
उधार जिंदगी को
मिलता नहीं उधार का मांगा !

सबके अपने
मुह पेट के कारण
जायज और नाजायज
अलग अलग जीन्स के
बेल रहे सब छोटे बड़े
मझोले माप के पापड़,
उतार दिया
नकाब मंडियों ने
कद भले अलग हो
चेहरे एक ही सांचे के ढाले हैं
इसीलिये
गालों में है एक सा झापड़,

जाति धर्म के स्वर भले अलग हों
हाट बाजार की
एक ही भाषा बोली है
अम्मा के भाग से
खोंपा
कोयल बोले चाहे बोले कागा !

भाड़ फोड़ते भेंट चढ़ी
टोपी उड़ रही हवा में
हुड़दंग जोगड़े
चढ़े बांस पर
करें प्रसारण
लाइव जपें जपी सा जाप,
हमें हमारे निश्चय से
भटकाने की कोशिश
रही सदा
गदा भांजती लाचारी से
लड़ राह बनाई
छोड़ा शिला शिला पर छाप,

फूंक फूंक कर
दबी राख की चिंगारी
दहन किया कमियों की होली
हाथ सेकने नही आया
चिड़िया
चुग गई खेत बसेरा देर से जागा !

भोलानाथ


Thursday, 16 September 2021

भीतर मन की खूंटी से

भीतर मन की खूंटी से 

जो भी चित्र टंगे थे
झाड़ा पोंछा धूल हटाई
अगल बगल
दीवार मुक्त की जालों से !

नियम बद्ध अर्चन के
खातिर झुके चरण में
छुआ फ्रेम तो झरे रेत सा
मूड के ऊपर
चिपक चिपक रूमालों से!

शुभ चिंतक
मुखड़े नही सभी चेहरे थे
खुली कलई तो
झरा अतीत
सामने सच आया,
झनझना गई देह
रह गया भौचक्का
दिल दिमाग
देख आस्था के
भीतर भूत का साया,

क्या उत्तर दूं घिरा हूं
प्यासा पात्र लिये खाली
खुद के अपने
एकाकी करुण
हृदय के पूछे यक्ष सवालों से !

खेले गए परस पर
खेल जो गुपचुप
हार जीत या
वर्चश्व के लिए नहीं थे
फिर क्या थे ?
वक्ष विराजी
श्रद्धा के
पीठ सवारी करने वाले
विक्रम वैताल नहीं
तो क्या थे?

अपने कभी समझ
न आने वाली गणित के
सूत्रों को तोतों जैसे
क्या रटना
होते रहे फेल हम सालों से !

बुझे अलाव की
आंच
ऊर्जा से लथपथ
भ्रम की भस्मी पुड़िया
बांट भीड़ को सारी,
निकल गया
दबे पांव
चुपचाप जोगिया
भक्ति भजन अर्चन
दर्शन की छोड़ अधारी,

छोर सिरे सब छोड़
उड़ा दी हवा उम्मीदें
पकड़ी बांह तसल्ली
टूटा सौदा
दूर हुये बेवफ़ा दलालों से !

भोलानाथ


Tuesday, 14 September 2021

बस कर रहने दे और सुना न

15/09/2021

बस कर रहने दे 

और सुना न मूंड हिला कर

मत गा पगले 

भीतर पलते आत्म मोह की 

अनुशंसा में 

झूम चहक के कोकिल कंठ बहर ! 


गीत गजल की चौखट में 

केवल रंग नहीं 

कविता के स्वर भर 

जब तक

करुणा पीड़ा खुशी गमों के 

अहसास न होंगे अमृत और जहर ! 


शब्दों का ब्रम्हांड तो होगा 

अनुपयोगी व्यर्थ निरर्थक

धूप ताप संताप 

त्याग वैराग्य साधना 

त्योहारों 

की झलक न होगी,

कलम करिश्मा व्यंग विदूषक 

मृतप्राय विजूका बेबोलों से 

गीत की खोल में रह 

संवाद करेंगे 

जिनमे 

कविता की अलख न होगी, 


खड़े मंच पर 

मनमानी गायेंगे स्वयं संगनी के

अंतरंग 

अनुभूति के किस्से 

धरती पड़ी दरार 

दिखाएंगे नक्शे में बड़ी नहर ! 


आत्म वेदना या 

उल्लास हर्ष का 

संगीत झरे न अखरा अखरा

घुंघरू पायल का 

सहगान न झंकृत हो 

धमनी सांस शिराओं में,

आसक्ति या तप बैराग्य का 

मन मुग्धा बिम्ब 

न उभरे मन मष्तिष्क के 

दर्पण में 

आंदोलित हो जाये हृदय 

विपरीत दिशा धाराओं में, 


बजने लगे बंसुरिया 

मीठी मीठी कान जहन में 

जन जन के 

होने लगे संचार प्रेम का 

बदले सोच शहर 

न हों हिंसायें थमे कहर ! 


रचनाओं में यदि तेरे घुली है 

कविता तो गाता चल 

बृजधाम धरा सा 

प्रेम की पावन गंगा का 

अमृत 

प्यासों को हर हाल पिला,

खुरदरी राग लय 

नाकाम छंद बंद के 

केचुआ गठबंधन को 

नये नये उपनाम न दे 

टेर अबाबील गलगलियों को 

कविता के स्वर ताल मिला, 


जागेंगे सोते से श्रोता 

पढ़ पढ़ पाठक 

गीतों में कविताई 

रचनाओं में गोते 

खूब लगायेंगे 

महसूसेंगे वीणा लहर लहर ! 


भोलानाथ

गली सड़क से राजपथों तक

गली सड़क से 

राज पथों तक

वही तमाशे मजमे हैं

कुछ नहीं बदला 

समय स्वरूप का

हेर फेर बस दस्तूर पुराना है ! 


आदर्शों का 

वही पिजामा टोपी

संघर्षों में नीद आंख की 

मन का बुझा उराव

झूठे जुमले बस दुहराते जाना है ! 


ममता घायल छमता घायल

बढ़ते 

अपराध की जिम्मेदारी 

खेत किसानी

व्यापारी सब घायल

रोटी नून में खुश मजदूरी,

न कुछ खोने का भय 

न कुछ पाने की अभिलाषा 

पाँव पसीना सिर 

छाती भुजदण्ड से निथरे 

भींगे 

चिथरे चिपकें देह से पूरी, 


चढ़ी धूप तन महगाई से 

आहत नहीं होते 

धीर तसल्ली के 

साधक बस इतना जानें

गुजर 

बसर के साधनअधियाना है ! 


अर्थ शास्त्र के उन्नत नुस्खे 

जीवन में 

जाने अनजाने 

तृषित विलास का

धीरे धीरे घोल रहे हैं 

मीठा मीठा मौन जहर,

सुघर सलोना मौसम 

इठलाती ऋतुओं की 

ओठों में स्याही 

कृतिम साधनों के मुह में 

लसक लिपिस्टिक 

चमक चली है बहर, 


अंधी दौड़ की होड़ में 

पीछे छूटी परम्पराओं के 

फिर से वाजिब 

अर्थ खोज कर 

नूतन शैली के 

नये वस्त्र पहिराना है! 


अलग अलग 

मजमों के मदारी 

खेल रहे जो खेल 

उन अर्ध सत्य संदर्भों के 

धुआं धुंध से परिचय का 

उपक्रम करना होगा,

समय की पीठ का 

कुछ नाजायज कचरा 

सम्बल सामर्थ्य मुताबिक 

आहिस्ता आहिस्ता 

वैज्ञानिक पद्धति से 

साफ हमें करना होगा, 


अपनी बुद्धि विवेक की 

दूषित जलधाराओं के 

तिलिस्मी मायाजाल 

हटा कर 

स्वच्छ सादगी का 

निर्मल परचम लहराना है ! 


भोलनाथ

Sunday, 12 September 2021

जब से जगा हूँ जागता रहा हूँ

 जब से 

जगा हूं जागता रहा हूँ

जागना ही होगा 

जन को जगाने के लिये ! 


फूंकते ही रहना होगा

शंख नाद 

सुबह की मुनादी 

मर्म समझाने के लिये ! 


भीतरी आनंद 

भोग की चित्र शाला में 

गहरी नींद 

जन्मों से जो सोये हैं,

रोज रोज घटती 

घटनाओं से बेखबर

निश्चिंत 

अपने सुख बोध में खोये हैं, 


जागेंगे 

होंगे उठ खड़े

अनजाने अवरोध से 

वतन को बचाने के लिये ! 


लिखता चल गाता चल

टेर दे अलख की

झनझनायेगा 

जहन एक दिन जरूर,

धीर धर लय अलाप 

छंदों की प्रवाह में 

बहेंगे 

साथ साथ छोड़ कर गुरुर, 


जागेगा जज्बा 

जयहिंद आन उदघोष का

शान से 

तिरंगा लहराने के लिये ! 


तर्क बहसबाजी उधेड़बुन 

अलहदा रख 

उड़ने दे 

ऊंचे ऊंचे कबूतर मिजाज के,

खुजाता रह 

दाद सा 

महकने दे मेहनत 

मजदूर की कंगूरों में ताज के, 


फूलते पचकते 

गुब्बारे सा पेट बड़ा कर

खुशी 

गम रंजिशें पचाने के लिये ! 


भोलानाथ








Saturday, 11 September 2021

खींचतान आपस की ऐसी

खींचतान आपस की ऐसी

भरभराकर
गिरा भविष्य का
बनता हुआ किला !

बजी
ईंट से ईंट गारा गिट्टी
उपकारों का
धजी सांप सा मिला सिला !

धुआं धुआं रातों की
चांद चुनरिया जैसे
झीनी झीनी
बुनी महीन कनातें,
कुतर गई
चुहिया बिल बाली
चिन्दी चिन्दी रुआ रुआ सी
हवा में ऊंची ऊंची बातें,

बंटी फतोहीं आधीआधी
राख मठा का
धुला
मुरैठा सिर ताज मिला !

भागे भूत की रही
लंगोटी
हड्डी  जैसे कंठ फंसी है
काढ़े कढ़े नहीं चिंउटी,
चिथ चिथ चिथड़ी सी
हुई भोंथरी
दिनदूना रात चौगनी पीड़ा
दूध के जैसे अउंटी,

तय दिशा सफर की
मंजिल
स्टेशन स्टेशन बिकता
पानी बोतल हाथ हिला !

भीतर बलखाती महानदी के
किसी घाट पर
दूर दूर तक
दिखती नहीं है कोई कश्ती,
मगरमच्छ घडियालों का
जमघट कर रहा किलोलें
घाट उतरती
सांस है कितनी सस्ती,

तन मन बुद्धि के उपक्रम
सब धरे रहे
हिली हिलाये न
छाती से समय शिला !

भोलानाथ

Friday, 10 September 2021

लौट के आजा मेरी फुर्र चिरैया

लौट के आजा मेरी 

फुर्र चिरैया

तीज 

फुलहरे का पर्व मनाने ! 


तिनका 

नीड़ नहीं धरना 

तुम खूब चहकना 

आंगन इसी बहाने ! 


उड़ उड़ 

चौरे तुलसी ठौरे 

नीम डरैया 

निमुआं लौंची 

गीत सुना जा,

भीतर उपवास 

अकेली मैना 

पूजा पाठ गुनै न 

संग 

सहेली गुना जा, 


आज का पावन 

परब है निर्जल वाला

आ जा 

फरका धूर नहाने ! 


मंदिर मूरत 

गौरी चरणों का 

बंदन कर 

हल्दी अक्षत 

फूल चढ़ा जा,

गांजा भांग 

धतूरा 

भोग मिठाई 

अर्चन स्तुति कर 

शिव सार पढा जा, 


भक्ति भावना से 

लथ पथ पूरा घर है

अर्ध्य लिये 

में खड़ी मुहाने ! 


रात जागरण 

भक्ति भाव की 

आदि अनंत अनादि 

शक्ति की 

राह दिखा जा,

हरि अनंत

हरि कथा अनंता 

समझे सुने मर्म का 

आरत 

भजन सिखा जा, 


झूम झूम कर 

गा री चिरैया 

मोगरी कोनिया

नाचें भाव सुहाने ! 


भोलानाथ

भीगी है माचिस की डिबिया

भीगी है माचिस की डिबिया 

उपले की आग

तलब बीड़ी की 

रह रह के मारे सिसकारे ! 


सुम्मा सुतरिया की 

गोली जला ले 

मार सुट्टा पर सुट्टा 

चुंगी का रतियों भिन्सारे ! 


भीतर की गुरसी के भीतर 

दबी आग ही आग है ! 


अपने हड़ौरे की चंदन सी 

चिकनी है माटी 

अपना करम है 

जब चाहे लिलारे 

उंगली से 

माथे तिलकिया लगाले,

गीली है बंधिया 

भीगा बदन है 

बादल फ़टे संझा बिरियाँ 

ढेरिया न कल के लिये 

रोपा की 

थरियाँ थर से मगा ले, 


टेक्टर की चावी नचा न 

मचौया मचा ले 

डबरिया की 

नन्ही मछरिया बड़ा जोर मारे ! 


टडकते चमकते 

पहाड़ों की चोटियों के 

रुके थमे 

बादल बरसने को 

मचल रहे 

पुरवा की बाहों में झूल के, 

जब तक है पुरवा 

पछुआ के गांव में 

खेत धांध लौट चल 

अमुआ की छांव में 

खिचड़ी पकाने 

तन मन की भूल के, 


थम थोड़ी होने दे ठंडी 

पी जब तक हंडिया का 

पहला उतारा 

तपन जी का निकारें ! 


अहसास असर

आहिस्ता आहिस्ता 

पढ़ धीरे धीरे खुमारी 

लोकल को बोकल बना 

बढ़ने दे 

धड़कन जिया बेकरारी,

जल्दी न कर 

उतरने दे घूंट घूंट भीतर 

चोरी न डाका 

घर की उपज अपने 

महुये का सत है 

जड़ से मिटाये बिमारी, 


रोज रोज पकड़े फोकट की 

ढोके सिपहिया 

पाँव सिर की चढ़ी 

लाठिया दिखा के उतारे ! 


भोलानाथ


Wednesday, 8 September 2021

तुम्हारे हैं हम या नहीँ

तुम्हारे हैं हम या नहीं

निराकार जिंदगी 

ताम झाम 

कोई इशारे न कर 

पहले यह तो बता ! 


अस्वीकृत समय के

कठिन इस सफर की

गलियों में आना हमारा 

शुभ है 

सगुन है की कोई खता ! 


तुम्हारी नजर में सगुन है 

यदि तो

चित्तराग अपने 

मेरे भी चित में 

करने को अंकित 

कोई जतन तू ही कर,

जुर्रत खता पर 

दुहाई रहम की रिहाई न दे 

कर अपने मन की 

अमंगल हंसी ही सही

औषधि 

पिला या दे दे जहर, 


धकियाये नातों के हैं

और धकिया न

कर फैसला

धक धक करता जिया

ढेर करके और न सता ! 


संसय असंसय के 

अधोगति झूले में

सिंगार किये आस्था की 

निष्प्राण सजी 

मूरत की तरह

अब और न झुला,

अपना के अपना बना ले 

उमर से आगे की 

मंजिल सफ़र के लिये

या 

रातों के देखे 

सपनों के जैसे भुला, 


मांग ले हमसे सांसें हमारी 

दुआ की तरह

दे हमको लिख कर 

जिगर में

अपने दिल का पता ! 


कूड़े सा नाता जग का 

जला कर

हारे थके गीत गाते 

तुम्हारे  

दौड़े चले आये हैं 

खुद को कंधों उठाये,

ख्यालों के मंदिर में 

करके 

प्रतिष्टा तुम्हारी 

घड़ियाल घंटे 

शंखों की

ध्वनियां सांसों समाये,


कसाले कठिन सह 

सिली यह भावों की झोली 

ऐसे झटक न

भीख दे या 

अपनी नफरत खुल के जता! 


भोलानाथ

सामा पसही कोदों कुटकी

सामा पसही कोदों कुटुकी

धनकुट 

ज्वार मकाई के सेये हैं

जिया जरूरत 

भोगा बचपन लंबी लंबी पातें ! 


भूलें नहीं भुलाये 

कोटे के वह सही अंगूठे 

अन्न विदेसी

पुआल बिछौना खटियों 

अगहन पूस की रातें ! 


नंगी देह के चढ़े चीथड़े 

चलती फिरती 

अलगनी थे जैसे 

फ़टी चड्डियाँ 

ठंड हथेली मुडी कुहनियां 

कांखे अंग छुपाते,

बेरहम समय की 

सर्द हवाओं के 

समझौतों से संघर्ष किया 

कथा कहानी खूब सुने 

माई के 

साहस खूब बटोरा बतियाते, 


ओछी चादर ओढ़ के सोये 

ढांके पाँव तो 

मुह खुल जाये 

हन्नागुन्ना करवट से 

सौ सौ गुजरें रोज बारातें ! 


जस तस कटती रात 

भोर फिर सुबह की 

धूप सेंक कर खिल उठते 

चेहरे मुरझाये 

किन्तु कठिन कसालों के 

दिन लगते पेट को भारी,

लट पट धांधर धंधे तो 

खेल की सूझे 

बूझे कोई न करे चर्चना 

सुधियों में रहे न 

भात भगौना 

और पतीली की तरकारी, 


कायल हैं वन उपज के 

जिसने आड़े समय में 

दिया सहारा रही साथ 

में हरदम 

जैसे टटिया टाट कनातें ! 


स्कूलों का बुरा हाल था 

अवसर देख समय ने 

अच्छा धुना रुई के जैसे 

रुआ रुआ 

आवेषित हुआ बुद्धि का 

बगरी छोड़ बसेरा,

अपनी स्वांस खलैतों से 

स्वयंप्रभा की भट्ठी में 

लौह गलाया 

ठोंक ठठा कर 

देता रहा 

अनेकानेक आकार ठठेरा, 


धीरे धीरे बदला समय 

अभी तो बह निकला 

कई धाराओं में 

इसीलिये अंधे भादो के 

सावन सुतरी कातें ! 


भोलानाथ

Monday, 6 September 2021

क्या उभरेगी तस्वीर

क्या उभरेगी तस्वीर 

आईने में 

परत 

धूल की है पुस्तैनी ! 


झाड़े पोंछे 

जाले कौन उतारे

हाथ 

खंधे हैं मलते खैनी ! 


चुंगी चिलम की 

भभक फूंक में

लय जीवन की 

तिनके जैसे उड़ी,

परिचय की 

जलती हुई मशाल के 

नीचे रही 

गुमनामी सदा खड़ी, 


संपर्कों के सूरज

अस्तूरों को 

देते 

रहे धार नित पैनी ! 


सुधियों के 

उड़ते तोतों ने

खाया खेत 

खूब चोंच चटकारा,

कथा सुनी 

गुरु ज्ञान लिया 

दिया न धेला 

चिथरा चिथरा झोली फारा, 


हुआ 

हतास न हिम्मत हारा 

जुता रहा खेतों 

जस हल बैल हरैनी ! 


सड़क लीक 

न पगडंडी का 

लिया सहारा

तोड़ रहे हैं समय शिला,

अपनी राह बनाने 

निकले राही हैं 

नहीं 

किसी से कोई गिला, 


हारे थके की साथी 

अपनी 

है झोपड़ पट्टी

कुशा खाट सुस्तैनी ! 


भोलानाथ


Sunday, 5 September 2021

धारा नहीं कुछ गांव में ऐसा

धरा नहीं कुछ गांव में ऐसा

बचा नहीं कुछ
शेष आकर्षण उत्सव
जिसकी सोहरत पर्व के
दुर्लभ किस्से
कथा कहानी गायी जाये !

दूध दोहनिया दिखे न माखन
अईरा गोरु
गाय उपेक्षित मरे भूख से
घंटे घुंघरू गले बैल के
और
दिखै न कंधे जुआं उठाये !

बाग बगीचे पोखर झरने
चुनगुन कलरव
दांय
गडायन जवा जबारे
मढ़ियों पंडे लोक कलायें
उड़ता समय बिम्ब ले भागा,
कटी फटी मिट्टी की
सतियां चढ़ी दिवारें
आंगन तुलसी
गोबर लिपा बैठका
हुक्का की गुड़गुड़ आहट
धरे संदेश न मोगरी कागा,
भोर भिन्सारे घुरुर घुरुर
संगीत न जतवे का
न चूड़ी पायल की झनकार
सूने पनघट
अब चुहल चिरैया
उड़ उड़ धूधुर नही नहाये !
लोटा ले निस्तार बहाने
हीर न निकले
पार करे कस लक्ष्मण रेखा
भीतर कुसमित पंचवटी से
महकती
तितली न उस पार उतारे,
बिरह व्यथा की कथा
सुनाता
बंजारों सा नहीं भटकता
गलियों गलियों रांझा
न ही तान छेड़ता
बासुरिया की नदी किनारे !
शहरी व्यामोहों में माटी छूटी
सपनों के संसार का
जिस तिस से
पता पूछते भटक रहा है
आज
आदमी खुद को मूड उठाये !
सबका साथ विकास सभी का
सुघर सलोना नारा
सुन चल पड़े सभी
छोड़ जमीन विरासत की
परसादी जिसे मिली
वह पंजीरी सा लील गया,
जिसको पूजा मिलीं न परसादी
मुह की थाल हाथ से छूटी
वह पेट की देखे
या फिर पकड़े जमीन
या छोड़े
किया धरा सब नया नया,
पुरखों की थाती
नासमझी में छूटी
लगी बुझाई के व्यापारी
घूम रहे हैं गली गली
ओठों धनुष
कुबोलों के बाण चढाये !

भोलानाथ

Saturday, 4 September 2021

तू तो सोच अलग कुछ औरों से

 तू तो सोच अलग कुछ औरों से

मठ महंत पद पाने को

दूध सिकहरे 

मठा घोर किरदार मिलेंगे बहुतेरे ! 


साम दंड के भेद भजन में 

बुनती जरी जुगत की सुई सूत सी 

दमड़ी दाम की 

नातेदारी दद्दा भाई फुफेरे! 


मीठा मीठा बेदाम नरी 

पेट फटे तक 

कच्चा पक्का 

स्वाद मिले की सब लीलेंगे,

करू करू सब शेष तुम्हारा 

बेकारण 

फुरसतिया बाबू 

प्याज के जैसे छीलेंगे, 


मंत्र मुखर आडम्बर के 

मायाजाल तिलिस्मी यज्ञ कुण्ड की 

हवन आहूती 

स्वाहा हैं कुश पानी पान के फेरे ! 


इनकी आंखों में 

यही कमेरे है 

बाकी सभी निठल्ले 

जन गोबर गंध डिठौरे हैं, 

अकल के अंधे 

गंजों की बारात में 

ऊंटों की बग्घी में 

बैठे पंडित बौरे हैं, 


गोड़ मिजैया आम खास के 

लिये है सूरज चांद तरैया 

जनता जुगनू खेत मडैया 

खड़ी धूप में रन वन हेरे 


अपनी हाथ हथौड़ी से 

समय शिला पर 

अपने युग निर्माण में 

मर खप वक़्त न जाया कर,

रच इतिहास तू 

संकरी खोल विचारों की 

भीतर से बाहर 

उगल झूठ सच मुह में धर, 


करू करू की बनने दे औषधि  

मीठे खारे का 

स्वाद देख न समय सुमेडी से 

अलग नहीं होने हैं ढेरे ! 


भोलानाथ

पानी पाथर हिचक नहीं

 पानी 

पाथर हिचक नहीं 

भीतर मन की 

एक बार लिख देख ! 


हुनर कलम की 

मन से है 

पंडित हो या 

हो कोई सिख शेख ! 


आग भरी माचिस की 

डिबिया जैसे 

केवल बीड़ी चुंगी 

मत सुलगा 

यह कलम है भैया 

आग ही आग उगलने दे,

बरसा पोखर 

ताल तलैया की सोहरत में  

पाल इसे न 

कुचली दबी दलित 

मर्यादा के लिये 

शिशु सा खूब मचलने दे, 


आगी पानी 

खेल के 

खेला की 

दीवार में तू दिख मेख! 


तोड़ सन्नाटा धरती अम्बर 

श्रजन साधिका 

विनय विनाश की 

देवी दुर्गा जैसी 

वाजिब 

अभव्यक्ति आजादी साध,

स्याही नहीं 

भरी है इसमें ज्ञान की 

रौनक 

इसके विज्ञान गणित की 

गणना और रसायन का 

साफा सिर बांध, 


दिया 

जला देवालय में 

देख न गुम्बद की 

काली कालिख रेख ! 


परिचय और अपरिचय के 

असमंजस की 

फांस विषैली 

बुद्धि अबुद्धि के 

गहरे बीच फंसी जो

उसे निकाल जहन से,

निजता के भाव बोध 

कितने भी छूटें पीछे 

छोभ न कर 

कार्य क्षेत्र के 

कर्म बिंदु से छूटे न 

कुछ अहम कहन से, 


चाहे भले 

पढ़े न गाये 

दुनिया जिये 

तुम्हारे आलिख़ लेख ! 


भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...