कठिन समय की धरी विरासत
ज्ञान ध्यानमलियागिर गंध नहाये
कोई सुने न कोई गुने न
शदियां बीतीं
अलख जगाते मगहर मरे कबीर !
झीनी चुनरी कफ़न अंगौछा
करघा सूत चढ़ा कर
झूम झूम के गाया गीत
कभी दिल रोया
ताना बाना की
लमझगड़ी करती रही अधीर !
खुद का काम कमेरे खुद के
सिर पर बोझ अटाला अटहर
पूर परैया मठा भात खा
जिया धूप दिन
हन्नागुन्ना
सांझ पगड़िया भूत उतारा,
फक्कड़ पीर फकीरी जी कर
प्रचलित अंध विधाओं की
गांठ खोलते
परत धूल की
रथियों के आगे
वसन के जैसे हवा में झारा,
कडुआ सच कह पाने का
अंदाज निराला
राजा रंक प्रजा मठ बम्हनौति के
बीमार जहन को
रहे पिलाते
अमृत झोलीदार फ़क़ीर !
ऊंच नीच नफरत के हठटंटे
दर्द खुशी
ख़ुशीहाली गाया
सैलाब समुंदर पी जाने का
भावावेग विवेक जगाया
जैसे अगस्त ऋषी,
विपरीत आंधियों अंधड़ में
तनके खड़े रहे
मानवता के चक्षु पटल पर
दिया जलाते
फुंकी झोपडी खुद की
घीच रसरिया रही कसी,
मौजी अल्हड़ हरफनमौला
फिकर नहीं की खुद के
खारिज होने की
ऊंची नाक की घेराबंदी
चलती रही
घाट बाट और नदी के तीर !
जितना आहत हुये चोट से
होते रहे मुखर
भरी अलाप न मौन हुई
न लय सरगम की टूटी
बजता रहा बिगुल के आगे
मंद मंद एकतारा,
राग द्वेष से ग्रसित
कुकुरिया भोंक भले
नफरत फैलाये
निर्मल निश्छल गंगा जैसे
बह रही कबीरी कथन
सत्य तथ्य की अविरल धारा,
भरे पेट बाजारवाद ने
खूब भुनाया
बिकते रहे कबीर
धोया कालिख रगड़ रगड़ कर
महकाया मन चंदन सा
धरा लिलारे तिलक अबीर!
भोलानाथ