Saturday, 11 September 2021

खींचतान आपस की ऐसी

खींचतान आपस की ऐसी

भरभराकर
गिरा भविष्य का
बनता हुआ किला !

बजी
ईंट से ईंट गारा गिट्टी
उपकारों का
धजी सांप सा मिला सिला !

धुआं धुआं रातों की
चांद चुनरिया जैसे
झीनी झीनी
बुनी महीन कनातें,
कुतर गई
चुहिया बिल बाली
चिन्दी चिन्दी रुआ रुआ सी
हवा में ऊंची ऊंची बातें,

बंटी फतोहीं आधीआधी
राख मठा का
धुला
मुरैठा सिर ताज मिला !

भागे भूत की रही
लंगोटी
हड्डी  जैसे कंठ फंसी है
काढ़े कढ़े नहीं चिंउटी,
चिथ चिथ चिथड़ी सी
हुई भोंथरी
दिनदूना रात चौगनी पीड़ा
दूध के जैसे अउंटी,

तय दिशा सफर की
मंजिल
स्टेशन स्टेशन बिकता
पानी बोतल हाथ हिला !

भीतर बलखाती महानदी के
किसी घाट पर
दूर दूर तक
दिखती नहीं है कोई कश्ती,
मगरमच्छ घडियालों का
जमघट कर रहा किलोलें
घाट उतरती
सांस है कितनी सस्ती,

तन मन बुद्धि के उपक्रम
सब धरे रहे
हिली हिलाये न
छाती से समय शिला !

भोलानाथ

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