बातें करते चूल्हा लकड़ी
आग तवा कीथकते कभी नहीं जो
देखा है कभी
सिंकी रोटियां
क्या चूल्हे के घैर की !
पांत में बैठे कभी नहीं
खाया पिया
पेट भर खड़े खड़े
सौ सौ छेद किये
देखे बड़ा बड़े बड़े
थार पतरियों गैर की !
अनजान अनाड़ी
बहुरूपिये
मदारी मजमों के माहिर
लगे सिखाने
काया कल्प करेंगेआलू का
पेर मशीनों में सोना कर देंगे,
चिड़िया चुनगुन पंख पखेरू
सोने के होंगे
नहीं नुचेंगे
न ही शिकारी शिकार करेगा
झोली में वैभव
बोली में अमृत भर देंगे,
खुशहाली के दिन होंगे
भूत प्रेत
मरघट के बासी
बरम सन्यासी
जगवासी ललाटों की
चंदन होगी माटी मैर की !
चना चढ़ाने
जबरा पेल की पोंदीपैया
अंधी अड़ी ने रौंदा खेत फसल को
बारह बाट किया
बेसुधी नहीं
बेसुध होने की लाचारी है,
मिट्टी की खुशबू का
ध्यान रखा न
माटी के मादर बने रहे
बिम्ब प्रतीकों की साझादारी की
किरकिरी रही आंख में
पानी में पानी की मारा मारी है,
गलाफाड चिल्लाने वाले
लावर लट्ठ गवारों की
लबरी चुपरी
समझ सके न
रहे बजाते सच की
पीठ में हकनी बैर की !
कभी इधर कभी उधर के
गठबंधन के
अनुबंध मौज की पुड़िया का
रंग नहीं देखा
न पहचाना पानी में
चूने का ठंडा होता हुआ उराव,
नदिया बदल रही
अपनी जलधारा काट रही
क्यों खुद के निर्मित किये किनारे
क्या थकी हुई है
चाह रही कुछ समय के खातिर
गहरे में ठहराव,
चिल्ला चोंथ की उबी
नई सोच की आगे आगे
बढ़ चली धार की
युवा मछलियों की
दिशा दशा पर
लगी नजर किसी गैर की !
भोलानाथ
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