Sunday, 12 September 2021

जब से जगा हूँ जागता रहा हूँ

 जब से 

जगा हूं जागता रहा हूँ

जागना ही होगा 

जन को जगाने के लिये ! 


फूंकते ही रहना होगा

शंख नाद 

सुबह की मुनादी 

मर्म समझाने के लिये ! 


भीतरी आनंद 

भोग की चित्र शाला में 

गहरी नींद 

जन्मों से जो सोये हैं,

रोज रोज घटती 

घटनाओं से बेखबर

निश्चिंत 

अपने सुख बोध में खोये हैं, 


जागेंगे 

होंगे उठ खड़े

अनजाने अवरोध से 

वतन को बचाने के लिये ! 


लिखता चल गाता चल

टेर दे अलख की

झनझनायेगा 

जहन एक दिन जरूर,

धीर धर लय अलाप 

छंदों की प्रवाह में 

बहेंगे 

साथ साथ छोड़ कर गुरुर, 


जागेगा जज्बा 

जयहिंद आन उदघोष का

शान से 

तिरंगा लहराने के लिये ! 


तर्क बहसबाजी उधेड़बुन 

अलहदा रख 

उड़ने दे 

ऊंचे ऊंचे कबूतर मिजाज के,

खुजाता रह 

दाद सा 

महकने दे मेहनत 

मजदूर की कंगूरों में ताज के, 


फूलते पचकते 

गुब्बारे सा पेट बड़ा कर

खुशी 

गम रंजिशें पचाने के लिये ! 


भोलानाथ








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