Friday, 10 September 2021

भीगी है माचिस की डिबिया

भीगी है माचिस की डिबिया 

उपले की आग

तलब बीड़ी की 

रह रह के मारे सिसकारे ! 


सुम्मा सुतरिया की 

गोली जला ले 

मार सुट्टा पर सुट्टा 

चुंगी का रतियों भिन्सारे ! 


भीतर की गुरसी के भीतर 

दबी आग ही आग है ! 


अपने हड़ौरे की चंदन सी 

चिकनी है माटी 

अपना करम है 

जब चाहे लिलारे 

उंगली से 

माथे तिलकिया लगाले,

गीली है बंधिया 

भीगा बदन है 

बादल फ़टे संझा बिरियाँ 

ढेरिया न कल के लिये 

रोपा की 

थरियाँ थर से मगा ले, 


टेक्टर की चावी नचा न 

मचौया मचा ले 

डबरिया की 

नन्ही मछरिया बड़ा जोर मारे ! 


टडकते चमकते 

पहाड़ों की चोटियों के 

रुके थमे 

बादल बरसने को 

मचल रहे 

पुरवा की बाहों में झूल के, 

जब तक है पुरवा 

पछुआ के गांव में 

खेत धांध लौट चल 

अमुआ की छांव में 

खिचड़ी पकाने 

तन मन की भूल के, 


थम थोड़ी होने दे ठंडी 

पी जब तक हंडिया का 

पहला उतारा 

तपन जी का निकारें ! 


अहसास असर

आहिस्ता आहिस्ता 

पढ़ धीरे धीरे खुमारी 

लोकल को बोकल बना 

बढ़ने दे 

धड़कन जिया बेकरारी,

जल्दी न कर 

उतरने दे घूंट घूंट भीतर 

चोरी न डाका 

घर की उपज अपने 

महुये का सत है 

जड़ से मिटाये बिमारी, 


रोज रोज पकड़े फोकट की 

ढोके सिपहिया 

पाँव सिर की चढ़ी 

लाठिया दिखा के उतारे ! 


भोलानाथ


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