<script data-ad-client="ca-pub-1507049022138382" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>चाहता हूँ
Friday, 28 May 2021
चाहता हूं मैं भी
<script data-ad-client="ca-pub-1507049022138382" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js"></script>चाहता हूँ
मै भी
सावन सा बरसना
चिलचिलाती धूप की
सुन्दर सुनहरी
देह को
जीभर भिगाने !
फिर देखता हूँ
बादलों का
काफिला
प्यासा बहुत
सुस्ता रहा है
सरकारी
अस्पतालों के मुहाने !
छोटी तलैया के
छोटे शिवालय में
अर्ध दे खड़ी हो
बौराया बादाम
फुलवारी
देख कर तुम्हारी,
तलैया के पीछे
सघन वन फूला
घेरे में बगिया
नीले कमल हैं
लचकी है पीछे
अमुआं की डारी,
जलती दुपहरी
सूर्य मुखी
फूलों का जत्था
चाह रहा दिन में
चंदा को देखना
छाँव के बहाने !
चाहता हूँ
मै भी
सावन सा बरसना
चिलचिलाती धूप की
सुन्दर सुनहरी
देह को
जीभर भिगाने !
फिर देखता हूँ
बादलों का
काफिला
प्यासा बहुत
सुस्ता रहा है
सरकारी
अस्पताल के मुहाने !
भोलानाथ
Thursday, 27 May 2021
पेट और जनेंद्रियों के इर्द गिर्द घूमते
मित्रो मुझे पता है निर्बाक हो कर कहना बहुत सरल नहीं है और न ही मन से तालियाँ बजाना हम सभी तो अपनी अपनी पीठें थपथपाने में ही सारा समय नष्ट कर रहे हैं या की कमेंट्स पर खुश हो कर अपनी कृतियों पर मगरूर हैं ! किसी भी प्रतिभा को पहचान देना सायद हमारे स्वाभाव में नहीं है --गिरगिट की पहुँच रेडहे तक है और उस रेडहे को सम्पूर्ण मान कर जीना अपने आप को धोका देने जैसा प्रतीत होता है ! भाटों की सभ्यता ज्यों की त्यों है केवल दरवार बदले हैं ! नसीहत देते चेहरों को जब देखता हूँ बहुत तरस आता है क्या करूँ गीत लिखने के सिवा कुछ भी तो नहीं मेरे पास बेबस हो कह देता हूँ हे मालिक अगली बार मुझे भी उज्जैनी में जगह देना जहां नट और भाट भी रत्नों की संज्ञा अर्जित करने में सफल होते हैं !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
शिवालय से लेकर
बीहड़ तक उतरे
सोमरस सुभीतों की
पुश्तैनी मटकी में
भर भर के ताड़ी,
काले कपालों के
भीतर का भेजा
शिकारी रंगों में
कंठों तक डूबा
अँधा अनाडी,
अँडज पखेरुओं के
चूजों की
ऊँची उड़ानें
खोखल में सिमटीं
पूंछों में बांधे
गुलामी का फीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
जगायेगा कब तक
बंजारा सूरज
सांसत में चंदा
चापलूसी के माहिर हैं
झिलमिल सितारे,
साधकों का चिंतन
संजीवनी
जाने न बकरा
सिलौंटियों में घिसे कौन
उठ कर भिनसारे,
गंगा नहाई
बैतरणी की बछिया
मवादों की धारा में
मछली सा डूबी
पगुराती
थूथुन भर लीले सुभीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
तिलक तर्जनी लगाकर
अंगूठे दिखाते
बिदुरों को शकुनी
दूध भरी नदिया
फेक रहे पाशे,
चक्रव्यूह तोड़ते
मच्छर से मरते
अभिमन्युं
परसादी सा बांटते
कौरव अर्जित बताशे,
क्या करेंगे पीटकर
युयुत्सी
सोच के नगाड़े
झूठ मूठ कसमें
मठाधीश खाते
दाबे कखरियों में गीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
भोलानाथ
क्षणजीवी उपदेशों की झड़ी लगी है
क्षणजीवी
उपदेशों की झड़ी लगी है
व्यास बखानी सावन बरखा
पौली फागुन ओंठ बताशे
मछुआरों के जाल !
जलजीवी
अनजान मछलियाँ
छल छद्मों की बंधी धार में
चारे की अभिलाषा
खींच रही है चीकन चांदन खाल !
ठाढ़ तिलक
मगरे के माथे
मधुर बयानी
गहराई में उथले झांके
ठंडी पूंछ गर्म हैं खूनी जबड़े,
बैठ किनारे
आँखें गाड़े
चोंच खुजाते चरके बगुले
छोटी चिनगी मुंड छिपाने
काई कांदो गवडे,
फटी फतोंहीं टूटे चश्मे
हाथ काटती जीवन रेखा
डोचकी से तोचक गए हैं
कल्लू काका के कलमी से गाल !
क्षणजीवी
उपदेशों की झड़ी लगी है
व्यास बखानी सावन बरखा
पौली फागुन ओंठ बताशे
मछुआरों के जाल !
जलजीवी
अनजान मछलियाँ
छल छद्मों की बंधी धार में
चारे की अभिलाषा
खींच रही है चीकन चांदन खाल !
बहुरूपियों के रूप निराले
जन्मों का लेखा
ठग विद्या के पड़े हैं पाले
देह धर्म का
रंग हुआ हर कोना,
वैतरणी का नाम सुना है
निर्वाषित सौगंध सांस की
संशय में अहसास
प्यास के
अनजान फैसला ढोना,
जीवन का मधुमास गुलाबी
पी पी पानी
भदैला उरदे जैसा चटका
छलकी गघरी भींगा आँचल
पनघट हैं बेहाल !
क्षणजीवी
उपदेशों की झड़ी लगी है
व्यास बखानी सावन बरखा
पौली फागुन ओंठ बताशे
मछुआरों के जाल !
जलजीवी
अनजान मछलियाँ
छल छद्मों की बंधी धार में
चारे की अभिलाषा
खींच रही है चीकन चांदन खाल !
धुली चांदनी आँखें फूटीं
जन्मों की टकटकी थकी
चकवा चकवी
धरे क्षितिज
प्राण प्रीत की थाती,
झूठ मूठ का जीवन जाया
गुरु बंदना शंख फूंकते
मेढी खलिहान
जलाकर खेत से
लौटा छोटा नाती,
उजड़े नगर तिलिस्मी
उल्लू रंग बदलते
मूंड मुड़ाकर गिनती सीखें
विश्वामित्र बनेंगे
गिन गिन अपने सिर के बाल !
क्षणजीवी
उपदेशों की झड़ी लगी है
व्यास बखानी सावन बरखा
पौली फागुन ओंठ बताशे
मछुआरों के जाल !
जलजीवी
अनजान मछलियाँ
छल छद्मों की बंधी धार में
चारे की अभिलाषा
खींच रही है चीकन चांदन खाल !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234
आपा धापी मसखरी मुखौटा ताजोतख्त के सपने !
आपा धापी
मसखरी मुखौटा
ताजोतख्त के सपने !
स्वांग नहाये
संदर्भी तीतर
भीतर लगे पनपने !
तानाशाह शिखंडी
बंदूकों की घनी छाँव में
कुम्भ नहाकर लौटे,
मीरा मर्म की गंगा
भरी जवानी खडी पूतना
खाली पानी औंटे,
तीरथ बरथ
घाट छोड़कर
तक्षक के घर लगे रपकने !
आपा धापी
मसखरी मुखौटा
ताजोतख्त के सपने !
स्वांग नहाये
संदर्भी तीतर
भीतर लगे पनपने !
धर्म ध्वजाओं की मर्यादा
चौराहों पर
मदिरा बोतल फूटी.
साख सूख गई कौओं के घर
बौरी कोयल
लाचारी में टूटी,
भरी कूच
महुये का जंगल
पतरोई पर लगा टपकने !
आपा धापी
मसखरी मुखौटा
ताजोतख्त के सपने !
स्वांग नहाये
संदर्भी तीतर
भीतर लगे पनपने !
शोहरती पहाड़ों के
शिखरों पर
कूद रहे हैं बंदरों जैसे बौने.
कौड़ी कौड़ी बेच रहे
पुरखों की प्रभुसत्ता
रह रह के औने पौने,
पितामह का बाहुबल
बचन बद्ध
अनायास लगा कंपने !
आपा धापी
मसखरी मुखौटा
ताजोतख्त के सपने !
स्वांग नहाये
संदर्भी तीतर
भीतर लगे पनपने !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234
अब किससे ऐंठे नहाये धोये बैठे
अब किससे ऐंठे
नहाये धोये बैठे
हम ही तो शेष रहे !
भरने को आहें
टूटी हैं बाहें
कलाई अब कौन गहे !
रथारूढ़
वल्गाओं का वारिस
विकल्पहीन थका थका
नाप रहा
अनचीन्ही मंजिल का
अंतिम ठिकाना,
सामर्थ्यहीन योद्धा
मजबूर है
करने को
कदमताल करती
नब्ज की लड़ाई
शेष नही कोई बहाना,
हुई देह धनुष जैसे
लड़े अर्जुन सा कैसे
लक्ष्य आंख के बहे !
पितामह का
सगुन साथ
छूटा है कबका
दिखे नहीं कोई केशव
जो भटके को
सही सही रास्ता दिखाए,
दिशाहीन
हांक रहा साँसों की रेवड़
हचर मचर बग्घी
इधर उधर
फिसल रहे पहिये
भय भीतर भर जाए,
है एकाकी मुसाफिर
और करे क्या आखिर
प्रतिपल संग्राम सहे !
पुरखे किस पंथ गये
पदचिन्ह नहीं दिखते
टूटकर
जो गिरी बांह
उसका प्रभाव नहीं
माटी में,
हवाओं में
अहसास होती है
केवल खुशबू
और भ्रमित घोड़े
हिनहिनाते हिलक हिलक
घाटी में,
पिठाहीं का डेरा
हथेली का फेरा
लगा रहा आज कहकहे !
भोलानाथ
प्राची कैसी बेला लाई रे आई है तन्हाई रे !
प्राची कैसी
बेला लाई रे
आई है तन्हाई रे !
सूरज चाँद
वही हैं और चमकते वही सितारे !
सुर्ख सुनहरी
चुप्पी छाई रे
मिटती नहीं मिटाई रे!
धरती अम्बर
बोध दिशायें हैं गुल्लों के मारे !
फफरी लगे हैं
ओंठ गुलाबी
कलफ बैगनी
केश चमकते
घुनी याद के जाल,
भेंट दुपहरी
ऊबी ऊबी
चढ़ी चाशनी
अनचीन्हीं सी बातें
चितवन धरे सवाल,
तिरछीं आँख
बिजुरिया भाई रे
पत्र लिखें जमुहाई रे !
कस्तूरी जैसी
धूप हिरानी हेर हेर हम हारे !
प्राची कैसी
बेला लाई रे
आई है तन्हाई रे !
सूरज चाँद
वही हैं और चमकते वही सितारे !
सुर्ख सुनहरी
चुप्पी छाई रे
मिटती नहीं मिटाई रे!
धरती अम्बर
बोध दिशायें हैं गुल्लों के मारे !
भौरों बाग़
बिराने
हो गये
द्वारपाल हैं
छत्तों भरीं डँटईयाँ,
सुई चुभोते
डंक दंश अब
विज्ञापित
मुस्कान बसंती
घायल हुईं डरईयाँ.
फूल नहीं
पुरी है काई रे
गंध छुपी है खाई रे !
उलझी यादें
जहन से अब तो सूरजमुखी उतारे !
प्राची कैसी
बेला लाई रे
आई है तन्हाई रे !
सूरज चाँद
वही हैं और चमकते वही सितारे !
सुर्ख सुनहरी
चुप्पी छाई रे
मिटती नहीं मिटाई रे!
धरती अम्बर
बोध दिशायें हैं गुल्लों के मारे !
जन्म जन्म
मधुमास
कोयलिया
साँस प्रहर के
क्षितिज सूर्य से बंधे हैं नाते,
दुधमुंही
किरण
अधरों से उजड़ी
यश वेदी पर
कौन सिंधौरा तर्कुटी सजाते,
रह रह
सूख गई अमराई रे
हो गई पर्वत राई रे !
फुनगी छोड़
हुये परदेशी रंगीन पंखेरू सारे !
प्राची कैसी
बेला लाई रे
आई है तन्हाई रे !
सूरज चाँद
वही हैं और चमकते वही सितारे !
सुर्ख सुनहरी
चुप्पी छाई रे
मिटती नहीं मिटाई रे!
धरती अम्बर
बोध दिशायें हैं गुल्लों के मारे !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234
रस्साकसी राजनीत की
रस्साकसी
राजनीत की
बेमंथन घट, पानी पानी
फेन दूधिया दिखे दूर से
जस विधवा का आँचल !
काई कांदो
लिखे ककहरा
घाटी घाटी उड़ उड़ तोते
महा मन्त्र पढ़
पूंछों सींचें मुख गंगा जल !
सधी ओंठ
अक्षर के लाले
मुह मिट्ठू बौने किले कंगूरे
बैठे ठाले
मुट्ठी बाँध दिखाते खड़े अंगूठे,
सभागार बारूदी बत्ती
की चर्चा पर
आयोगी रुमालें धर धर
आंसू पोंछें
हाथ जन्म के झूठे,
यश गौरव
मक्कारी के घर
भरती पानी
बांह सिकोड़े पुश्तैनी सत्ता
पुन्य की छाती जोत रही है हल !
रस्साकसी
राजनीत की
बेमंथन घट पानी पानी
फेन दूधिया दिखे दूर से
जस विधवा का आँचल !
काई कांदो
लिखे ककहरा
घाटी घाटी उड़ उड़ तोते
महा मन्त्र पढ़
पूंछों सींचें मुख गंगा जल !
किसको रोकूँ
किसको टोकूं
आक्षितिजी इंद्रजाल फैला है
चमक रहा सेतु शिखर
चमचमाती धूप में,
प्रेतों के डेरों में बैताली पहरे
झंडों के नीचे हैं ठहरे
मिलते हैं साधुओं के रूप में,
टेशुओं की
लौंद नहीं
रक्त भरे पंजे हैं
कीर्ति की पहाड़ी पर
लीद को समझ नहीं विन्ध्याचल !
रस्साकसी
राजनीत की
बेमंथन घट पानी पानी
फेन दूधिया दिखे दूर से
जस विधवा का आँचल !
काई कांदो
लिखे ककहरा
घाटी घाटी उड़ उड़ तोते
महा मन्त्र पढ़
पूंछों सींचें मुख गंगा जल !
मदिरा का मोह त्याग
रह होशावाश में
रद्दी के भाव नहीं बिकना है
घूम रहे साथ
आंत के कबाड़ी,
हुक्कों का घना धुंआ
फैला है दूर तक
हरियाली नज़र नहीं आती
रौंद रहे हैं अरने
तोड़ ताड़ बाड़ी,
कोढिओं का अहम देख
और देख
काली कजरौटियाँ
अंधों की आँखों में
आँज रहीं काजल !
रस्साकसी
राजनीत की
बेमंथन घट पानी पानी
फेन दूधिया दिखे दूर से
जस विधवा का आँचल !
काई कांदो
लिखे ककहरा
घाटी घाटी उड़ उड़ तोते
महा मन्त्र पढ़
पूंछों सींचें मुख गंगा जल !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234
भैंसे की पूंछ पकड डबरे में डूबे
भैंसे की
पूंछ पकड
डबरे में डूबे
बैतरणी के तिनके
कुछ काम नहीं आये !
अमुआँ की कोमल
फुनगी में
बैठी बंदरिया
शावकों को अपने
छाती चिपकाये !
बंश गत हवेली के
जाल पुरे नक़्शे में
धर धर हाथ की उंगलियाँ,
जलेबीनुमा भीतरी
सुरंगों की रंगत
घुमावदार भवर गलियाँ,
संहिता
सम्वादों की
संज्ञा संबंधों के नाटक
कह कह के
किस्से कहानी पढ़ाये !
भैंसे की
पूंछ पकड
डबरे में डूबे
बैतरणी के तिनके
कुछ काम नहीं आये !
अमुआँ की कोमल
फुनगी में
बैठी बंदरिया
शावकों को अपने
छाती चिपकाये !
उबलते विद्रोहों पर
रथारूढ़ कब कैसे डारे
सींगो में पगहे,
हिनहिनाते घुड़शाली घोड़े
खा खा के चाबुक
कैसे मौन हुये गदहे,
पुराने
प्रोजेक्टर में
संचित इतिहासी
बिंबों की जादूगरी
आँखों दिखाये !
भैंसे की
पूंछ पकड
डबरे में डूबे
बैतरणी के तिनके
कुछ काम नहीं आये !
अमुआँ की कोमल
फुनगी में
बैठी बंदरिया
शावकों को अपने
छाती चिपकाये !
सधी सोच आँज रही
कोरों में यूनानी काजल
खोल कर पिटारा,
सागर की लहरों सा
जिज्ञासु कौतूहल खोज रहा
द्वीप का किनारा,
खींच रहीं
गाडर
गईया की टांगें
शेरों की
माँदों में चूहे वियाये !
भैंसे की
पूंछ पकड
डबरे में डूबे
बैतरणी के तिनके
कुछ काम नहीं आये !
अमुआँ की कोमल
फुनगी में
बैठी बंदरिया
शावकों को अपने
छाती चिपकाये !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
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बह गये सुबह शाम ख्यालों में
बह गये
सुबह शाम
ख्यालों में
खोजता हूँ
खुद को झुर्र्रियों से
भरे हुये गालों में
लुढका कर
सूरज छानी के नीचे !
बूंद बूंद
सूख गया
सारा तालाब
उधर गई पपड़ी
मुरझाया
गमले का फूला गुलाब
बैल हुआ बूढा
हल कितना खींचे !
खरी खांड
कितना भी खाये
शनि देव जैसे
तेल में नहाये
गाल नहीं
होने हैं चिकने,
दूभर है
दूर दूर हरी घास
सावन का गदहा
दिखता उदास
टूटी वाल्गायें
आई हैं बिकने,
टूटी है
ओठों की बंशी
मुसीबत की मारी
घुड्शालों में
दिखती है केवल
जंग लगी करियारी
दाग नहीं छूटे
गंगा के फींचे !
बह गये
सुबह शाम
ख्यालों में
खोजता हूँ
खुद को झुर्र्रियों से
भरे हुये गालों में
लुढका कर
सूरज छानी के नीचे !
बूंद बूंद
सूख गया
सारा तालाब
उधर गई पपड़ी
मुरझाया
गमले का फूला गुलाब
बैल हुआ बूढा
हल कितना खींचे !
भोलानाथ
शुभ रात्रि कैसे कहूँ
शुभ रात्रि
कैसे कहूँ
मेरे सोने का समय
हुआ नहीं !
अभी तलक दीदार
आपका
मेरी आँखों को
छुआ नहीं !
बैठा हूँ
खिड़की पर आंख धरे
चुलू भर
चांदनी की चाह में,
छुरियों सी लगती हैं
अपनी ही सांसें
दिखा नहीं
चाँद ईदगाह में,
अनार की डाली का
मधु छत्ता
बूंद बूंद
अभी चुआ नहीं !
शुभ रात्रि
कैसे कहूँ
मेरे सोने का समय
हुआ नहीं !
अभी तलक दीदार
आपका
मेरी आँखों को
छुआ नहीं !
शुभ रात्रि का
अनछुआ संदेशा
आया है
छज्जे से खिड़की के रास्ते,
माफिया हवाओं का
पहरा है फांसी
हमारी
मुहब्बत के वास्ते,
अपनी बेकरारी
बाया करें कैसे
ये दिल
मैना या सुआ नहीं !
शुभ रात्रि
कैसे कहूँ
मेरे सोने का समय
हुआ नहीं !
अभी तलक दीदार
आपका
मेरी आँखों को
छुआ नहीं !
मृगछलनाओं के पीछे
अनायास
भाग कर
समय सार बीता,
अँधा अनुसरण
एक्लव्य का ठीक नहीं
अंतर का
तरकस ही रीता,
भौंरे भी
चले गये बाग़ से
रातरानी के पास
अभी दुआ नहीं !
शुभ रात्रि
कैसे कहूँ
मेरे सोने का समय
हुआ नहीं !
अभी तलक दीदार
आपका
मेरी आँखों को
छुआ नहीं !
भोलानाथ
गंजेड़ी न थे हम भंगेड़ी न थे हम
गंजेड़ी न थे हम
भंगेड़ी न थे हम
पी जब से मदिरा आंख से तुम्हारे
हम भी नशेड़ी हुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
कलरव कहानी
पनघट का पानी
छलकती गगरिया अधभीगा आँचल
वैसे कसेड़ी कुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
दूर धर बहाना
सच सच बताना
याद क्या हमारी आती नहीं,
पुरवा से कहना
सीख लिया रहना
संझा गौधूलि और भाती नहीं ,
भोरे की बिरियाँ
मुडेरे की चिड़ियाँ
उड़ उड़ के गावेंअमुआँ की डारी
बैठे बंसेड़ी सुये हैं!
बस तुम नहीं हो !
बरगद के नीचे
चुप आंख मीचे
तुम्हारी पड़ताल में अकेला,
सकरी खनकाता
खुद को बहलाता
छोड़ आया पनिहारियों का मेला,
चरचीली रेख का
अंकित आलेख का
कटा फटा रटा झूठ कानों घोलते
खोलते सुमेडी मुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
सपन किये जौहर
सगुन साथ पीहर
हांक दी रेवड़ डोली में चढ़ कर,
गुब्बार धूल का
एक छोटी भूल का
रहे चुप देखते मुखडे को पढ़कर,
व्यथा पूरी पूरी
कथा जी अधूरी
धुयें की लकीरों में जल भुन भटके
कमरी कमेडी खुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
भोलानाथ
बड़े सींग वालों की सींग पर
बड़े सींग वालों की
सींग पर
हम मुंडे
अक्सर दिख जाते
घी तेल पालिश चुपरते !
उनके किये गोबर को
गौर मान
किया हल्दी अक्षत से अर्चन
फिर भी
दुर्गन्ध सा अखरते !
कीर्ति ध्वजा
उनकी जयकार में
समय किया जाया,
सोये शिल्पी को
दरवाजा पीटकर
देर से जगाया,
चिलचिलाती
खड़ी धूप में
शैतानी
थूहर लंजार को
बैसाखी खेत सा बखरते !
सेत मेत
रौ नखरों से बाहर
लय पर हैं निकले,
मुखर
कैसे होते वहां
पालतू हैं गूंगे हकले,
ओछे पैमानों में
कितना
झुकते सिकुड़ते
उस बौनी
दुनियां से कैसे उबरते !
कोई साथ आये
न आये
पढ़ने सामांतर लकीर,
भीख दे चाहे
फाडे अधारी
हम ठहरे मन के फकीर,
जन्मजात
रैयत के हक में
अलखाते
गीत गा जगाते
नईअलख गिरते समहरते !
भोलानाथ
लिख पढ़ खूब डूब चिंतन में गहरे
लिख पढ़
खूब डूब चिंतन में गहरे
ले देख परख
कुछ पल तो जी के
समाधि क्षणों को !
कंठ परस्ती
न कोई हस्ती जनेगी
करने दे
नर्तन वनों में
इन शिव गणों को !
खाके पतझर की सूखी
बेल पत्र
कुछ दिन बे पानी के जी,
धूनी में फेंक दे
कमंडल
विष पूरा नागों का पी,
खोने दे सुध बुध
छोड़ हंसी ठट्ठा
लड़ने दे
जंग में निहत्था
सिर कटे धड़ों को !
होने दे लोट पोट
सखियों सखों को
मल भष्मी मुख पर,
छाती बांध के शिलौंटी
पगहा डार
रंगरीले सुख पर,
कुंडलियों सा जागेगी
फली भूत साधना
बांधेगी
सूत्र में शिव से बड़ों को !
हांथी दांत भीड़ का
विकल्प
नहीं होना है आज तुझे,
बैजू सा पिघला के पत्थर
फिर से
जलाना है दिये जो बुझे,
खलल खोट से
अलहदा
सहज चकरा चला कर
आकार
सही देना है कच्चे घड़ों को !
भोलानाथ
सुखद सहज मानस का आयोजन
सुखद सहज
मानस का आयोजन
फारे डारे
कपार बबुआ !
गाये चिल्लाये
किसकी लाचारी से
कितनाअनजान लछुआ !
श्री हरि चरणों तक
पहुंचे न पहुंचे
बंटहरों की भेजी
स्वर लहरी धारा,
सुधि जन
सब खोज रहे बृंदावन
मौलिक नींद का
सरयू का छोड़ कर किनारा,
नंदन जयघोष के
नर्तन में मस्त है
चुंगी फूक पछुआ !
अखंड नहीं
खंड खंड जोड़ती
सभ्यता के
पोषक बन बैठे जाने अनजाने,
स्वयं प्रभा
बुद्धि के मुहाने तक
पहुंच नहीं
चातक सा स्वाति में हिराने,
अपनी खरगोसी तंद्रा में
अटल रहे
सफल रहा कछुआ !
बंदरबुद्धि
फांद की धमक में
हिलाता है जब तब
पीपर की ऊंची डरैयां,
घोसले से अपने
बाहर निकल कर
पड़ोसी को कैसे
सिखायें सलीका चिरैयां,
पूर्णाहुति के
मंत्र सुन
डसता रहा पीठ पांव बिछुआ !
भोलानाथ
गीत गाऊं या सुनाऊं आप बीती
गीत गाऊं
या सुनाऊं आप बीती
तुम बताओ साथिया
करती हैं
भ्रमित मुझे जाल पुरी वीथियाँ !
खंडहर हवेली का
गुर गौरव खाकर
बैठक में
अपने विस्तार को
चक्र व्यूह बुनती हैं चीटियाँ !
समयगत चुनौतियों से
जूझने की सूझ
समझ नजर नहीं आती,
देखिये जुर्रत
धमकाती इतिहास के सिकंदर की
हाथ लिखी पाती,
नई सुबह
सूरज की स्वर्ण किरण
स्वीकार नहीं जिनको
खाक देंगे
राष्ट्र को नेत नियत नीतियां !
गौरव गाथा की
तेज मुहिम के आगे
खोदेंगे खंतियाँ नकारे,
शंबूक बध की हाय तौबा
और वहीं कल्पित हैं
राम के नारे ,
दिवा स्वप्न देखती
भीड़ का एक नहीं
चेहरे बहुत हैं
कंधों में
धरे हुये तेजधार गैंतियाँ !
विकास के अध्यायों में
कलमकारों की
आपस में ठनी हुई,
लक्ष्य बहुत दूर है
अदला बदली पगड़ी की
परम्परा धनी हुई,
जिरह जोर
अजमाइस के दांव पेंच
अपने
संदर्भों से बंधे रहे
और बंधी रहीं रीतियां !
भोलानाथ
बहुत बुरे हालात
बहुत बुरे हालात
कोई न माने बात
सबके अपने कथा गीत हैं !
लगती बहुत अनूठी
सच्ची कितनी झूठी
अनमन चेहरे मिले मीत हैं !
चौका बासन
ठंडे ठंडे
चूल्हे दबी आग की
लकडी कंडे राख बिराती,
धरे ताक
सपने जीवन के
कुछ सूखे कुछ मुरझाये
फ़टी जेब अहसास कराती,
घर है धुआं धुआं
धांधर आग कुआं
व्यंग जिंदगी देह पीत हैं !
बहुत बुरे हालात
कोई न माने बात
सबके अपने कथा गीत हैं !
लगती बहुत अनूठी
सच्ची कितनी झूठी
अनमन चेहरे मिले मीत हैं !
अभिव्यक्ति है अफवाह नहीं
जो हरदम
दौड़ लगाकर
बिन पाँव पहुचती घर घर,
बैठे ठाले कानाफूसी
देखा देखी
उठें उंगलियां
बांक परनिया पर,
दुधमुंहा उठाती
फूटी थाल बजाती
पानी पातर मिर्च तीत हैं !
बहुत बुरे हालात
कोई न माने बात
सबके अपने कथा गीत हैं !
लगती बहुत अनूठी
सच्ची कितनी झूठी
अनमन चेहरे मिले मीत हैं !
हारे थके न पीछे लौटे
था धोखा
संघर्ष समय
टूट रही हर एक चुनौती,
काट रही है
छांट रही है
धीरे धीरे
कांटेदार करौंदे नई सरौती,
साहस समझ बयानी
लिखती नई कहानी
सरा भात सी मठा रीत हैं !
बहुत बुरे हालात
कोई न माने बात
सबके अपने कथा गीत हैं !
लगती बहुत अनूठी
सच्ची कितनी झूठी
अनमन चेहरे मिले मीत हैं !
भोलानाथ
अपने रंग में
अपने रंग में
रंगे हये हैं
गीतों के उस्ताद !
पूंछ परख
पहचानते
अपने रंग उत्पाद !
और रंगों से
घिन आती है
गंधाते हैं गटर के जैसे,
नकुओं धरे
रुमाल विचरते
खींस हिलायें छुट्टे पैसे,
अंधर रेवड़ी सा
ओंठ दबाये
पान पीक सी दाद !
अपने रंग में
रंगे हये हैं
गीतों के उस्ताद !
पूंछ परख
पहचानते
अपने रंग उत्पाद !
खिल्ली ठट्ठा खूब लिखें
जग की खातिर
बाचें खुद की गीता,
शिखर में बोया
कदम्ब ड़ार सा
झूल रहा है
साथ सुभीता,
हरी भरी
गंगा की सींची
तुलसी हो रही खाद !
अपने रंग में
रंगे हये हैं
गीतों के उस्ताद !
पूंछ परख
पहचानते
अपने रंग उत्पाद !
अपने रंग की
बुद्धि बखानी खेमे खेमे
खेल रहे जो फ़ाग,
रंग निथारा काट टहनियां
धीरे धीरे
तेज किया है आग,
छंद बन्द नवगीतों से
करेंगे हम भी
नये नये संबाद !
अपने रंग में
रंगे हये हैं
गीतों के उस्ताद !
पूंछ परख
पहचानते
अपने रंग उत्पाद !
भोलानाथ
कैसी यह माया
कैसी यह माया
कोई नहीं आया
सौंप दूं किसे
छतनारी पीपर
तोड़ रही
जन्मों से छाती !
नई चोंच तोते
हवाओं के गोते
पहचान नहीं पाये
दूध भरी
टहनी में
फुनगी की पाती !
सूर्यप्रभ प्राणों का
कोई विकल्प यदि होता
साँसत में
होते न साँसों के फेरे,
चीन्हे सन्नाटों के
पांव तले
मखमली गलीचों सा
बिछे नहीं होते समय के उधेरे,
बीते दिन नीम के
गिरवी हुये क्रीम के
हड़ौरे की
नागफनी
गाडर की
रेवड़ जब तब भरमाती !
ऊसर न होती जो परती
बंजर की धरती
मन के हिरन क्यों
आवारा जैसे वन वन भटकते,
उधेड़ बुन के चरखे चलते
जागे जहन में
रुआ रुआ भावबोध
चकरी की धुरी से लटकते,
तने जैसे आले
मकड़ी के जाले
बसनी से बंधे रहे
जैसे धरी हो
पुरखो की
पुस्तैनी थाती !
पिंजरे के तोते जो होते
सुर्ख लाल
मिर्ची चबाकर
मारते कुलाटी रटते दूध रोटी,
आकाश ऊंचे
उड़ते परिंदों की
अगुआई करते
बचे बाजों से कैसे नेत नियत खोटी,
सबकी खुशी का
ओंठ की हंसी का
पैगाम दे कर
लूटे लुटेरा
बजबा के थाली
गवाये संझबाती !
भोलानाथ
रहे देखते खड़े भौचक्के
रहे देखते खड़े भौचक्के
सब कुछ लूट लिया
बाजारवाद ने
जात कुजात का भेद न देखा !
रहल बंधी रामायण धरी रही
पढा न जाना समझा
जन्म मरण के बीच
आड़ी तिरछी रेखा !
मर्यादाओं के
सारे बंधन टूटे
रीति रिवाज के सन्दर्भों की
भाव बोध अभिलाषा,
संस्कार के उड़ें चीथड़े
जैसे बारात भीड़ में
फेंक रहा हो
कोई रंगे बताशा,
मींजैं मसलैं पाँव के नीचे
लहक लहक कर
भंगड़ा नांचें
सब कुछ करके अनदेखा !
मातृ पिता का कहा न मानैं
धता बताकर
आंख तरेरैं
जैसे हों लमेठ अनगईया,
घूमैं फिरैं
करैं मनमानी
मचलैं पसरैं सकरे कूदें
जस चढ़े सिकहरे बिलैया,
गर्दन टेढ़ी जीभ निकारे
मुह ऐंठाये
आँख दाब के
सेल्फी लेवें दिखावें केखा !
धर्म कर्म मन मंदिर
मूरत पोथी पत्रा
महामंत्र रामायण गीता
अर्थ तंत्र उत्पाद गिने,
दूल्हा दुल्हन शादी ब्याह
जनेऊ कुआरे
शिक्षा दिक्षा
सब कुछ
हुआ बजारू किसने जाल बुने,
पानी पवन पशु पखेरू
दान की बछिया
नहीं बची
रखता है बाजार सभी का पूरा लेखा !
भोलानाथ
सूरज को दिया दिखाने के ठेके जिन्हें मिले !
सूरज को
दिया दिखाने के
ठेके जिन्हें मिले !
नौ मन तेल
जुटाने में
टूटे बुर्ज बिके है किले !
पायल बजी
न राधा नाची
स्वीकृत होने की
रही अकथ कहानी,
पनपी रीति रिवाजें
कितनी
आईं गईं लीक के
बाहर छोड़ निसानी,
गई भैंस पानी में
जैसे
फिरें बरेदी जिले जिले !
धर्म सभ्यता के
सारे सूत्र सही थे
इसीलिये
माटी में बचे रहे,
छुद्र नदी से
कितने
नाले परनाले उमड़े
तिलक लिलारे रचे रहे,
खता जिये
लम्हों के भीतर
सूर्यमुखी से सदा खिले !
धीरज साहस
शील आचरण
बरगद जैसे
कटते उलहते छायादार हुये,
पौ परी
सुहानी सुबह के जैसे
सुगढ़ मसौदों के
हर पल हकदार हुये,
छोड़ मंत्रणा
घंटी वाली
चूहे खोद रहे हैं बिले !
भोलानाथ
महामारी का खूनी दौर है
महामारी का खूनी दौर है
सचेत रहें
अपनों का ध्यान रहे !
आस्वासन राजा के
फिस्स हुये
इंतजाम नरदों में खूब बहे !
लच्छेदार ऊंचे ऊंचे पहाड़ चढ़
जाने की
बोल गये मन की बात,
बने रहो बौरे सुनते रहो
पूंछेगे
सूरज से ढलने दो रात,
लपर झपर
पहरेदार हुये बहरे
सुनें नहीं काल के कहकहे !
चापलूस छदमी मुस्टंडों को
फर्क
नहीं पड़ता मरे जिये कोई,
विलाप महामारी का
मरघट तक सीमित है
जब तक रैयत है सोई,
पाखंडियों के राजभोगों का
बोझ मर खपकर
वक्ष में बहुत सहे !
रहे इनके आसरे तो
अंत नहीं होगा
दारुण दुखों का हमारे,
लड़ना है मिलजुल कर
हालात से
नहीं रहनाऔर किसी के सहारे,
मुह मुस्का दो गज की दूरी
सेनेटाइजर
की शीशी हाथ गहे !
भोलानाथ
Wednesday, 19 May 2021
मन के लेखे
मेरे अपने मन के लेखे
आस पास जो महापुरुष थेबैठे हैं चुप
क्यों
मुह में दही जमाये !
सरेख रहे अपनी जमीन
या खेमे के
खतरनाक मंसूबों पर
चूहों के जैसे
बिल में सभी अमाये !
जिसकी लाठी
भैंस उसी की
ऐसे
तामस संदेशों की
नाक नकैल की खातिर
खोल सुमेडी रस्सी भांजी है,
दृष्टि साफ रहे
सदा सदा
इसीलिए कजरौठी का
सारा काजल ऊपर नीचे
पलक बिरौनी
सुरमे जैसे आंजी है,
जोड़ घटी न जाने
फिर भी
मूड़े मूड़े फिरै लठैती
आर्य भट्ट के शिला लेख पर
अपना नाम लिखाये!
लतखोरी के आदि पुरुष हैं
मुह माईक
फोटो चस्पा कर
डुगडुगी बजाते
जैसे सजा का
शाही फरमान सुनायें,
ऐसे जितने अहम के रोगी
सींग हिलाते
दिखें अगाड़ी
फिर पीठ पिछाड़ी उनके
क्यों न
हम भी लट्ठ बजायें,
अनुयायी नही
हरिश्चन्द्र के
साधक हैं मर्यादा के
पदचिन्ह पूजते
जन्म से अपने राम के आये !
बैसाखी का
सफर नहीं था
कहीं का ईंटा
कहीं का रोड़ा
भानुमति के कुनवे से
हमने रिश्ते रखे नहीं,
जितना
चल पाये खूब चले
हाथ पांव नहीं फूले
भैंस बीन के आगे
हाथ पसारे
और किसी को दिखे नहीं,
अपने पाँव
पसुरियों के बल
रंग बिरंगे पखने हरदम
झुंड में
उड़ती चिड़ियों के गिनते आये !
भोलानाथ
सूरज नहीं बिरा
काँदो काई सतह से
सूरज नहीं बिराकमल गंध सुन रे !
ताक झांक तज
अब औरों की
अपने लिये घोंसला बुन रे !
होंगे मंदबुद्धि कुछ भौंरे
बंद तुम्हारी पंखुरियों में
पर तू नहीं
वफ़ा के लायक,
पौ फटते ही
साक्ष्य में स्वर्णिम किरणों के
हस्ति क्षुधा की
भेंट चढ़ेगा निश्चित नालायक,
हरि चरणों मे
जगह मिले
ऐसे कहाँ तुम्हारे गुन रे !
मछुआरे सी परख नही
फटा पुराना जाल तुम्हारा
काँख पेल
मत निर्मल नदी में फेंक,
हवा हवाई मंसूबों की
जियत मछलियाँ
खपे हुए अंगारों पर
मत भरता जैसे सेंक,
दाढ तोड़ न
लौह चने हैं
बांगर माटी चारा चुन रे !
ब्रम्ह पुतरिया है
माटी की माटी में रह
नही हैसियत तुझमें
कोई रच दे नया रचाव,
जंगल जंगल
लुमडी जैसे कूद फाँद नहीं
ऊंचे की अंगूर बेल है
खट्टे खड़े उराव,
छोड़ भजन की
सीधी सच्ची राह
रुई सा चित चिंतन मत धुन रे !
भोलानाथ
चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...