Thursday, 27 May 2021

बह गये सुबह शाम ख्यालों में


बह गये 

सुबह शाम 

ख्यालों में 

खोजता हूँ 

खुद को झुर्र्रियों से 

भरे हुये गालों में 

लुढका कर 

सूरज छानी के नीचे !

बूंद बूंद 

सूख गया 

सारा तालाब 

उधर गई पपड़ी 

मुरझाया 

गमले का फूला गुलाब 

बैल हुआ बूढा  

हल कितना खींचे !

खरी खांड 

कितना भी खाये

शनि देव जैसे 

तेल में नहाये

गाल नहीं 

होने हैं चिकने,

दूभर है 

दूर दूर हरी घास

सावन का गदहा 

दिखता उदास  

टूटी वाल्गायें 

आई हैं बिकने,

टूटी है 

ओठों की बंशी 

मुसीबत की मारी 

घुड्शालों में 

दिखती है केवल 

जंग लगी करियारी  

दाग नहीं छूटे 

गंगा के फींचे !

बह गये 

सुबह शाम 

ख्यालों में 

खोजता हूँ 

खुद को झुर्र्रियों से 

भरे हुये गालों में 

लुढका कर 

सूरज छानी के नीचे !

बूंद बूंद 

सूख गया 

सारा तालाब 

उधर गई पपड़ी 

मुरझाया 

गमले का फूला गुलाब 

बैल हुआ बूढा  

हल कितना खींचे !


भोलानाथ

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...