बड़े सींग वालों की
सींग पर
हम मुंडे
अक्सर दिख जाते
घी तेल पालिश चुपरते !
उनके किये गोबर को
गौर मान
किया हल्दी अक्षत से अर्चन
फिर भी
दुर्गन्ध सा अखरते !
कीर्ति ध्वजा
उनकी जयकार में
समय किया जाया,
सोये शिल्पी को
दरवाजा पीटकर
देर से जगाया,
चिलचिलाती
खड़ी धूप में
शैतानी
थूहर लंजार को
बैसाखी खेत सा बखरते !
सेत मेत
रौ नखरों से बाहर
लय पर हैं निकले,
मुखर
कैसे होते वहां
पालतू हैं गूंगे हकले,
ओछे पैमानों में
कितना
झुकते सिकुड़ते
उस बौनी
दुनियां से कैसे उबरते !
कोई साथ आये
न आये
पढ़ने सामांतर लकीर,
भीख दे चाहे
फाडे अधारी
हम ठहरे मन के फकीर,
जन्मजात
रैयत के हक में
अलखाते
गीत गा जगाते
नईअलख गिरते समहरते !
भोलानाथ
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