Thursday, 27 May 2021

अब किससे ऐंठे नहाये धोये बैठे

 अब किससे ऐंठे

नहाये धोये बैठे 

हम ही तो शेष रहे !

भरने को आहें

टूटी हैं बाहें

कलाई अब कौन गहे !

रथारूढ़ 

वल्गाओं का वारिस

विकल्पहीन थका थका 

नाप रहा 

अनचीन्ही मंजिल का 

अंतिम ठिकाना,

सामर्थ्यहीन योद्धा 

मजबूर है

करने को 

कदमताल करती 

नब्ज की लड़ाई  

शेष नही कोई बहाना,

हुई देह धनुष जैसे

लड़े अर्जुन सा कैसे

लक्ष्य आंख के बहे !

पितामह का 

सगुन साथ 

छूटा है कबका 

दिखे नहीं कोई केशव 

जो भटके को 

सही सही रास्ता दिखाए,

दिशाहीन 

हांक रहा साँसों की रेवड़ 

हचर मचर बग्घी 

इधर उधर 

फिसल रहे पहिये 

भय भीतर भर जाए,

है एकाकी मुसाफिर

और करे क्या आखिर 

प्रतिपल संग्राम सहे !

पुरखे किस पंथ गये

पदचिन्ह नहीं दिखते 

टूटकर 

जो गिरी बांह 

उसका प्रभाव नहीं 

माटी में,

हवाओं में 

अहसास होती है 

केवल खुशबू 

और भ्रमित घोड़े 

हिनहिनाते हिलक हिलक 

 घाटी में,

पिठाहीं का डेरा 

हथेली का फेरा

लगा रहा आज कहकहे !

भोलानाथ

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