गंजेड़ी न थे हम
भंगेड़ी न थे हम
पी जब से मदिरा आंख से तुम्हारे
हम भी नशेड़ी हुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
कलरव कहानी
पनघट का पानी
छलकती गगरिया अधभीगा आँचल
वैसे कसेड़ी कुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
दूर धर बहाना
सच सच बताना
याद क्या हमारी आती नहीं,
पुरवा से कहना
सीख लिया रहना
संझा गौधूलि और भाती नहीं ,
भोरे की बिरियाँ
मुडेरे की चिड़ियाँ
उड़ उड़ के गावेंअमुआँ की डारी
बैठे बंसेड़ी सुये हैं!
बस तुम नहीं हो !
बरगद के नीचे
चुप आंख मीचे
तुम्हारी पड़ताल में अकेला,
सकरी खनकाता
खुद को बहलाता
छोड़ आया पनिहारियों का मेला,
चरचीली रेख का
अंकित आलेख का
कटा फटा रटा झूठ कानों घोलते
खोलते सुमेडी मुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
सपन किये जौहर
सगुन साथ पीहर
हांक दी रेवड़ डोली में चढ़ कर,
गुब्बार धूल का
एक छोटी भूल का
रहे चुप देखते मुखडे को पढ़कर,
व्यथा पूरी पूरी
कथा जी अधूरी
धुयें की लकीरों में जल भुन भटके
कमरी कमेडी खुये हैं !
बस तुम नहीं हो !
भोलानाथ
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