Thursday, 27 May 2021

रहे देखते खड़े भौचक्के

 रहे देखते खड़े भौचक्के 

सब कुछ लूट लिया 

बाजारवाद ने 

जात कुजात का भेद न देखा !

रहल बंधी रामायण धरी रही 

पढा न जाना समझा

जन्म मरण के बीच 

आड़ी तिरछी रेखा !

मर्यादाओं के 

सारे बंधन टूटे 

रीति रिवाज के सन्दर्भों की 

भाव बोध अभिलाषा,

संस्कार के उड़ें चीथड़े 

जैसे बारात भीड़ में 

फेंक रहा हो 

कोई रंगे बताशा,

मींजैं मसलैं पाँव के नीचे 

लहक लहक कर 

भंगड़ा नांचें 

सब कुछ  करके अनदेखा !

मातृ पिता का कहा न मानैं 

धता बताकर 

आंख तरेरैं 

जैसे हों लमेठ अनगईया,

घूमैं फिरैं 

करैं मनमानी 

मचलैं पसरैं सकरे कूदें 

जस चढ़े सिकहरे बिलैया, 

गर्दन टेढ़ी जीभ निकारे 

मुह ऐंठाये 

आँख दाब के 

सेल्फी लेवें दिखावें केखा ! 

धर्म कर्म मन मंदिर 

मूरत पोथी पत्रा 

महामंत्र रामायण गीता 

अर्थ तंत्र उत्पाद गिने,

दूल्हा दुल्हन शादी ब्याह 

जनेऊ कुआरे 

शिक्षा दिक्षा 

सब कुछ 

हुआ बजारू किसने जाल बुने,

पानी पवन पशु पखेरू 

दान की बछिया 

नहीं बची 

रखता है बाजार सभी का पूरा लेखा ! 


भोलानाथ

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