लिख पढ़
खूब डूब चिंतन में गहरे
ले देख परख
कुछ पल तो जी के
समाधि क्षणों को !
कंठ परस्ती
न कोई हस्ती जनेगी
करने दे
नर्तन वनों में
इन शिव गणों को !
खाके पतझर की सूखी
बेल पत्र
कुछ दिन बे पानी के जी,
धूनी में फेंक दे
कमंडल
विष पूरा नागों का पी,
खोने दे सुध बुध
छोड़ हंसी ठट्ठा
लड़ने दे
जंग में निहत्था
सिर कटे धड़ों को !
होने दे लोट पोट
सखियों सखों को
मल भष्मी मुख पर,
छाती बांध के शिलौंटी
पगहा डार
रंगरीले सुख पर,
कुंडलियों सा जागेगी
फली भूत साधना
बांधेगी
सूत्र में शिव से बड़ों को !
हांथी दांत भीड़ का
विकल्प
नहीं होना है आज तुझे,
बैजू सा पिघला के पत्थर
फिर से
जलाना है दिये जो बुझे,
खलल खोट से
अलहदा
सहज चकरा चला कर
आकार
सही देना है कच्चे घड़ों को !
भोलानाथ
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