Thursday, 27 May 2021

पेट और जनेंद्रियों के इर्द गिर्द घूमते

 मित्रो मुझे पता है निर्बाक हो कर कहना बहुत सरल नहीं है और न ही मन से तालियाँ बजाना हम सभी तो अपनी अपनी पीठें थपथपाने में  ही सारा समय नष्ट कर रहे हैं  या की  कमेंट्स पर खुश हो कर अपनी कृतियों पर मगरूर हैं ! किसी भी प्रतिभा को पहचान देना सायद हमारे स्वाभाव में नहीं है --गिरगिट की पहुँच रेडहे तक है और उस रेडहे को सम्पूर्ण मान कर जीना अपने आप को धोका देने जैसा प्रतीत होता है ! भाटों की सभ्यता ज्यों की त्यों है केवल दरवार बदले हैं !  नसीहत देते चेहरों को जब देखता हूँ बहुत तरस आता है क्या करूँ गीत लिखने के सिवा कुछ भी तो नहीं मेरे पास बेबस हो कह देता हूँ हे मालिक अगली बार मुझे भी उज्जैनी में जगह देना जहां नट और भाट भी रत्नों की संज्ञा अर्जित करने में सफल होते हैं !


पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

शिवालय से लेकर

बीहड़ तक उतरे

सोमरस सुभीतों की

पुश्तैनी मटकी में

भर भर के ताड़ी,

काले कपालों के

भीतर का भेजा

शिकारी रंगों में

कंठों तक डूबा

अँधा अनाडी,

अँडज पखेरुओं के

चूजों की

ऊँची उड़ानें

खोखल में सिमटीं

पूंछों में बांधे

गुलामी का फीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

जगायेगा कब तक

बंजारा सूरज

सांसत में चंदा

चापलूसी के माहिर हैं

झिलमिल सितारे,

साधकों का चिंतन

संजीवनी

जाने न बकरा

सिलौंटियों में घिसे कौन

उठ कर भिनसारे,

गंगा नहाई

बैतरणी की बछिया

मवादों की धारा में

मछली सा डूबी

पगुराती

थूथुन भर लीले सुभीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !

तिलक तर्जनी लगाकर

अंगूठे दिखाते

बिदुरों को शकुनी

दूध भरी नदिया

फेक रहे पाशे,

चक्रव्यूह तोड़ते

मच्छर से मरते

अभिमन्युं

परसादी सा बांटते

कौरव अर्जित बताशे,

क्या करेंगे पीटकर

युयुत्सी

सोच के नगाड़े

झूठ मूठ कसमें

मठाधीश खाते

दाबे कखरियों में गीता !

पेट और जनेंद्रियों के

इर्द गिर्द घूमते

वर्तुली सवालों के

चिरजीवी

प्रश्न पत्र पढ़ते

समय सार बीता !

आँखों की पीड़ा

नथुनों में उतरी

आँतों की पत्थरी

घुली नहीं

बूटियों का काढ़ा

कढ़ाई से रीता !


भोलानाथ

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