Wednesday, 19 May 2021

सूरज नहीं बिरा

 काँदो काई सतह से 

सूरज नहीं बिरा
कमल गंध सुन रे !
ताक झांक तज
अब औरों की
अपने लिये घोंसला बुन रे !
होंगे मंदबुद्धि कुछ भौंरे
बंद तुम्हारी पंखुरियों में
पर तू नहीं
वफ़ा के लायक,
पौ फटते ही
साक्ष्य में स्वर्णिम किरणों के
हस्ति क्षुधा की
भेंट चढ़ेगा निश्चित नालायक,
हरि चरणों मे
जगह मिले
ऐसे कहाँ तुम्हारे गुन रे !
मछुआरे सी परख नही
फटा पुराना जाल तुम्हारा
काँख पेल
मत निर्मल नदी में फेंक,
हवा हवाई मंसूबों की
जियत मछलियाँ
खपे हुए अंगारों पर
मत भरता जैसे सेंक,
दाढ तोड़ न
लौह चने हैं
बांगर माटी चारा चुन रे !
ब्रम्ह पुतरिया है
माटी की माटी में रह
नही हैसियत तुझमें
कोई रच दे नया रचाव,
जंगल जंगल
लुमडी जैसे कूद फाँद नहीं
ऊंचे की अंगूर बेल है
खट्टे खड़े उराव,
छोड़ भजन की
सीधी सच्ची राह
रुई सा चित चिंतन मत धुन रे !

भोलानाथ

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