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Friday, 28 May 2021
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चलते चलते अजाने सफर में
चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...
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नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर रहा अनजान बाटिका दिया जलाते शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! प्राण वार अंकवार गले अब वक्ष से वक्ष नहीं मिलते ...
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जनम जनम की प्यास बुझी न कस भेजूं उस दूर दराजी प्रीतम को यह संदेशों की पाती ! हवा सुने न उड़ते पंछी गगन आच्छादित तू ही बनजा दूत रे बदर...
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जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले पूर्ण परिधि तेरी रात रांधे भात की भगौनी में फूटी परैया सा अब क्यों रमा ! छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे ...
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