Saturday, 30 April 2022

जरूरी हुआ तो

जरूरी हुआ तो 

पलट पेज देंगे 

जीवन का अपने ! 


तजुर्बों की खातिर 

छोड़ी खड़ाऊं 

खड़ी धूप तपने ! 


गिरवी में डूबी 

निगाहों के कर्जे 

मरुस्थल में चल कर 

चुकाने की कोशिश में 

पतझर के जैसे 

झरे बाल सिर के,

पछताबा नही 

बस अफसोस है 

नम आंखों का पानी 

पुतरी में सूखा 

झरा नहीं 

झरनों सा कोरों से तिर के, 


अल्फाज आये न 

ओठों में 

चुग गई गौरैया सपने ! 


इतिहास बनते जो 

चौराहे फरकों के 

किस्से 

चौपाली चर्चों के 

पर्चों का मुह बंदर 

अंदाज डारी का चूका,

अंधा समपर्ण 

मतलब परस्ती की 

चूसी चबाई 

गिलौरी की लुगदी के जैसा 

आंगन 

बरोठा है ओंठों का थूका, 


हृदयहीन आफत 

लादे पिठाहीं 

लगे पांव कपने ! 


गौर गोबर न समझे 

समर्पण 

अंतस के रंगीन अक्षत 

चौगिरदा घर के 

किरचा करसी के जैसे 

जतकत बिखरे पड़े हैं,

तिरस्कृत निगाहों की 

अनदेखी कर के 

घिस घिस चंदन पथरिया

अंगुरी अंगूठा 

लिलारे 

लगाने की जिद पर अड़े हैं, 


आहत आहूतियां 

बेआग

लगी भीतर ही खपने ! 


भोलानाथ 


चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...