Monday, 15 September 2014

bholanath ke navgeet [ अंगारों पर ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !


अंगारों पर
खून पसीना
मेहनत सूद
उजाड़ जिंदगी
सुने न अमुआं
छाँह गिलहरी !
कन्धों गिरगिट
अस्तीनों के
विषधर
अमरबेल
सेनापति सींचें
तुलसी खड़ी कचहरी !
हाँथ कंगाली
पिसवन पानी
चढ़ी
त्योरियां
सूखी ओठें
दबी बीड़ियाँ,
ढली देह
खांसी का सागर
नीम नसीहत
कान न भाये
मधु मक्खी
मरी सीढियां,
खूंटे घाँस
अकारथ
हो गई
लहटी गईया
गोलैंदा खाये
महुआ पाँल्हर ठहरी !
अंगारों पर
खून पसीना
मेहनत सूद
उजाड़ जिंदगी
सुने न अमुआं
छाँह गिलहरी !
कन्धों गिरगिट
अस्तीनों के
विषधर
अमरबेल
सेनापति सींचें
तुलसी खड़ी कचहरी !
बिगड़ी बीन
बजाये कैसे
पहचाने न
सांप
संपेरिन
भरे पिंटारा साजिस,
छोड़ हवा
सूरज सोया
जली झोपडी
राख है ठंडी
बंसवट
बांटे माचिस,
पंजों में
आकाश थाँमकर
अलख जगाती
उलटी लेटी
पिपर टहनियां
रात टिटहरी !
अंगारों पर
खून पसीना
मेहनत सूद
उजाड़ जिंदगी
सुने न अमुआं
छाँह गिलहरी !
कन्धों गिरगिट
अस्तीनों के
विषधर
अमरबेल
सेनापति सींचें
तुलसी खड़ी कचहरी !
मौन ओंठ
क्या बोलेंगे
खोलेंगे
क्या गूंगे
राज
शकुनिया पाशों के,
दुर्दशा देख
भयभीत
बहुत हैं
बाग़ बगीचे
बिछे हैं
टेशु झरे पलाशों के,
चूँगी चिलम
रमी
शिव पिंडी
प्यासे नंदी
मेघ निहारें
पतरोई में पुरी जलहरी !
अंगारों पर
खून पसीना
मेहनत सूद
उजाड़ जिंदगी
सुने न अमुआं
छाँह गिलहरी !
कन्धों गिरगिट
अस्तीनों के
विषधर
अमरबेल
सेनापति सींचें
तुलसी खड़ी कचहरी !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत

bholanath ke navgeet [ अकेले गुनगुनाऊं ]

मेरे अपने सभी मित्रों की शुभ कामनायें चाहूँगा मेरी बिटिया का आज जन्म दिन है और आज हम साथ नहीं हैं !बस उपहार स्वरुप एक नवगीत निवेदित कर रहा हूँ ! आशीर्वाद चाहूँगा !
अकेले गुनगुनाऊं
कौन गीत गाऊं
मम्मी की लोरी
पापा की थपकी
बिटिया न झपकी !
जनम दिन आया
सुबह ने बताया
फिर से
दुआओं का कुमकुम
कैसे लगाऊं मैं अबकी !
दूरी बहुत है
आँखों की पुतरी
परदेशी बिटिया
अभी अभी
पांवों में अपने
खड़ी होने की खातिर
तुलसी के चौरे
रपक कर झुकी है,
मकड़ियों के
जालों से
उलझा एकाकी
पीछे छूटी यादें
ख्यालों में अब भी
अक्षत के टीके
फुलहरी में साँसें
गंध सी रुकी है,
कलेजे के टुकरे
पतझर सा बिखरे
कैसे सहेजूँ
फरका की आंधी
गुजर गई कबकी !
अकेले गुनगुनाऊं
कौन गीत गाऊं
मम्मी की लोरी
पापा थपकी
बिटिया न झपकी !
जनम दिन आया
सुबह ने बताया
फिर से
दुआओं का कुमकुम
कैसे लगाऊं मैं अबकी !
भोलानाथ

bholanath ke navgeet [बंधियों में अपने ! ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का सामयिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
बछड़ों से झरने 
भरते चौकडियाँ 
धूप धुआँ बादल 
कामधेनु 
दिखती है घाटी,
पानी की 
बाहों में प्रणय लीन 
हरियाली 
मंडप की दुल्हन है 
चौतरफा माटी, 
केश धोये 
फूलों में 
बरखा की बूँदें 
सुन सुनकर सुह्गला 
लगी क्यों कपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
बादलों की माँदर 
बिजली के घुंघरू 
पाँवों में 
अपने 
मेनका सा बाँधूँ,
चौमासी 
छाती में 
फूटती पिपिहरी 
तडपती मछरिया सा 
हँडियों में राँधूँ,
बिरहा के 
प्रतिबिम्बी कोरस 
ठुमरी उमंगें 
ओठों में आये 
कंठों पनपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
पछुआ की बाँहों 
मचल रही केसर 
सूरज ने किरणों 
अबीरन 
अँगुलियों छुआ,
रंगीन संध्या 
भीतर बगीचों 
अमृत की सींची 
निहारे पपीहा 
स्वाति चुआ,
रंगों के 
रसिया 
अंगों जरे हैं 
आगी के अँगरा हैं 
बंसवट में खपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
भोलानाथ

bholanath ke navgeet [मत मांग दुआयें रे ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
बहुत हुआ अब 
और नहीं 
ढोना है हमको 
परम्परायें अन्धों की.
टूट फूट कर 
कांच के जैसे 
बिखर गये अब 
नहीं जरुरत कन्धों की.
घायल 
बांह से बांह 
नहीं जुडना है 
हर हाथ जुडा है 
छत्तेदार जखीरों से !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
झूम झूम कर 
मोर के जैसे 
नाच न पगले
बीच में टोपी वालों के,
पगड़ी पाँव 
पसुरियाँ टूटीं 
पीठ पिराये 
घाव हरे हैं भालों के,
जंग लगी 
मरहम की डिबियाँ 
पूंछेंगी क्या 
पेट की पीड़ा 
छलनी हुये शरीरों से !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
मौलश्री के देख न सपने 
नथुनों महक 
कौंध आँख की 
सभी बिराने हैं, 
प्रश्न चिन्ह 
प्रस्तावों पर है 
लहर आमंत्रण 
चीकन ओंठ हिराने हैं,
समाधान सब 
टेंट खोंस कर 
बाँध लिया क्यों 
खुद ही 
अपने हाथ जंजीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से !
मत मांग दुआयें रे !

भोलानाथ

bholanath ke navgeet [ paimaanon me ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर ! 
मुहब्बत की 
शेष सार संपदा 
कश्तियों में लादे
हवाओं का 
रुख भांपता हूँ 
बैठ कर किनारे,
कसक काँटों की 
जा कर 
गहराइयों में 
मंडप सी लगती है
गतिशील धारा की 
नाव क्या विचारे, 
डूबे जलपोतों पर 
छाई है 
काई की परतें 
मस्तूलों में 
अँकित नहीं 
अब कोई सिकंदर !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
चेहरे में 
लेपे उदासी 
काँपती अंजुरियों का 
गंगाजल आचमन 
उँगलियों की 
संध से बहा, 
ओंठों में 
शब्द नहीं 
समाचार भीतर के 
सांस छपे 
भंगिमायें मानती नहीं 
छाँव का कहा, 
रोबदार पगड़ी की 
सुने नहीं
रेशमी वल्गायें
निर्णय अनिर्णय की 
हिचकियों में 
नाचती छछुंदर ! 
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
बनते बिगड़ते 
संबोधनों की 
उजड़ी चौहद्दी 
फुदकती गिलहरी 
ठिठकी है कबसे 
बरगद की छईयाँ, 
नहाये निचोये से 
निथरे आकर्षण 
रेत के घरौंदों 
घिरा मैं अकेला 
भौंचक्का 
देख रही गईयाँ, 
पंख कटे बगुलों का 
खोया सन्दर्भ
नहीं लौटा 
कौन की प्रतीक्षा में 
बैठा है 
फुनगी का बन्दर !
पैमानों में 
तुली नहीं 
सैलाबी पीड़ा 
अंदाजों में 
हाँथ कैसे डालूं 
लहरों के अंदर ! 
जन्मों की 
जंग लगी 
नातेदार कमियाँ 
तलाशूँ मैं कैसे 
उफानों में है अभी 
दिल का समुन्दर !
भोलानाथ

bholanath ke navgeet [ mahak chali purwaai re ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह सामयिक श्रंगार नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
छाती चौड़ी
नदी की
हो गई
भंवर मथानी
लहर ककहरा,
हरी पहाड़ी
आँचल धोये
नागफनी घर
चौपालों
का पहरा,
पियर पपीहा
सगुन
कोयलिया
बाग
बगईचा लाई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
चौंक पूरती
दिखे बिजुरिया
चमक व्योम छू
सावन
छाती मेह,
नेह नगर के
घायल कुनवे
हांथ
पवन के
पाती भेजें गेह,
उखड़ी
सांस
पाँव की
थिरकन
कंठ राग बौराई रे !
सांझ हुई
मकरंद चुआ
मित्र
मिलन
की बेला आई रे !
भींजी चंदा
ठहरे बादल
महक
चली
पुरवाई रे !
भोलानाथ

bholanath ke navgeet [ rakhi ]

हाँथ कलाई
खोल खड़ा हूँ
कोई तो
राखी बाँधे!
तिलक लिलार
लगाकर धर दे
पावन
नातेदारी काँधे !
कहने को संबंध
बहुत हैं
चिकने मुंह की
गुलमोहर सी
रंगरीली बातें,
खाली हाथ
परव बीते हैं
बचपन की सौगात
न लौटी
बिन उराव की रातें,
ताजा टटका
जहन की यादें
रह रह बिम्ब
आँख के राँधे !
हाँथ कलाई
खोल खड़ा हूँ
कोई तो
राखी बाँधे!
तिलक लिलार
लगाकर धर दे
पावन
नातेदारी काँधे !
कहने को संबंध
भोलानाथ

[bholanath ke navgeet ] poonam ki chanda

बादल की
आगोश में
दुबकी ...
पूनम चंदा
जैसे खोखल पाँखी !
बाँध रही है
सावन बरखा
सूरज
हाँथों
हरी घास की राखी !
आया फिर
त्यौहार
खबर सा
सुबह सबेरे
नन्हीं बहना
गुडहल फूल सी
टहनी टहनी फूली,
हल्दी अक्षत
कुमकुम रोली
थाल सजाकर
सूत का बंधन
बाँध कलाई
दफन किया
सारा दुख भूली.
गंगा की
पावन जलधारा
धो धो मईल
जनम से
हुई नाअब तक खाखी !
बादल की
आगोश में
दुबकी
पूनम चंदा
जैसे खोखल पाँखी !
बाँध रही है
सावन बरखा
सूरज
हाँथों
हरी घास की राखी !
भोलानाथ

bholanath

टहनी से 
टूट बिखर 
झर जाती हैं 

पतझर सी 
फूल बनके
कितनी ही 
कलियाँ ! 
शरहद के 
फौजी से 
गुनगुनाते हैं 
फिर भी 
गीत भौंरे 
बागों की 
गलियाँ ! 
देखो महका कर 
अपने भीतर 
पनपती 
मकरन्दी 
खुशबू 
हवा में,
कश्तूरी के 
भींगे हैं 
क्या 
ताड़ी पियेंगे 
मिलाकर 
दवा में,
फिर भी खटमिट्ठा 
स्वाद नहीं बिसरा 
]धमकी सी 
लगती हैं 
इमली की फलियाँ !

भोलानाथ

bh

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत जन्माष्ठमी पर्व की पूर्व रात्रि की बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
धीरे नहीं 
मनमौजी बजाओ 
मुरलिया रसीली 
कानों से 
प्राणों में 
उतरे 
मेंहदी सी भीगे 
भीतर चुनरिया ! 
नस नस में हूके 
कोयल सी कूके 
सहगानी 
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये 
महकाये भीतर 
छलके 
इतर की गगरिया ! 
डारी 
कदम की 
चूकी 
बंदरिया सी राधा 
बांहों में आये,
गोकुल की मटकी 
मथानी 
कजरी कहरवा 
सुनाकर 
बिरहा सुनाये,
छू छू पवन 
छतियों से सरके 
अधभींगा 
आँचल 
पागल बिजुरिया
गोवर्धन में गूंजे 
रह रह 
रिझाये कारी बदरिया !
धीरे नहीं 
मनमौजी बजाओ 
मुरलिया रसीली 
कानों से 
प्राणों में 
उतरे 
मेंहदी सी भीगे 
भीतर चुनरिया ! 
नस नस में हूके 
कोयल सी कूके 
सहगानी 
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये 
महकाये भीतर 
छलके 
इतर की गगरिया ! 
गोकुल की 
धरती में 
कान धर 
थिरक रहीं 
धूप छाँव गोपियाँ,
यमुना के 
तट की 
रागिनी रसीली
रीझी हैं 
रंगीन टोपियाँ,
कंठों की 
प्रणय राग 
गीतों में 
बदली 
टूटें टहनियाँ 
काँटों की सगली 
मकरंद महके 
कुवाँरी पहरिया !
धीरे नहीं 
मनमौजी बजाओ 
मुरलिया रसीली 
कानों से 
प्राणों में 
उतरे 
मेंहदी सी भीगे 
भीतर चुनरिया ! 
नस नस में हूके 
कोयल सी कूके 
सहगानी 
घुंघरू की रुनझुन
अँखियाँ रिझाये 
महकाये भीतर 
छलके 
इतर की गगरिया !
भोलानाथ

Friday, 8 August 2014

[भोलानाथ के नवगीत] दिल तो दिल है

दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता हैकुछ दूर तक 
तुम मेरे साथ हो प्रिये 
और रिश्तों के रागी बिखरे पड़े हैं !
सहेजा समेटा 
बहुत इन हाथों से अपने 
कंधों के ढोये जिद पर अड़े हैं ! 
समझाऊं कैसे
रटाऊ तोते के जैसे
खोखल के बाहर 
गुलेलों की शातिर निगाहें
बन कर चुनौती खड़ी हैं,
बचने बचाने को इनसे 
कोई गुरुकुल नहीं है 
जुगत शेष रहने की 
अनगिन विधाएँ
जहन में जंग खाती पड़ी हैं,
तुम ही कहो 
गुर कुछ सीखें प्रिये 
अभी नरम टांठ माटी के कच्चे घड़े हैं ! 
तुलसी सुमति का संज्ञान 
रट कर 
आचरण को अपने भिगोयें
भेंट पायी पुरखों के हाथों 
छलकती गंगाजली से,
विद्रोही उमर के ज्वाला मुखी को पहिना कर सिंगौटी 
सांड़ों सा साधें 
फिर 
वाणी का अमृत ढारें गली से,
पनघट परिंदों सा चहकें
धूप छाँव 
बरखा के भींजे हम भी खड़े हैं ! 
समझौते समय से हमने किये 
रूठे न खीझे किसी से 
ख्वाहिश की 
आगी में जब तब 
उपलों के जैसे सुलगते रहे हैं, 
न जिद की माँ से 
न बाबू को चिंतित किया है
बह निकले पानी सा 
दशा दिशा तय की काट काट चट्टाने 
नदिया के माफिक बहे हैं,
हिलाई न चौखट कभी 
न तोड़े दरवाजे 
जैसे थे वैसे घुये गहरे गड़े हैं !

भोलानाथ
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
भाव है भीतर का ये
कोई चीज नहीं
जिसको चाहें दे दें,
अपने मन का
भ्रम है ऐसा
मनमाफिक हम कर लें,
इसके आगे
सब बेवस हैं
कोई नहीं है विधाता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
करता है ये
आंख से बातें
इसकी अपनी भाषा है,
कहाँ पता है
किसी को भैया
क्या इसकी परिभाश है,
प्रेम रोग का
रजा है ये
भौंरों सा मडराता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !
कौन की आंख से
निकलेगा
कौन की आंख समाएगा !
हो जायेगा
किसी का खुद ही
या और को अपना बनाएगा
सब की सही
समझता है
पर अपनी नहीं समझाता !
दिल तो दिल है
दिल और किसी को
दिया नहीं जाता !
हो जाता है
और किसी का
अहसास नहीं हो पता !

भोलानाथ
डा,राधाकृषणन स्कूल के बगल में
एन,एच-7 कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश
भारत -संपर्क-09425885234
मैहर "

Thursday, 24 July 2014

मत मांग दुआयें रे [ भोलानाथ ]



मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
मत मांग दुआयें रे
मत मांग दुआयें रे !
इन
फटी पुरानी
झोलीदार फकीरों से !   
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन
भष्मी भूत भभूती
क्या देंगे ये
घिरे हुये जो
पीटी हुई लकीरों से !  
बहुत हुआ अब
और नहीं
ढोना है हमको
परम्परायें अन्धों की.
टूट फूट कर
कांच के जैसे
बिखर गये अब
नहीं जरुरत कन्धों की.
घायल
बांह से बांह
नहीं जुडना है
हर हाथ जुडा है
छत्तेदार जखीरों से !
मत मांग दुआयें रे
मत मांग दुआयें रे !
इन
फटी पुरानी
झोलीदार फकीरों से !   
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन
भष्मी भूत भभूती
क्या देंगे ये
घिरे हुये जो
पीटी हुई लकीरों से !  
झूम झूम कर
मोर के जैसे
नाच न पगले
बीच में टोपी वालों के,
पगड़ी पाँव
पसुरियाँ टूटीं
पीठ पिराये
घाव हरे हैं भालों के,
जंग लगी
मरहम की डिबियाँ
पूंछेंगी क्या
पेट की पीड़ा
छलनी हुये शरीरों से !
मत मांग दुआयें रे
मत मांग दुआयें रे !
इन
फटी पुरानी
झोलीदार फकीरों से !   
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन
भष्मी भूत भभूती
क्या देंगे ये
घिरे हुये जो
पीटी हुई लकीरों से !  
मौलश्री के देख न सपने
नथुनों महक
कौंध आँख की
सभी बिराने हैं,
प्रश्न चिन्ह
प्रस्तावों पर है
लहर आमंत्रण
चीकन ओंठ हिराने हैं,
समाधान सब
टेंट खोंस कर
बाँध लिया क्यों
खुद ही
अपने हाथ जंजीरों से !
मत मांग दुआयें रे
मत मांग दुआयें रे !
इन
फटी पुरानी
झोलीदार फकीरों से !   
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन
भष्मी भूत भभूती
क्या देंगे ये
घिरे हुये जो
पीटी हुई लकीरों से !
मत मांग दुआयें रे !





भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...