Monday, 15 September 2014

bholanath ke navgeet [बंधियों में अपने ! ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का सामयिक नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
बछड़ों से झरने 
भरते चौकडियाँ 
धूप धुआँ बादल 
कामधेनु 
दिखती है घाटी,
पानी की 
बाहों में प्रणय लीन 
हरियाली 
मंडप की दुल्हन है 
चौतरफा माटी, 
केश धोये 
फूलों में 
बरखा की बूँदें 
सुन सुनकर सुह्गला 
लगी क्यों कपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
बादलों की माँदर 
बिजली के घुंघरू 
पाँवों में 
अपने 
मेनका सा बाँधूँ,
चौमासी 
छाती में 
फूटती पिपिहरी 
तडपती मछरिया सा 
हँडियों में राँधूँ,
बिरहा के 
प्रतिबिम्बी कोरस 
ठुमरी उमंगें 
ओठों में आये 
कंठों पनपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
पछुआ की बाँहों 
मचल रही केसर 
सूरज ने किरणों 
अबीरन 
अँगुलियों छुआ,
रंगीन संध्या 
भीतर बगीचों 
अमृत की सींची 
निहारे पपीहा 
स्वाति चुआ,
रंगों के 
रसिया 
अंगों जरे हैं 
आगी के अँगरा हैं 
बंसवट में खपने !
सावन में 
जोतदार 
खेत खोदूँ 
या बीज वृन्द रोपूँ 
बंधियों में अपने ! 
सावन है आधा 
प्राण बसी कजरी 
झूलों में 
अरझे हैं 
आँखों के सपने !
भोलानाथ

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