टहनी से
टूट बिखर
झर जाती हैं
पतझर सी
फूल बनके
कितनी ही
कलियाँ !
शरहद के
फौजी से
गुनगुनाते हैं
फिर भी
गीत भौंरे
बागों की
गलियाँ !
देखो महका कर
अपने भीतर
पनपती
मकरन्दी
खुशबू
हवा में,
कश्तूरी के
भींगे हैं
क्या
ताड़ी पियेंगे
मिलाकर
दवा में,
फिर भी खटमिट्ठा
स्वाद नहीं बिसरा
]धमकी सी
लगती हैं
इमली की फलियाँ !
भोलानाथ
टूट बिखर
झर जाती हैं
पतझर सी
फूल बनके
कितनी ही
कलियाँ !
शरहद के
फौजी से
गुनगुनाते हैं
फिर भी
गीत भौंरे
बागों की
गलियाँ !
देखो महका कर
अपने भीतर
पनपती
मकरन्दी
खुशबू
हवा में,
कश्तूरी के
भींगे हैं
क्या
ताड़ी पियेंगे
मिलाकर
दवा में,
फिर भी खटमिट्ठा
स्वाद नहीं बिसरा
]धमकी सी
लगती हैं
इमली की फलियाँ !
भोलानाथ
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