Monday, 15 September 2014

bholanath

टहनी से 
टूट बिखर 
झर जाती हैं 

पतझर सी 
फूल बनके
कितनी ही 
कलियाँ ! 
शरहद के 
फौजी से 
गुनगुनाते हैं 
फिर भी 
गीत भौंरे 
बागों की 
गलियाँ ! 
देखो महका कर 
अपने भीतर 
पनपती 
मकरन्दी 
खुशबू 
हवा में,
कश्तूरी के 
भींगे हैं 
क्या 
ताड़ी पियेंगे 
मिलाकर 
दवा में,
फिर भी खटमिट्ठा 
स्वाद नहीं बिसरा 
]धमकी सी 
लगती हैं 
इमली की फलियाँ !

भोलानाथ

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