Monday, 15 September 2014

bholanath ke navgeet [मत मांग दुआयें रे ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
बहुत हुआ अब 
और नहीं 
ढोना है हमको 
परम्परायें अन्धों की.
टूट फूट कर 
कांच के जैसे 
बिखर गये अब 
नहीं जरुरत कन्धों की.
घायल 
बांह से बांह 
नहीं जुडना है 
हर हाथ जुडा है 
छत्तेदार जखीरों से !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
झूम झूम कर 
मोर के जैसे 
नाच न पगले
बीच में टोपी वालों के,
पगड़ी पाँव 
पसुरियाँ टूटीं 
पीठ पिराये 
घाव हरे हैं भालों के,
जंग लगी 
मरहम की डिबियाँ 
पूंछेंगी क्या 
पेट की पीड़ा 
छलनी हुये शरीरों से !
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से ! 
मौलश्री के देख न सपने 
नथुनों महक 
कौंध आँख की 
सभी बिराने हैं, 
प्रश्न चिन्ह 
प्रस्तावों पर है 
लहर आमंत्रण 
चीकन ओंठ हिराने हैं,
समाधान सब 
टेंट खोंस कर 
बाँध लिया क्यों 
खुद ही 
अपने हाथ जंजीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे 
मत मांग दुआयें रे !
इन 
फटी पुरानी 
झोलीदार फकीरों से ! 
मत मांग दुआयें रे !
चन्दन बंदन 
भष्मी भूत भभूती 
क्या देंगे ये 
घिरे हुये जो 
पीटी हुई लकीरों से !
मत मांग दुआयें रे !

भोलानाथ

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