Monday, 26 August 2024

आंख है बावरी

आंख है बावरी सांस है बावरी 
आश 
कान्हा की है बावरी बावरी ! 

प्रीत है बावरी धीर है बावरी 
खोज में 
फिर रही है बावरी बावरी ! 

तुम बिन मोहन मोहती नहीं है 
मन को 
तुम्हारी खबर, 

तन मन के सूने निधि 
वन में 
ठहरती नहीं है नजर, 

भवरों की गलियों कलियों के 
वन में 
ढूंढें तुम्हें बावरी बावरी ! 

ठिकाने पते पतियां 
लौटी न 
लेके मन का संदेसा 

तेरी छवि के सिवा 
कान्हा 
आंखों दिखे न रेफ रेशा, 

घिर आई बदरिया बरसे न भीगे
सजी 
सूखी धरी देह है बावरी बावरी ! 

बेसुधी के इस वक्त  में 
प्रगटो 
जग के लिये फिर कन्हैयाँ, 

पैजनियां पहिन 
नाचो 
कालियों के फन पैयां पैयां, 

आज के कंस के विनास में 
स्वर बांसुरी के 
सुन रही है बावरी बावरी ! 

भोलानाथ 

Sunday, 11 August 2024

धानी धानी पोशाकें पहिन आया सावन

धानी धानी पोशाकें पहिन
आया
सावन
बाँहों में भर भर बदरिया !
               बेदर्दी बालम न आये !

मौके मिलन के निकले हैं कितने
कह कह जिगर
जिया
आये न मिलने संवरिया !
            सावन की रिमझिम रुलाये !

नीड़ नयन फगुआ की सोई चिरैया
रिमझिम
फुहारों की भीगी
जाग गई आज आधी रात को,

भीगा बदन आग अंतर की रह रह
देहियां जलाये
रूठा
रिसाया जिया है पिया मुलाकात को,
सुधियों की जी भर ठिठोली के
रंग में
रंगी है
ओढ़ी ओढ़ाई चुनरिया !
            पथ लखती घूंघट उठाये !

अकारथ सी लगती मोबाईल की मूवी
सखियों की
चुलबुल चुहल
धंसती कटारी सी बिरही जिया,

झरे फूल चर्चा के मकरंदी अमृत
रिसरिस के
बहता जहन में
जैसे अभी ताजा ताजा पिया,

छुअन ओंठ बिसरी नहीं
मिश्री
मावा सा वादा
काजल सी आंजी सुरतिया !
            बिछी द्वार दिल को बिछाये !
चिट्ठी नहीं खबर मैसेज़ में आई
अवकाश
मिलता नहीं
पिछले वादे वही दुहराये फिर से,

पढ़ पढ़ संदेसा बिचलित हुआ मन
सम्हाले न सम्हले
थर्राया
जैसे निकल गई घिघोरी सिर से,

बिरह बेल किसी तरह सूखे
फिर भेजूं
परदेश पाती
लिख लिख दिल की खबरिया
                समझें न जिया की बताये !

भोलानाथ 

Saturday, 10 August 2024

इस उस पार की आवाजाही

इस  उस पार की आवाजाही नई बहाली के 
दिन लौटे 
तब के पुल जिनने तोड़े  
उन बज्र प्रहारों वाले 
विकृत चेहरे उड़े जहन से जैसे उड़ी कपूर ! 

तब से अब तक टिटिरी दासन पौढे पांव रहे 
पथ के बाहर 
नाम के नाते मुंह की शेखी 
चोट अहम की 
गुफनों घाली करती रही कांच सी चकनाचूर ! 

मनकी संध दरार में बदलीं हाथी दांत सी 
रही हैंसियत द्वार के बाहर 
कहासुनी कुछ 
कान रमी न 
गंधापल्ल मवाद सी बह बह आंगन टपकी, 

बे समझी बे अर्थ अनर्गल रहे बींधते तनमन 
व्याध के जैसे 
आँख तरासे बिम्ब भविष्य के 
बेप्रसंग ही 
निगल रही है दिन की ऊंघ रात की झपकी, 

बेबाती निर्मूल लबेदा ऊंचे अटका लाग लपेटी 
नातेदारी कन्धों बोझा 
पेट 
कचैंधी 
कूद कूद के चढ़ती रही अंगेती ऊंची घनी खजूर ! 

जीवित रहने के संदर्भ बचाने में रह गये अकेले 
छूटे हाट झूठ के मेले 
भीड़ की  जिल्लत से 
अच्छा था 
तोड़ी नहीं छोड़ दी खुद बे मतलब की डोरी, 

बनता कोई नया इतिहास यदि संदेह की चींटी 
कान न घुसती 
पतली गली पकड़ के 
जुआं ख्वाब का 
धीरे धीरे बाहर आया रेंगा कान न की मुड़फोरी, 

कसी मुट्ठियों में बच रही गिलहरी सच की 
जलते सवाल सुन 
प्रतिउत्तर में 
कहा नहीं कुछ, जले न 
झुलसे कान रहे हम असमंजस की उहापोह से दूर ! 

कटे हाथ की बांह बिरानी होते देख मौन मुख 
खुद के 
शिकवे गिले पिये बहुतेरे 
किये किनारा रार बचाये 
बगलगीर सी रही जिंदगी पीर सहा न चुप्पी तोड़ी, 

गिरे दौड़ के उठे कांखते अचकन पगड़ी झारी 
फिर 
लौट दुआरे देखी बहुत बरातें 
ओंठ छुये की 
हुये न हिस्सा और न नाचे व्यौहारों की दुलदुल घोड़ी, 

तरह तरह का लेप बदलते वैद्य हकीमों से मन ऊबा 
गोली खाकर 
दर्द दबाते 
गुजर रहे दिन 
पका न फूटा वक्ष का दोमट फोड़ा बढ़ता रहा देह नासूर ! 

भोलानाथ,

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...