इस उस पार की आवाजाही नई बहाली के
दिन लौटे
तब के पुल जिनने तोड़े
उन बज्र प्रहारों वाले
विकृत चेहरे उड़े जहन से जैसे उड़ी कपूर !
तब से अब तक टिटिरी दासन पौढे पांव रहे
पथ के बाहर
नाम के नाते मुंह की शेखी
चोट अहम की
गुफनों घाली करती रही कांच सी चकनाचूर !
मनकी संध दरार में बदलीं हाथी दांत सी
रही हैंसियत द्वार के बाहर
कहासुनी कुछ
कान रमी न
गंधापल्ल मवाद सी बह बह आंगन टपकी,
बे समझी बे अर्थ अनर्गल रहे बींधते तनमन
व्याध के जैसे
आँख तरासे बिम्ब भविष्य के
बेप्रसंग ही
निगल रही है दिन की ऊंघ रात की झपकी,
बेबाती निर्मूल लबेदा ऊंचे अटका लाग लपेटी
नातेदारी कन्धों बोझा
पेट
कचैंधी
कूद कूद के चढ़ती रही अंगेती ऊंची घनी खजूर !
जीवित रहने के संदर्भ बचाने में रह गये अकेले
छूटे हाट झूठ के मेले
भीड़ की जिल्लत से
अच्छा था
तोड़ी नहीं छोड़ दी खुद बे मतलब की डोरी,
बनता कोई नया इतिहास यदि संदेह की चींटी
कान न घुसती
पतली गली पकड़ के
जुआं ख्वाब का
धीरे धीरे बाहर आया रेंगा कान न की मुड़फोरी,
कसी मुट्ठियों में बच रही गिलहरी सच की
जलते सवाल सुन
प्रतिउत्तर में
कहा नहीं कुछ, जले न
झुलसे कान रहे हम असमंजस की उहापोह से दूर !
कटे हाथ की बांह बिरानी होते देख मौन मुख
खुद के
शिकवे गिले पिये बहुतेरे
किये किनारा रार बचाये
बगलगीर सी रही जिंदगी पीर सहा न चुप्पी तोड़ी,
गिरे दौड़ के उठे कांखते अचकन पगड़ी झारी
फिर
लौट दुआरे देखी बहुत बरातें
ओंठ छुये की
हुये न हिस्सा और न नाचे व्यौहारों की दुलदुल घोड़ी,
तरह तरह का लेप बदलते वैद्य हकीमों से मन ऊबा
गोली खाकर
दर्द दबाते
गुजर रहे दिन
पका न फूटा वक्ष का दोमट फोड़ा बढ़ता रहा देह नासूर !
भोलानाथ,
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