Friday, 3 January 2025

जिया वर्ष

जिया वर्ष जा ले अंतिम आदाब ले
पूर्ण परिधि तेरी
रात रांधे भात की भगौनी में
फूटी परैया सा अब क्यों रमा !

छोड़ सहन आने दे वक्त नया जूझने दे
उसे भी हालिया हलात से
जी लिया है तुझे खूब
आबरू सी जैसे  वक्ष की दमा !

उलट फेर अंधड़ों में मींजते रहे चक्षु
फूलती रही सांस
जीने की जद्दोजहद
तोड़ती रही हाथ पांव की उंगलियां,

दर्द दही देह मन ऊबा ऊबा सिंगौटी हीन
आवारा गाय सी
मारे मारे फिरे
घास की आश में छोड़ बांडे की गलियां,

रहने दे राज मुकुट बिगड़े बरबंड का
किया धरा अंकित इतिहास हुआ
शेष सार सम्पदा
वंशधर के हाथ में लगाम सा थमा !

बिदा लेते लम्हों की बांहो से छौनों सा
छिटके उल्हने
करू बिक्ख अनुभव से लथपथ
पंजीरी खा के बे पानी खांसें,

आगत की अंजुरी में अंजीरी दोने
खुशियों भरे पर्व र्गीतों की शामें
महकती
गोधूलि रंगोली की देहरी तलाशें,

दादी के किस्से कहानी बत्तीसी
पुआली बिछौनों की
रसभीनी निदिया
परैयों के पानी में रातों का खर्रा जमा !

जगह जगह ज्योतिष के पकते पाखंड का
प्रज्ञावान आश्वासन
आंज रहा अंधों की
आखों में काजल सा  बड़े बड़े सपने,

शुभाशुभ उत्सव के तोरण तसवीर रचते
गढ़ते शिलालेख
मर खप के लिखते
जीते जहन का नववर्ष पढ़ना पारी में अपने,

फिर फिर न टूटें उलेलों में उम्मीदी पुलियां
इन उन किनारों की
बस्ती
बाशिंदों में जलती रहे विस्वास की शमा !

भोलानाथ 

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...