Sunday, 28 July 2024

पगड़ी पाग मुंडौसे धर धर

पगड़ी पाग मुंडौसे धर धर आंख लगे न 

कलथी करवट 

टोरे खटिया 

चुटकी ऐंठ चढ़ाते टूटें पकी मूंछ के बाल ! 


सावन की बरसात अँधेरी रात न सूझे 

चिंताओं की चिनगी 

रहे फंसाते 

भावावेग नदी के गहिरे डारे जाल ! 


घाट घाट सब भरी पाट के कगरे डूबे 

नाक के ऊपर चढ़ता पानी 

देख मछलियां भाव बहर से 

कूद कूद के चढ़ गईं उलटी धार, 


छप्पर टूटा चूल्हा फूटा धार धार 

बह रही गिरस्ती हीची हिम्मत 

हारी हारी हाट खड़ी है 

बोली में है पानी का व्यापार , 


रिमझिम रिमझिम रुके न बरखा 

पानी से मिल पानी बहे चौगिर्दा 

बेपरवाह 

पहाव पिठाहीं जैसे लदा हुआ बैताल ! 


बाढ़ भयावह लख लख सांस सवाई  

नाव बहे बेरास थमे न 

बुद्धि बिसाहे तेल में रपटी 

रटा पहाड़ा विस्मृत भागे भूत जहन के, 


बजरंगबाण का पाठ मन्त्र ओठों का झरना 

सांस सांस संदर्भ सुरक्षित 

बिम्बायित हैं 

आंखी अक्स पुतरियों लंका आग दहन के, 


पुरवाई ले उडी वक्ष की शांति ,सुकूनों का 

सुर्खाब समय 

रह गये चकत्ते चित के सुध बुध 

भूल भरोसा भटके मन का ख्याल ! 


भग्नाशेष किलों के शिलालेख मिट गये 

रही न शाहंशाही शेष 

परन्तु पन पंथों की बग्घी का 

रंग उड़ा न थमे लीक के चलते पहिये, 


ऋतुयें बदलीं बदले मौसम समय की 

पहुँच के बाहर 

रहीं रूढ़ियां पानी पोखर भैंस मर्म  

किस औघड़ से अंसुआ ढार के कहिये, 


तांडव नर्तन एक सा सबका कंठ हलाहल 

हंस हंस उगलें 

शीश जटाओं के 

क्षत्रप की छाया  फन काढ़े हैं व्याल ! 


भोलानाथ

Sunday, 21 July 2024

हलाकान परेशान थे पर भूखे न थे

हलाकान परेशान थे पर भूखे न थे 

तब पी पी घ्यांघ मठा महुओं के 

गुजारे दिन 

अब दिवस सांझ दो जून के भूखे हैं ! 


अभी सिथिल सौगात देह के हिलते 

पुर्जे पुर्जे 

आमद की परवाह में पचके गाल 

अमाशय आंत ओंठ रस सब सूखे हैं ! 


आमद शून्य शिखर महगाई,लटपट 

जिभ्या ओंठ चांटते पेट भरे न 

रोटी नून की भीख सी 

चाहत अलखाते दिन पर दिन निकरे, 


ढलते दिन की बाढ़ी छाया हाल न पूंछे 

सबोधन के प्रतिउत्तर में 

झुंझलाते 

संवाद समापन बिपत में छोड़ के संकरे, 


आफत के अम्बार का दुःख क्या कम था 

अनचीन्हें मेहमान सरीखा 

नया नया दुःख पा के 

बोल कंठ के कुछ कडुवे कुछ रूखे हैं! 


डगमग चाल बहकते पांव लीक पर 

बिगड़ रहा संतुलन सम्हारे कैसे 

बांह बिराती 

भीतर पाली इच्छाओं की उडी चिरैयां, 


क्या कुछ शेष रहा अधमरी देह में 

हांके हाथ न नाक की माछी 

जगह जगह से 

बारी बारी खखलें छत्तेदार बर्रैयां, 


बुझती आग अंगीठी धुआं उठे न धधके 

आगी 

बर्राते मुख गुर्राते चेहरे 

दबी आग सी हाथ लकुटियों के खूंखे हैं ! 


गंम्भीर नहीं है आंख का तारा न ही 

वक्ष की उजर तरैयां 

तारा मंडल बंध भूली हैं 

गोद पिता की महतारी का प्यार, 


उनके अपने अपने खुली आंख के 

सपने अलग अलग हैं 

बूढ़ विचार सुनें न माने 

कौड़ी लेखे घर आंगन खेला कूदा द्वार, 


टूटे पेट बंधी उम्मीदें ख़ाली ख़ाली तबा तबेला ख़ाली भात भगौने 

भीतर 

भरी आंख धर मुख गमछों के मूखे हैं ! 

Friday, 19 July 2024

थूक दिया रे थूक दिया भरी मुख पान पीक

थूक दिया रे थूक दिया भरी मुख 

पान पीक 

हक मालिकाना समझ के 

जटा जूट थूथुन से पांव भर 

                       थूक दिया रे ! 


उपर दोमंजिला खिड़की के 

पर्दे हटा के 

नीचे न देखे निहारे क्षितिज 

खोंपा मोगरी का जैसे 

                     उलूक जिया रे ! 


आंगन खड़े हो हकलाते हलक बोल 

कांपते जिगर हंफहंफाती भरी दम  

किस मुंह से कहते 

जाहिल जमाती बिगड़ैल को, 


अंधेर नगरी के द्वन्द में कौन चाहेगा

देखना सावन के अंधों के 

वक्ष पले 

भीतरी कबंध की ओंठ रची मैल को, 


अकथ कत्थ्य तथ्य के विरोध का 

आत्मघाती कहर 

स्वाति 

बरखा के जैसे जहर रोज बूँद बूँद 

                                   

                                 मूक पिया रे ! 


बीछी बर्रइयों का मन्त्र नहीं सीखा 

सहज भोर 

बांमी में हाथ कैसे डालूं 

मालुम है संवेदन फन काढ़े सांप का, 


लाठियों का खेल खले ओझल है 

आंख से संपेरा  

बेदखली आलम के बगलगीर 

गूंगों को भान नहीं मेरी अलाप का, 


ताड़ चढ़े अभय भाव  पढ़ पढ़ के 

करुण हृदय अश्रु ढार 

पूंछ रहीं 

सजल आंख किस गुरूर के लिये 

                             यह सुलूक किया रे ! 


                            

शाहंशाही का शाह नहीं तू भी 

पहरेदारी का 

कुछ मान रख  

रोज लबरी लपेटों के 

माया जाल का अंजाना भय न दिखा, 


दरबारी बैठका की धूर धौंस झार वहीं 

ओजस्वी हरु गरू गोड़ गैल रहने दे 

चलने दे 

पांव पांव खेलना और न सिखा, 


आंजी आंख खोज लेंगी सूजियां 

भूसे के 

ढेर से 

ढलने दे पहर पहर बरसाती रात 

                          मत फूंक दिया रे ! 


भोलानाथ 


Wednesday, 3 July 2024

गंध गई न मन की

गंध गई न मन की इसको धमकी 

उसको गाली 

पन्ने फाड़ 

ग्रन्थ के रहे कोसते पी पी पानी ! 


आंख खुली तो अस्त व्यस्त देखा 

चौहद्दी 

बे पानी 

मर गई चिरैया पिंजरा छोड़ निसानी ! 


वेद का भेद लबेद न जाने रहल लपेटी 

धरी पटौती अपढ़ ऋचाएं 

पकड़ा नहीं 

रश्मि का ज्योतिर्मया पुंज सी पूंछ, 


बैतरणी के घाट घाट की गहरी गाढ़ी 

धुंध के भीतर  


धार न झलके 

अंदाजों की कसी मुट्ठियां टेढ़ी मेढ़ी मूंछ, 


कनपट कान छुआ न दौड़ चला 

कौओं के पीछे

घुटनों बुद्धि 

रुके न थके थके हांफे मनमानी ! 


बढे मूंड ख़ाली हाथों का बंदोबस्त 

बस्ते में बंधक 

जाहिल जहन के घूरे 

हवा झले न सुलगे दगे न भीतर आग, 


पुरखों के पद चिन्ह पढ़े न समझे 

बाबा भीम की 

ओंठों थूंकी पींक अंजुरियों 

भर भर रागी जी भर खेलें फ़ाग, 


टुकड़े टुकड़े तोरण टूटे आंगन 

रार देहरियों की 

तकरार 

न जाने घर खोंपा की हानी ! 


बक्री शनि की छाया सिर का साथ न छोड़े 

सह सह समय थपेड़े थाप 

न बदली चाल 

चट्टानों तरुआ तन गिट्टी सा फोड़े, 


राहु केतु की दशा निराली बिचलित मन की 

गड़बड़ झाला 

पोर पचासी गिन गिन 

पंहुंचा पकड़ पांत में पांच को जोड़े, 


कुछ कुनबों की भीड़ बटोरी 

गरजे बहुत न बरसे 

सावन की 

पलटी पछुआ में जल रही जवानी ! 


भोलानाथ 

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...