Monday, 30 September 2013

भोलानाथ के नवगीत [भरी जवानी पाथर फींची]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्...........

भरी जवानी
पाथर फींची
सुबक सुबक कर मुनियाँ रोये
ठाढ़ दोपहरी
धोबिन जैसे कथरी धोये
चिंदी चिंदी
पानी भीतर
फट फट बिखरी काई !
गूलर प्रीत
ना फूली
गौदों फर गई तना टहनियाँ
जब तब झोरें
ओलिया खोंस महनियाँ,
झरे पात
आलाव फूंकती
सावन की पुरवाई !
जीवित है इतिहास
आँख की
पलक बिरौनी
बिन स्याही ही
लिखे हैं माथे
मरुथल जैसे नागफनी आलेख,
करियारी सी
कसी उदासी
परचित हाँथ
अचीन्हें चाबुक
घाव अजायब
आदम ख़बरें ढलता सूरज देख,
बीहड़ छोड़
डकैत शहर में
बैठे पहरेदार सिपाही
ध्वस्त कमानें
पथ हरण चीर मनचाही
कौरव कुवंर
ना जानें
महलों की चतुराई !
भरी जवानी
पाथर फींची
सुबक सुबक कर मुनियाँ रोये
ठाढ़ दोपहरी
धोबिन जैसे कथरी धोये
चिंदी चिंदी
पानी भीतर
फट फट बिखरी काई !
गूलर प्रीत
ना फूली
गौदों फर गई तना टहनियाँ
जब तब झोरें
ओलिया खोंस महनियाँ,
झरे पात
आलाव फूंकती
सावन की पुरवाई !
खोखल खोह की
खंदक में
अपने पद चिन्ह
उकेरा होगा
कोई सूरज
जागीर समझकर कलुषित बांहों की,
क्षितिज के
मद में
भूल गया होगा
प्रतिबिम्ब कुवांरी
मुस्कान से निकली
आग बबूला लपटें राहों की,
श्रद्धा हीन
हवन क्या जाने
मौन पितामह जन्म के झूठे
चाँद निगलने की
खातिर अब नभ से रूठे
कोढ़ चुआ
मावाद ना लीले
पानी की गहराई !
भरी जवानी
पाथर फींची
सुबक सुबक कर मुनियाँ रोये
ठाढ़ दोपहरी
धोबिन जैसे कथरी धोये
चिंदी चिंदी
पानी भीतर
फट फट बिखरी काई !
गूलर प्रीत
ना फूली
गौदों फर गई तना टहनियाँ
जब तब झोरें
ओलिया खोंस महनियाँ,
झरे पात
आलाव फूंकती
सावन की पुरवाई !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Sunday, 29 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[छंदों बंधी है]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्.....

छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
बदलते समय के
बदलते मसौदे
चन्दन के पौधे
रोपे हैं गीतों ने
तुलसी के आँगन,
चोंचों कसे हैं
कसीदे घरौंदे
सह्जादे औंधे
दिखे ना हवेली
अब चिकनी चांदन,
मुरैठों का साफा
खाली है लिफाफा
बैठक बरेदी
फैली है फरिया !
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
रंगों भरी है
रागों की दुनियाँ
गाये जो गुनियाँ
पत्थर  में
फूटेगी अमृत की धारा,
खटमिट्ठे बिम्बों का
लहरी चौंका
नेकी की नौंका
बहती रही
ले के साथ में किनारा,
गूलर की छईयाँ
लटकती कनईयाँ
गिनती हैं
लहरों सी शदियाँ !
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
अबीरी गीत
कारवां पलाशी हुआ
जबसे महुआ चुआ
साक्ष्य देते रहे हैं
नभ के सितारे,
सौगंध देकर
भगोरिया वनों की
घेंटियाँ चनों की
लय लौचियों में
गीत का विचारें,
ओंठें भिंगोये
सूत में पिरोये
शब्दों में
खोज रहे शिल्प जरिया !  
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क  – 8989139763

Tuesday, 17 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[मिले थे जहाँ आप]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह श्रंगारिक नवगीत
साहित्यिक गणेशोत्सव की पूर्व संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही
इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
न शिकवा
सिकायत
न कोई गिला है
छूकर के सांसें
लौटी हवाओं ने
हमसे कुछ ऐसा कहा है,
सावन सा
झर झर
आँखों का पानी
चाहत की
चौड़ी नदिया में
भीतर ही भीतर मीलों बहा है,
दिल से
दिल की लगी चोट
पैनी गुलेलों से भारी
सह सह
मछरिया तड़प
घाव गहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
कभी धूप
पलक भरता हूँ
मलता हूँ माथे
पसीने की बूंदें
लौटें कभी
शायद उड़ते पखेरू,
समाधि
क्षणों को
उसांसों में अपने
विसर्जित किया है
चितवन मुखर आपकी
किन पलकों में हेरुं,
यादों के
धुँधलाये
दर्पण
में झलके हैं
मौके मिलन के
किताबी ककहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
उदासी शिकन
ख्याल चेहरे में
मौसम की
आई नहीं
धुँधुआई ना समिधा
किसी भी हवन के लिये,
फागुन के अवसर
आये हैं कितने
गुलाबों के वन में
शराबी छुअन
छोड़ा शहद
नीम पी कर जिये,
नाम आये
अगर
आपकी ओंठ में
फिर अहसाह करना
मसौदे वहीं
अब भी फहरे हुये हैं !
मिले थे
जहाँ आप
अब भी वहीँ हम
ठूंठों के जैसे
बँसवट के
नीचे ठहरे हुये हैं !
आवाज
औरों की
सुनकर भी हम
अपनी
आँखों के अंधे
कानों से बहरे हुये हैं !
भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Sunday, 15 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[बुडकी मार चिरैया]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्........

भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
स्याह सुबेरे
लीपा-पोती
विगापन सी
दिन की धूप अनाडी,
सांझ सुहागन
दीपक बाती
रात नशीली
आँख पिलाये ताड़ी,
भींगा आँचल
प्यास में डूबा
दूध नहाती
पली बिलैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
ठुंकी मेख 
दरबार के भीतर
ठूंठ से
लकवा मार सयाने,
संसद में
घुस घुस के
अजगर रंग बिरंगे
छौने खूब बियाने, 
बरखा का
सच छप्पर जाने
दे रही धमकी
सावन की पुरवैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !
करिया कोट
दियाँर चौंकड़ी
वर्दी खाकी
लील रही बुनियाद,
अफसरशाही
मूस के माफिक
जेब कुतरती 
सुने नहीं फ़रियाद, 
चन्दन घिसते
शिला खियानी
सूखी नदियाँ
बढती रही चुटैया !
भाँड़र पानी
पंख समेटे
खोजे मछली
बुड़की मार चिरैया !
बादल की
बाहों में सूरज
विषकन्या सी
श्रापित हुई तलैया !

डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क  – 8989139763

भोलानाथ के नवगीत[दृगयुगी नवगीत]


मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्.....

दृगयुगी नवगीत की
अन्तर्निहित 
संचेतना से 
बेखबर 
अंधे अबोधों की कलम
खूंटे उखारे डारती !
डारकर पगहा
इसे कोई तो रोको 
आंगने 
पनपी फजीहत 
बघनखों के वार से 
अंतस विडारे डारती ! 
चुल्लुओं के दायरे में 
बिलबिलाती सूझ 
भाषाई समुन्दर 
लाँघ लेने की कसम 
मुंह में अडाये
दे रही अपनी दुहाई,
उर्जाई स्वांग के 
इस सांडिया बर्ताव को 
अच्छी तरह 
पहचान कर भी
सो रही अनुभूतियाँ क्यों 
ओढ़कर मोटी रजाई, 
कौन दे आवाज 
या पीटे किंवाड़े 
हरहजा
तुकबंदियों की भीड़ 
छंदों की कशिश 
दिल से निकारे डारती ! 
दृगयुगी नवगीत की
अन्तर्निहित 
संचेतना से 
बेखबर 
अंधे अबोधों की कलम
खूंटे उखारे डारती !
डारकर पगहा
इसे कोई तो रोको 
आंगने 
पनपी फजीहत 
बघनखों के वार से 
अंतस विडारे डारती ! 

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -09425885234

भोलानाथ के नवगीत[ नीम चढ़ी उर्दू]


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    साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

    और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्........

    नीम चढ़ी उर्दू की 
    हरी भरी 
    टहनी की 
    लौंचियों से 
    जूझ रहा रह रह के 
    महुये का तोता !
    देख पाता जो 
    हिंदी में बरगद 
    माटी में 
    कैसे फूटता 
    अंग्रेजी का 
    नरक भरा सोता !
    कोढ़ी तजवीजों ने
    हिंसक 
    इतिहास लिखा 
    अरब ओंठ 
    फारसी का जूठन 
    मदरसों में बदला 
    पत्तलों ने लीली है थाली, 
    पनघट में फोड़ा 
    हिंदी की गागर 
    कुछ दूर साथ 
    तिनके बहे हैं 
    फिर पानी 
    पदचिन्हों ने रोका 
    करती रही गैया जुगाली, 
    मरघट का उल्लू 
    मुखिया बन आया 
    हिंदी परव का 
    माइक 
    पकड़ कर 
    परदेशी भाषा में रोता ! 
    नीम चढ़ी उर्दू की 
    हरी भरी 
    टहनी की 
    लौंचियों से 
    जूझ रहा रह रह के 
    महुये का तोता !
    देख पाता जो 
    हिंदी में बरगद 
    माटी में 
    कैसे फूटता 
    अंग्रेजी का 
    नरक भरा सोता !
    टूटी हैं काठी 
    हौदे गिरे हैं 
    नकछिकनी भीतर की 
    दुबकी देशी चिरैया 
    उड़ उड़ के 
    गली खोर 
    सीख रही परदेशी बोली, 
    पंखों में बांधे 
    आकाशी सपने 
    गांधारी चिंतन 
    आँखों के पाले 
    मटमैली मेहनत 
    थैली में 
    गिरवी धर चोली, 
    मुट्ठी का अक्षत 
    हल्दी भरा है 
    इतर गंध 
    अंकित पगडण्डी 
    बिस्कुट ही मांगे 
    सोबर का पोता ! 
    नीम चढ़ी उर्दू की 
    हरी भरी 
    टहनी की 
    लौंचियों से 
    जूझ रहा रह रह के 
    महुये का तोता !
    देख पाता जो 
    हिंदी में बरगद 
    माटी में 
    कैसे फूटता 
    अंग्रेजी का 
    नरक भरा सोता !

    भोलानाथ
    डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
    अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
    जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
    संपर्क – 8989139763

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...