Sunday, 29 September 2013

भोलानाथ के नवगीत[छंदों बंधी है]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह व्यवस्था का नवगीत
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्.....

छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
बदलते समय के
बदलते मसौदे
चन्दन के पौधे
रोपे हैं गीतों ने
तुलसी के आँगन,
चोंचों कसे हैं
कसीदे घरौंदे
सह्जादे औंधे
दिखे ना हवेली
अब चिकनी चांदन,
मुरैठों का साफा
खाली है लिफाफा
बैठक बरेदी
फैली है फरिया !
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
रंगों भरी है
रागों की दुनियाँ
गाये जो गुनियाँ
पत्थर  में
फूटेगी अमृत की धारा,
खटमिट्ठे बिम्बों का
लहरी चौंका
नेकी की नौंका
बहती रही
ले के साथ में किनारा,
गूलर की छईयाँ
लटकती कनईयाँ
गिनती हैं
लहरों सी शदियाँ !
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !
अबीरी गीत
कारवां पलाशी हुआ
जबसे महुआ चुआ
साक्ष्य देते रहे हैं
नभ के सितारे,
सौगंध देकर
भगोरिया वनों की
घेंटियाँ चनों की
लय लौचियों में
गीत का विचारें,
ओंठें भिंगोये
सूत में पिरोये
शब्दों में
खोज रहे शिल्प जरिया !  
छंदों बंधी है
कंठों सधी है
बहती है अविरल
गीतों की नदिया !
कथाओं में बदले
अथर्वा भी सगले
मलवे दबी है
लय की मछरिया !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क  – 8989139763

No comments:

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...