Sunday, 11 April 2021

याद नहीं करता कोई

 याद नहीं करता कोई 

किया धरा 

फिर जाने के बाद !

रहने तक ही साथ हैं

साक्ष्य सभी 

किये गये संवाद !

प्रेम की डोर में 

झोल रहे हों

या सिरे जिये हों 

खिंचे खिंचे 

कैसे भी गीत गये हों लिखे,

अमृत वर्षा कर 

देते हों 

जीवन 

रूखे सूखे नातों को 

चला चली की बेला नहीं दिखे,

भूल भुलैया में 

खो जाते 

हंसी खुशी अवसाद !

परत वक़्त की 

धीरे धीरे ढंक लेती है

मिट्टी कर देती है 

सब कुछ दीमक

विस्मृत गंध वयार,

औपचारिकता 

खूब निभाती है 

बंधी फ़ाइल सी 

झारी पोंछी 

जन्म मरण की तारिख त्योहार,

व्याख्यानों की 

पिटी तालियां

जायें जहन को फांद !

बांस बल्लियों 

गये लहराये

जैसे हवन सुगंध के साथ 

शिवालय में 

शिवरात्रि के भगवा झंडे,

कथा विसर्जित हुई कि 

मंत्र संत्र सब भूल गये 

बांच रहे 

गाथायें अपनी 

भष्मी तिलक लगाये पंडे,

जन्म जयंति श्रधांजलि 

पर्व परिहास

जस बाबा की पाद !

भोलानाथ

Saturday, 10 April 2021

गीत के मीत

 गीत के मीत कहाँ मिलते हैं

किसे पड़ी है

रात रात भर 

लिखने पढ़ने सुनने की 

खातिर जागे कोई ! 

चार किताबें 

पढ़ लेने से 

दो दोहे सुन लेने से 

नहीं जगा करती कविता 

ओढ़ तान कर भीतर सोई ! 

अथक साधना की 

जीवित देवी है

बौद्धिक खींच तान कर

कोई मोहक तस्वीर बनाये, 

भृकुटी त्योरी 

सांस चढ़ाकर 

चौपाल चौतरा मटक मटक कर

ख्याति के खातिर गाये,

फिर भी गाहे बगाहे 

सरक सरक कर 

देह पखौरों से

गिर जाती है 

राम नाम की रंग बिरंगी लोई ! 

क्या धरा 

प्रतीकों की बस्ती में

पीठ पूछ पशु धन की 

कभी पाँव नहीं सहलाया,

खड़ी दोपहरी 

साथ हिरनिया के 

ईंटा पत्थर चूना गारा 

ले दीवार नहीं चुनवाया,

पानी पाँव नहीं बोरे 

लोरी नहीं नदी 

जस तस 

छीन झपट ली 

बड़ी मछरिया मठा दही की धोई ! 

कविताई का 

ज्ञान बांटते बहुतेरे पंडित 

धनी गीत के 

गलियों में मिल जाते हैं,

असल गीत को 

जीने वाले 

दर्द नीर सा पीने वाले 

संतों का मुख सिल जाते हैं,

उनके नाम की 

हो जाती हैं 

खेत खेत की सारी फसलें

हारे थके 

किसानों के हाथों की बोई ! 


भोलानाथ

सुबह से शाम हुई

 सुबह से शाम हुई 

इतिहास में दर्ज हुआ दिन 

सूरज हुआ छायेश !

पढ़ा नहीं फूलों ने

तितली के पखनो में 

लिखा गया संदेश ! 

नियम न तोड़ा 

नातेदारी ने

मुह में मुस्का आंख में चश्मा

रहा फ़ासला दो गज दूरी का,

इधर उधर के 

भाव हवा में 

मन का मकरंद हृदय में घोल के लौटे 

रहा न भ्रम मजबूरी का, 

चिट्टी पत्री 

मजमून लिखावट 

खरबूजे सा बदल रहे परिवेश !

चातक चितवन 

उपमान चांद के 

रंगीन परिधियों में 

मुखड़ों के रंग बदलते रहे सदा,

अपने अपने 

समय काल में 

गाने वालों ने तरह तरह के 

बिम्ब बनाये कौसल किया अदा,

अरसे से महामारी में 

उलझे हुये हैं 

उपमानों के केश !

धन्वन्तरि भी 

हुये प्रभावित 

जड़ी बूटियों के रस में 

दिखता है केवल भौरों का यशगान,

सकते में है 

पुष्प वाटिका 

खिले फूल कलियों में लिख गये 

फिर वही मसौदे अटकी है घट जान,

खटक रही है मन 

सभा की चुप्पी 

खाली उपवन माली रमा विदेश! 


भोलानाथ

लिख

 जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

उजाड़ दिया उपवन की 

लोर भरी 

सुंदर हरियाली 

कांपते रहे 

ठाढ़े ठाढ़े भय से रखवारे,

रगड़ रगड़ 

बांध खूंटे से 

साहस कर 

देख नहीं पीछे 

तमाशबीन गैरत के मारे,

भीड़ भाड़ से अलहदा 

अपनी 

अनुभूतियों से सिख !

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

किसी तरह घेर घार 

बेंड बांडे में 

पचने दे खाया पिया 

सल्तनत चारागाह नहीं,

अपने 

भविष्य को सुरक्षित कर 

पढ़ने दे 

गीता और फातिया 

कोई यहां राजा या शाह नहीं,

झरने दे चेहरे से 

जन्मों की रुआ रुआ कालिख ! 

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख !

कितनी ही 

पीढ़ियों के 

रक्तिम इतिहास का 

मजमून पढ़कर 

कसक काँटों की शेष है,

उसी ढर्रे पर 

चलता तंत्र है 

बदलाव की 

झलक नहीं दिखती 

सब कुछ पिठाहीं अशेष है,

घावों का नमक देख 

मत दे कचहरी सी तारिख !

जो भी लिखना है लिख 

छुट्टा कुदराते 

सांडो के आगे लट्ठ लिये दिख ! 


भोलानाथ

लाइक

 क्या मारा है लाइक

मन आया तो 

कर दिया कमेंट !

एक पंक्ति भी पढ़ा नहीं

बेमन 

गरपरु सा है हिलगंट !

नाम रजिस्टर में लिखवाने 

क्यों पीट रहा है

जबरन ताली,

दम होगा तो खुद मनवा लेगी 

कविता है 

नाजों की पाली,

जानबूझ 

बन समझदार

और शरारत मत कर अंटसंट !

भोलानाथ

कीर्ति

 कीर्ति की पहाडी पर 

कैसे 

चढ़ पाते हैं बौने 

ऊंचाईयों को लांघ कर 

बड़े बड़े बैनरों के साथ ! 

पकड़ कर उंगलियां 

सीखा था चलना 

जिन महापुरुषों की 

वे ही जी रहे जैसे 

झुके झुके जिये कोई अनाथ !

सोचता हूँ 

सायद विदुर के 

संकेतों का बल पा 

चूहों के बिल में 

टिकाकर मतलब की सीढ़ियां, 

छल प्रपंच वैसा ही है

बदले हैं किरदार 

रोते बिलखते 

गुजर गईं

कई कई जन्मों की  पीढियां,

अधकुचरी जमातों के 

दिशाहीन 

चेले चमटे 

शास्त्र सम्मत विधानों को 

कचर मचर रहे कंडों सा पाथ !

पर्दे के पीछे 

भरी पूरी बिरादरी 

अखाड़े में 

दंड पेल लौटती है 

आजमाने धोबी पछाड़ ,

दाव पेंच ऐसे 

बड़े बड़े सूरमाओं के 

धरे रह जाते हैं 

और 

टूट जाते हैं जगह जगह हाड़,

फिर भी दुविधाओं के 

आरती अर्चन में 

एड़ियां उठा शंख फूंकते 

अकसर 

दिख जाते हैं झुके हुये माथ !

सच के 

सूने पंथों में 

रंग उड़े खड़खडिया 

पत्तों पतरोई का  

जगह जगह घूरा अम्बार लगा है,

नहीं दिखती आग कहीं 

न उठता हुआ धुआं

माचिस की 

हर तीली में  

मौसम का दिख रहा दगा है,

दागदार 

पृष्ठभूमि पर कोई संदर्भ नहीं 

फिर भी बकसीस की 

खातिर 

खुले हुये हैं दोनों लूले हाथ ! 


भोलानाथ

Friday, 2 April 2021

दूध नहीं

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दूध नहीं हमने तो घूंट घूंट 

जहर पिया !

सांसो का क्या ठट्ठा खिल्ली 

कबाड़ जिया !

कैद कोठरी से 

झाँक झाँक देखते रहे 

महामारी में 

लाशों के काफिले, 

घर में 

घड़ियालों की फ़ौज 

और पड़ोसी के वेश में 

हमेशा अजगर के बाप मिले,

हमअपने फरके में धरते रहे 

दूध दिया !

संजीवनी की खोज में 

निकले वर्षा वनों की 

भयावह 

दलदल में क्या कहते,

बस 

तने रहे अपनी मुद्रा में 

निहारते उन्हें 

उगलती विष धारा में बहते,

गैया की खाल में हरदम 

रम्हाने का काम किया !

दिन मागा रात मागा 

घूम घूम पूरे संसार में 

मुट्ठी भर 

दाने की भीख मिली,

असला बारूद हिंसा कुरूप 

चेहरा 

भयानक बनाने की 

ख्वाहिश में चूल हिली,

रैयत की रोटी दाल ख्याल कर

नबाब मिंया !


भोलानाथ

Thursday, 1 April 2021

चुटकी भर धूप

 शेष रही जीने को 

आगन की चुटकी भर धूप 

और कहने को बोरे भर रात है ! 

सत्य साक्ष्य देगा ?

झूठी गवाही में 

एक नहीं झूठों की पूरी बारात है! 

अदालती दलीलों में न्याय नहीं

मिलते हैं निर्णय के

बिके हुये फैसले,

संज्ञान कौन लेगा 

भूसे के ढेर में राई सा

खोये हैं सपनों के हौसले,

विष पीकर अमर हुआ 

उगल गया सूत्र सार 

आदमी के हक में केवल सुकरात है !

बची खुची दौड़ धूप से 

पिघलाना है बर्फ जमी 

भ्रांतियों के ऊंचे पहाड़,

सदा सदा साथ रहे दैत्य पल

खामियों में अवसर तलासते 

चढ़े रहे ताड़,

नगरिया नगाड़ों की 

बजती रही डुगडुगी 

मुफ्त भंडारे की खाली पंरात है ! 

महंगे प्रवचनों का 

सार्थक सार नहीं निकला 

मुफ्त में समय किया जाया,

सिर चढ कर ऊंचे बोलता 

व्यय का अंक गणित

आय को फूटी आंख नहीं भाया,

टूट फूट संध झिर्रियां

क्यों झांकना

नेत नियत नाते जोड़ने की बात है ! 


भोलानाथ

जहर पिया

 दूध नहीं हमने तो घूंट घूंट 

जहर पिया !

सांसो का क्या ठट्ठा खिल्ली 

कबाड़ जिया !

कैद कोठरी से 

झाँक झाँक देखते रहे 

महामारी में 

लाशों के काफिले, 

घर में 

घड़ियालों की फ़ौज 

और पड़ोसी के वेश में 

हमेशा अजगर के बाप मिले,

हमअपने फरके में धरते रहे 

दूध दिया !

संजीवनी की खोज में 

निकले वर्षा वनों की 

भयावह 

दलदल में क्या कहते,

बस 

तने रहे अपनी मुद्रा में 

निहारते उन्हें 

उगलती विष धारा में बहते,

गैया की खाल में हरदम 

रम्हाने का काम किया !

दिन मागा रात मागा 

घूम घूम पूरे संसार में 

मुट्ठी भर 

दाने की भीख मिली,

असला बारूद हिंसा कुरूप 

चेहरा 

भयानक बनाने की 

ख्वाहिश में चूल हिली,

रैयत की रोटी दाल ख्याल कर

नबाब मिंया !


भोलानाथ

गंगा नहाकर

 गंगा नहा कर 

लौटी नहीं तुम प्रिये 

बदरंग लमहे

चादर 

बदलते रहे सेज के !

स्याही हुये न 

कलम हम हुये 

कोने कोने से

छूती रही आंख 

खाली सतह पेज के !

शिकवे गिले

गीत बुनते रहे

ढलती रही याद 

बनके गज़ल.

खोज खुश्बू की 

होती रही 

झरता रहा

फुलबगियों का छल ,

आते जाते 

रहे दिन 

रोती रहीं रात 

कहते कथा रहे

गजरे धरे मेज के !

गंगा नहा कर 

लौटी नहीं तुम प्रिये 

बदरंग लमहे

चादर 

बदलते रहे सेज के !

स्याही हुये न 

कलम हम हुये 

कोने कोने से

छूती रही आंख 

खाली सतह पेज के !

बिम्ब ताजे हैं 

अब भी

जहन में 

हमारी मुलाकात के,

शिवालय की 

सीढ़ी में बैठे 

गुजरे थे 

कितने पहर रात के, 

देता रहा हमको चन्दा 

जैसे अपनी 

अनगिन दुआएं 

किरणों नहाई 

सुगंधित हवा भेज के !

गंगा नहा कर 

लौटी नहीं तुम प्रिये 

बदरंग लमहे

चादर 

बदलते रहे सेज के !

स्याही हुये न 

कलम हम हुये 

कोने कोने से

छूती रही आंख 

खाली सतह पेज के !

खिलखिलाई थी तुम 

मुस्कराये थे हम

फूली 

सरसों के जैसे,

लगी नजर 

किसकी 

उजड़ गई बगिया

रहें पतझर में कैसे,

मुहब्बत के 

पन्नों में अंकित 

हुई जो 

छवियाँ तुम्हारी 

मिटे न मिटाये बिम्ब रंगरेज के !

गंगा नहा कर 

लौटी नहीं तुम प्रिये 

बदरंग लमहे

चादर 

बदलते रहे सेज के !

स्याही हुये न 

कलम हम हुये 

कोने कोने से

छूती रही आंख 

खाली सतह पेज के !

भोलानाथ

हटकर

 देख रहा हूँ 

ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी 

जनमानस की 

समझ से हट कर 

रोप रहे है शब्दों का लंजार ! 

रस्सी राख की 

ऐंठ देखिये 

शांत हवा है सतह की जब तक 

दूर दूर तक फैल रहा है 

क्षण क्षण उजर बजर विस्तार ! 

नेह छोह आशीष दुआ सब

किये तिरोहित

घृणा उपेक्षा अहम के 

रंग से रंगे हैं लथपथ, 

श्रोताओं के प्यार के बदले 

लिया भरम आकार

पीपल बरगद 

छाया नहीं ठहरते रथ,

शहरी घोड़े घास न जानें 

खेत मेड की

सांझ सकारे 

उत्सर्जित कर लीद लान में

पियें दूध की धार !

देख रहा हूँ 

ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी 

जनमानस की 

समझ से हट कर 

रोप रहे है शब्दों का लंजार ! 

रस्सी राख की 

ऐंठ देखिये 

शांत हवा है सतह की जब तक 

दूर दूर तक फैल रहा है 

क्षण क्षण उजर बजर विस्तार ! 

धमक धौस सम्मोहन के 

इंद्रजाल से बाहर 

काले चिट्ठे 

चौराहों पर पढ़ने होंगे, 

अंधर आस्था का अनुपालन 

छोड़ छाड़ के 

सुंदर बिम्ब प्रतीक 

शिल्प में गढने होंगे,

गहन साधना के अर्जित पल 

फलीभूत क्या होने देंगे 

सुख साधन सारा 

संबंधों का 

सधा हुआ व्यापार ! 

देख रहा हूँ 

ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी 

जनमानस की 

समझ से हट कर 

रोप रहे है शब्दों का लंजार ! 

रस्सी राख की 

ऐंठ देखिये 

शांत हवा है सतह की जब तक 

दूर दूर तक फैल रहा है 

क्षण क्षण उजर बजर विस्तार ! 

भीड़ बहुत बाजार में है 

चना चबेना 

फेंक फेंक कर कोई 

न्योत रहा बंदर के खीटे,

डार डरैये पर महुये की 

चढ़ा बरेदी झूम झूम कर 

मदहोशी में 

बेतुकी तालियां पीटे,

भैंस दुधारू के आगे 

टूट रही हैं रोज रोज 

सुरसधिया बीनें 

पागुरायित की 

बह चली मौजिया लार !

देख रहा हूँ 

ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी 

जनमानस की 

समझ से हट कर 

रोप रहे है शब्दों का लंजार ! 

रस्सी राख की 

ऐंठ देखिये 

शांत हवा है सतह की जब तक 

दूर दूर तक फैल रहा है 

क्षण क्षण उजर बजर विस्तार ! 

भोलानाथ

टप तप बरसे

 टप टप बरसे 

महुओं की रस धार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

भीगें रन वन 

बहती मंद बयार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

गंध सुवासित है 

महुये की 

नथ नथुनों खूब समाई,

लाज रखैया है 

यह सबकी 

आदिम युग से चलती आई ,

चुनगन गायें 

सुनें गिलहरी डार - भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

टप टप बरसे 

महुओं की रस धार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

भीगें रन वन 

बहती मंद बयार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

मानव दानव 

जीव जंतु की 

भूख मिटाने वाला है,

अमलतास अमराई के 

पायल 

पाँव सजाने वाला है,

ढोल बजाकर 

मीठा मीठा प्यार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

टप टप बरसे 

महुओं की रस धार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

भीगें रन वन 

बहती मंद बयार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

खेत हडौरे 

चना चबेना 

युग युग से पानी कीआड़,

कुटे पिटे 

कोये की मिठाई 

रहा हमेशा असली खांड,

वन जीवन का 

महुआ ठेकेदार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

टप टप बरसे 

महुओं की रस धार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

भीगें रन वन 

बहती मंद बयार -भट्ठी मत जइयो मेरे यार !

भोलानाथ

रंग रसिया

 रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

बहके फूल 

पलाश वनों के 

महक रही पुरवाई,

जियरा मोर सा 

छम छम नाचे

सांस भई शहनाई,

मल के गाल गुलाल लगाओ न 

पनिहार पदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

चरर मरर 

बंसवट सा भीतर 

फागुन आग लगाये,

अमलतास 

रंग चढ़ा पपिहरा

गौरैया भरमाये,

हिया जिया के हारिल गाओ न

रंग बौछार रदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

कूंच भरे महुये की 

रसिक मौज में 

है रसधार,

बून्द बून्द 

झर जाने को 

खड़ी हुई मौहार,

पाल्हर हार की लुटवाओ न

हकदार हदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो ! 


भोलानाथ

अपने रंग में

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

और रंगों से 

घिन आती है 

गंधाते हैं गटर के जैसे, 

नकुओं धरे 

रुमाल विचरते

खींस हिलायें छुट्टे पैसे,

अंधर रेवड़ी सा 

ओंठ दबाये 

पान पीक सी दाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

खिल्ली ठट्ठा खूब लिखें 

जग की खातिर

बाचें खुद की गीता,

शिखर में बोया 

कदम्ब ड़ार सा 

झूल रहा है 

साथ सुभीता,

हरी भरी 

गंगा की सींची 

तुलसी हो रही खाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

अपने रंग की 

बुद्धि बखानी खेमे खेमे 

खेल रहे जो फ़ाग,

रंग निथारा काट टहनियां 

धीरे धीरे 

तेज किया है आग,

छंद बन्द नवगीतों से 

करेंगे हम भी 

नये नये संबाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद ! 


भोलानाथ

तिकड़म

 तिकड़म अनुबंध का 

समझ नहीं आया

किया क्या 

फूँक लिया गांजा 

या भांग पिया तुमने ! 

बगुलों की भीड़ में 

टूटे न हिलकी 

रोये गौरैया

आंतों का अमृत 

निचोड़ लिया तुमने! 

गिलोय समझ सींचा था

हरी भरी 

पूरी अमराई में 

माफिया मवाली सा

काबिज है अमरबेल, 

पानी पसीने का 

मोल नहीं सूची में

पग पग प्रदक्षिणा 

कोल्हू सी काढ़ रही 

पतझर का तेल,

खबर नहीं घर की 

या 

फेंक रहा पांशे

दिखावे के दांतों के 

पीछे दाढ़ जिया तुमने!

चूक गया 

बंदर फिर डाल से 

कटी छंटी हैं टहनियां 

निश्चित है गिरना 

आंधी में बद्द से, 

विशालकाय 

बरगद का मनमौजी राजा 

चुनगुन की चोंच से 

छीन कर निवाला

गुजर गया हद्द से,

देखा है कभी क्या आंखों से

सूरज को 

रास्ता दिखाते 

मरघट की 

बुझी दिया तुमने ! 

घिनौची के 

पानी से सिची जड़ें 

नही हैं तुम्हारी  

पहचानो 

साजिश जंगली बबूल की,

मेहनत के 

वंशधर जमात को 

लगी नही हितकर 

सीढ़ी विकास की 

खैरात देकर बड़ी भूल की,

कागज के 

घोड़ों की 

काठी में काठ की 

बिल्ली बिठा कर 

रथियों का ओंठ सिया तुमने ! 


भोलानाथ

मरहम

 मूड़े का मरहम 

इस लंगड़े पाँव में लगे तो 

घाव भरे मिटे पीड़ा 

फिर कुंतल 

गीत लिखूं धरती आकाश के ! 

साजिस की 

इस गहरी खाई को 

किसी तरह पांटू तो चैन मिले

फिर सौंपू 

फागुन की भोर फूल पौधे पलाश के ! 

और किसे टेरुं 

है 

क्या कोई इस भीड़ में 

धन्वंतरि का वंशधर 

जो फाहा लेप धरे,

पता था जिन्हें 

दवा दारू का गुण धर्म 

और ठिकाना

सभी वैद्य 

शोध शाला की मौत मरे,

छपे खबर 

जो दिखावे के दौर में

साफ साफ पढ़ लूं तो चैन मिले

समय रहते 

विस्वास जगे गये दिन तलाश के ! 

सोचता हूँ खोजता हूँ 

संसय के कारक 

किन्तु  

पक्के इलाज का 

सिरा छोर नहीं मिलता,

जानता हूँ 

सूखे 

संवेदन तालाब कुआं झरने 

पानी बिन 

कोई भी फूल नहीं खिलता,

भरोसा है

बादलों की चाल पर 

जो बरसें तो चैन मिले

खोखल में लौटें फिर 

सायद सुग्गे इस आश के !

व्यवस्था 

लाचारी के हांथों 

फुटबाल नहीं बनना 

जूझना है 

स्वीकार हर चुनौती,

अपनी क्षमताओं की 

ऊर्जा सुरक्षित कर 

संभावित हित पर 

आंख धरे 

ठाढ़ी सम्मुख सरौती,

नाव मिले

कोई गंगा के किनारे 

पाप धुलें मन के तो चैन मिले

बनें बिम्ब 

आंखों में उत्सव उल्लास के ! 


भोलानाथ


चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...