देख रहा हूँ
ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी
जनमानस की
समझ से हट कर
रोप रहे है शब्दों का लंजार !
रस्सी राख की
ऐंठ देखिये
शांत हवा है सतह की जब तक
दूर दूर तक फैल रहा है
क्षण क्षण उजर बजर विस्तार !
नेह छोह आशीष दुआ सब
किये तिरोहित
घृणा उपेक्षा अहम के
रंग से रंगे हैं लथपथ,
श्रोताओं के प्यार के बदले
लिया भरम आकार
पीपल बरगद
छाया नहीं ठहरते रथ,
शहरी घोड़े घास न जानें
खेत मेड की
सांझ सकारे
उत्सर्जित कर लीद लान में
पियें दूध की धार !
देख रहा हूँ
ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी
जनमानस की
समझ से हट कर
रोप रहे है शब्दों का लंजार !
रस्सी राख की
ऐंठ देखिये
शांत हवा है सतह की जब तक
दूर दूर तक फैल रहा है
क्षण क्षण उजर बजर विस्तार !
धमक धौस सम्मोहन के
इंद्रजाल से बाहर
काले चिट्ठे
चौराहों पर पढ़ने होंगे,
अंधर आस्था का अनुपालन
छोड़ छाड़ के
सुंदर बिम्ब प्रतीक
शिल्प में गढने होंगे,
गहन साधना के अर्जित पल
फलीभूत क्या होने देंगे
सुख साधन सारा
संबंधों का
सधा हुआ व्यापार !
देख रहा हूँ
ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी
जनमानस की
समझ से हट कर
रोप रहे है शब्दों का लंजार !
रस्सी राख की
ऐंठ देखिये
शांत हवा है सतह की जब तक
दूर दूर तक फैल रहा है
क्षण क्षण उजर बजर विस्तार !
भीड़ बहुत बाजार में है
चना चबेना
फेंक फेंक कर कोई
न्योत रहा बंदर के खीटे,
डार डरैये पर महुये की
चढ़ा बरेदी झूम झूम कर
मदहोशी में
बेतुकी तालियां पीटे,
भैंस दुधारू के आगे
टूट रही हैं रोज रोज
सुरसधिया बीनें
पागुरायित की
बह चली मौजिया लार !
देख रहा हूँ
ख्याति लब्ध कुछ बड़े मनीषी
जनमानस की
समझ से हट कर
रोप रहे है शब्दों का लंजार !
रस्सी राख की
ऐंठ देखिये
शांत हवा है सतह की जब तक
दूर दूर तक फैल रहा है
क्षण क्षण उजर बजर विस्तार !
भोलानाथ