Thursday, 1 April 2021

अपने रंग में

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

और रंगों से 

घिन आती है 

गंधाते हैं गटर के जैसे, 

नकुओं धरे 

रुमाल विचरते

खींस हिलायें छुट्टे पैसे,

अंधर रेवड़ी सा 

ओंठ दबाये 

पान पीक सी दाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

खिल्ली ठट्ठा खूब लिखें 

जग की खातिर

बाचें खुद की गीता,

शिखर में बोया 

कदम्ब ड़ार सा 

झूल रहा है 

साथ सुभीता,

हरी भरी 

गंगा की सींची 

तुलसी हो रही खाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद !

अपने रंग की 

बुद्धि बखानी खेमे खेमे 

खेल रहे जो फ़ाग,

रंग निथारा काट टहनियां 

धीरे धीरे 

तेज किया है आग,

छंद बन्द नवगीतों से 

करेंगे हम भी 

नये नये संबाद !

अपने रंग में 

रंगे हये हैं 

गीतों के उस्ताद !

पूंछ परख 

पहचानते 

अपने रंग उत्पाद ! 


भोलानाथ

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