रंगरसिया रे,मनबसिया रे,
मनबसिया मितवा आओ न
उस पार नदी के तुम हो !
हम ठहरे मझधार
रंगों की धार सदी के तुम हो !
बहके फूल
पलाश वनों के
महक रही पुरवाई,
जियरा मोर सा
छम छम नाचे
सांस भई शहनाई,
मल के गाल गुलाल लगाओ न
पनिहार पदी के तुम हो !
रंगरसिया रे,मनबसिया रे,
मनबसिया मितवा आओ न
उस पार नदी के तुम हो !
हम ठहरे मझधार
रंगों की धार सदी के तुम हो !
चरर मरर
बंसवट सा भीतर
फागुन आग लगाये,
अमलतास
रंग चढ़ा पपिहरा
गौरैया भरमाये,
हिया जिया के हारिल गाओ न
रंग बौछार रदी के तुम हो !
रंगरसिया रे,मनबसिया रे,
मनबसिया मितवा आओ न
उस पार नदी के तुम हो !
हम ठहरे मझधार
रंगों की धार सदी के तुम हो !
कूंच भरे महुये की
रसिक मौज में
है रसधार,
बून्द बून्द
झर जाने को
खड़ी हुई मौहार,
पाल्हर हार की लुटवाओ न
हकदार हदी के तुम हो !
रंगरसिया रे,मनबसिया रे,
मनबसिया मितवा आओ न
उस पार नदी के तुम हो !
हम ठहरे मझधार
रंगों की धार सदी के तुम हो !
भोलानाथ
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