Thursday, 1 April 2021

रंग रसिया

 रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

बहके फूल 

पलाश वनों के 

महक रही पुरवाई,

जियरा मोर सा 

छम छम नाचे

सांस भई शहनाई,

मल के गाल गुलाल लगाओ न 

पनिहार पदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

चरर मरर 

बंसवट सा भीतर 

फागुन आग लगाये,

अमलतास 

रंग चढ़ा पपिहरा

गौरैया भरमाये,

हिया जिया के हारिल गाओ न

रंग बौछार रदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो !

कूंच भरे महुये की 

रसिक मौज में 

है रसधार,

बून्द बून्द 

झर जाने को 

खड़ी हुई मौहार,

पाल्हर हार की लुटवाओ न

हकदार हदी के तुम हो !

रंगरसिया रे,मनबसिया रे,

मनबसिया मितवा आओ न 

उस पार नदी के तुम हो !

हम ठहरे मझधार

रंगों की धार सदी के तुम हो ! 


भोलानाथ

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