Sunday, 28 November 2021

धीरे धीरे उत्तर रही मेंहदी सी

धीरे धीरे उतर रही मेंहदी सी 

मन महक
पनीली आंखों को
लांपों का
बहुत बड़ा विस्तार मिला ।

लंबी दौड़ तितिलियों की
ले भागी खुश्बू
भोगे
दर्द दरारों टूट फूट
दीवार का नातेदार किला ।

तितली का क्या
लेना देना
फूल कली पंखुरियों के
चौगिरदा चकरघिन्नयां
प्रेम अलापी गुंजन से,
रहवासी हों भले
एक फुलवारी के
मकरंद की प्यासी आंखें
फूटें
आंजत आंजत अंजन से,

हेलमेल दुस्वारी से
उजड़ा उजड़ा
मुरझाया अधमरा सा
लगता है उपवन का
रंग विरंगा फूल खिला ।

भरी नदी तालाब तराई
बैर बहाव मछलियों का
साथ साथ
पानी में रहकर
बैरी मंगरा न जाने,
भर भर मुट्ठी
चटपट चारा डार हितैषी
मछुआरे फेंकें जाल
घुमाकर
जाती नस्ल सबकी पहिचाने,

झांसों से अंजान मछलियां
बने निवाला
धोये धीवर धार रगड़ कर
खाल उतारे
पुच्छी मूंड़ हिला ।

सुख दुख हर्ष पर्व के
पावन संगम में
यदि जाति धर्म का जहर
शिलौंटी घिस घिस
घाट घाट न घोला जाता,
कई कई धाराओं का
दहिया महिया
ताल तलैया भांडर पानी
मशक कठौती
रह कर अमृत हो जाता, 

नहीं हेरते हाथी हेराया
औंचक भौंचक
कोठी कुठिला
औना गोड़ बखारी
हाथ डार दीवार बिला ।

भोलानाथ

Friday, 26 November 2021

देश जले न

देश जले न 

इसीलिये खुद

जानबूझ मुहभरा गिरा है 

हवनकुंड की आग में राजा

देश धर्म दोनों बच जायें । 


राजधर्म अभिमान रहे

जितना चाहे

धुआं उठे नभ

पेट पिठाहीं पड़ें फफोले

दाढ़ी मूछ भले जल जायें ! 


वेद विशारद अपने अपने 

विज्ञापन के रंग विरंगे 

पर्चे पोस्टर 

लिख दीवारों में 

जैसा चाहें चिपकायें,

हाथी हौदों नगर भ्रमण में 

काट गये कुत्तों को 

नाहर की संज्ञा दे 

जोग जोगड़िया 

गुर हांका के सिखलायें, 


क्या खोया क्या पाया 

हानि लाभ का जोड़ घटाना 

स्लेटों में लिख लिख 

गली मोहल्लों 

रैयत को समझायें । 


खैनी खा कर सूरज पर 

पिच्च पिच्च पिचकारी 

थूक की मार रहे जो 

गम्मत रम्मत फगुआ की 

निज मुख पर ही होना है,

रात पहर अंत्योदय के 

हुहा हुहा कर

पहचान बता दी 

रंगे सियार के किरदारों ने 

फिर चेहरे क्या धोना है,


बंद कराये क्यों कर 

गाल के बाजा 

राजा को चिंता है जन जन की 

पगडंडी के पग 

कैसे सड़कों पर लायें ! 


मील का पत्थर 

पढ़ पढ़ 

मंजिल से निश्चिंत मुसाफिर 

पहुंच पंथ के पन्नी पुट्ठे 

चुन चुन कर घूरों में फेंक रहे,

जगह जगह जलते अलाव 

घेर कर

अलग अलहदा मंतव्यों के 

जन जन जलती आग में 

हाथ उंगलियां सेंक रहे, 


घर की टूटी ठाठ कोरैयां 

पास पड़ोस से मिल कर 

पत्थरबाज 

हेडियों की हेठी का 

साहस खूब बढ़ायें । 


भोलानाथ

चिट्ठी पत्री

चिट्ठी पत्री 

डाक डाकिया पत्र तार संदेशों के
दिन रहे नहीं
समय है अब तो
मैसेज
मेल मिलन लाइव बतियाने का ।

बीते समय की
चिन्दी चिन्दी
वर्तमान का सूत सिये क्यों
कथरी गोदरी
सहज है
रेडीमेड विलास वस्तु ले आने का ।

खोंपा फेंक कंकड़ियों के
संकेतों का
आनंद निराला
रहे न कोतुहल
प्रेमालिंगन के वाजिब हिस्से,
लिखना
पढ़ना प्रेम पत्र का
बंद किताबों की
क्षेपक सी दबी चिट्ठियों के
संवेदित दिन
हो गये कहानी किस्से,

जीवन जितना सरल हुआ
भाग दौड़ का बढ़ रहा दायरा
कठिन बहुत है
मुह उमेठ
पलकें
झपकाकर घरी घरी इतराने का ।

बचत समय की
बहुत हुई
कर ली मुट्ठी में
दुनिया भर की
सारी क्रिया कलापें
जैसे चाहें वैसे भोगें,
पूंछ परख अनुनय अनुमति
हद बंदिश की
सीमायें टूटीं
बेदाग
बगुलिया रंगत बाहर
भीतर सौ सौ योगें,

उड़ती साँझ गौधूलि की
खटिया मचवा
फरका परछी परकोठों की
लुकाछिपी के
खेल उजड़ गये
शेष शहर शामियाने का ।

तारीफों के गुर गौरव
चिट्ठी के
अब अंश नहीं
मैसेज किये प्रश्नपत्र के
उत्तर नहीं
परिणामों का मेल मिले,
सुबह सुबेरे सुर्ख सुर्खियां
अखबारों की
पढ़ते पढ़ते
चाय की
चुस्की ओंठ से छूटे
कांपे हाथ गिलास हिले,

बदले युग में गारंटी वॉरंटी
नहीं किसी की
यूज थुरु का चलन
हुआ
स्वीकार सभी को

नहीं गिला गम गुठियाने का ।

भोलानाथ 

Wednesday, 24 November 2021

कब मुखर हुआ जग

 

कब मुखर हुआ जग
देख दहन दर
अंधा गूंगा
चूहों जैसा बिल में छुपा रहा ।

लुटती रही भूमि राम की
पके कान
उपदेश कृष्ण का
चौमासों की बाढ़ बहा !

मरे हुये हाथी के
टूटे हौदों से
अकबरी सल्तनत का
रक्तिम इतिहास
चुनौती देने
फिर बंदूकें तान खड़ा,
ध्वस्त
तरासी बुद्ध की प्रतिमा
बैशाली के
शिलालेख संदेश मिटाने
उन्माद बाबरी
जिद पर अपने आज अड़ा,

दो जीभ एक मुह
कब बोलेंगी
रक्तपात का आलम
जाता नहिं अब और सहा !

तोप तमंचा बारूदी बम
गोलों की गंध बराबर
नथुनों में
पीढ़ी दर पीढ़ी
साजिश
साथ सहादत बनी रही,
थमा नहीं सिलसिला
मिजाज हवाओं का
अनुरूप दशा के
दिशा बदलती
मौसम मधुमास की
रुख रेखा से ठनी रही,

मिटते बाग बगीचों की
कथा व्यथा
अनसुना किया
कोयल का दिल दर्द कहा ।

उम्मीद आश की
लौ जली जो जस तस भीतर
उठा पटक के
झंझावाती झोकों की
साजिश से लड़
सपने नयन सजाये,
चील गिद्ध के जत्थों से
लड़ मरी
जो सोन चिरैया
भरी आंख नभ
कौल उड़ानें दूध नदी के तट
का सुख हिलगाये,

पर्वत पानी लांघ यहां तक
किसी तरह हम आये
बचा रहे
मन का संकल्प गहा ।

भोलानाथ


















Sunday, 21 November 2021

ताल तलाइयां

 ताल तलइयां नदियों झरने

बगुलों की जस पट्टेदारी ! 


जीवित मछली चोंच निवाला 

झिन्ना झरनों के व्यापारी ! 


बरगद फुनगी 

चौपाल चर्चना

गहन मंत्रणाओं के माहिर 

भांप रहे 

गति लहर नदी की,

अपने अपने अड़ी अहम के 

आड़े बहमी 

भीष्म सुनें न 

चीख वेदना 

लहू लुहान सदी की, 


पोखर पानी पूर जिरह में 

महके रंग विरंगी फुलबारी । 


रातोंरात 

कुकुरमुत्तों सा 

घूरे पनप 

शाल सी सुबह सुबेरे की 

गुनगुनी धूप ओढ़ ली,

रही ठिठुरती 

माटी की परवरिश लीद सी 

राह लावारिस 

लंजार जिंदगी 

जिये कोढ़ की, 


मर्ज पुराना बढ़े दिनोंदिन

धरी घाव पर आंख शिकारी । 


माखन मिश्री दूध मलाई 

देत 

फाड़ के बुक्का 

नरियाये अघोरी 

छोर के कछनी फिरका नाचे,

बेसुरे स्वरों की 

पृष्ठभूमि में 

अर्जित 

योग युक्तियों के गुर 

द्वारे द्वारे बांचे, 


बिगुल बजाती गंजों की बारात 

न जाने नख की लाचारी ।


भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...