Friday, 26 November 2021

देश जले न

देश जले न 

इसीलिये खुद

जानबूझ मुहभरा गिरा है 

हवनकुंड की आग में राजा

देश धर्म दोनों बच जायें । 


राजधर्म अभिमान रहे

जितना चाहे

धुआं उठे नभ

पेट पिठाहीं पड़ें फफोले

दाढ़ी मूछ भले जल जायें ! 


वेद विशारद अपने अपने 

विज्ञापन के रंग विरंगे 

पर्चे पोस्टर 

लिख दीवारों में 

जैसा चाहें चिपकायें,

हाथी हौदों नगर भ्रमण में 

काट गये कुत्तों को 

नाहर की संज्ञा दे 

जोग जोगड़िया 

गुर हांका के सिखलायें, 


क्या खोया क्या पाया 

हानि लाभ का जोड़ घटाना 

स्लेटों में लिख लिख 

गली मोहल्लों 

रैयत को समझायें । 


खैनी खा कर सूरज पर 

पिच्च पिच्च पिचकारी 

थूक की मार रहे जो 

गम्मत रम्मत फगुआ की 

निज मुख पर ही होना है,

रात पहर अंत्योदय के 

हुहा हुहा कर

पहचान बता दी 

रंगे सियार के किरदारों ने 

फिर चेहरे क्या धोना है,


बंद कराये क्यों कर 

गाल के बाजा 

राजा को चिंता है जन जन की 

पगडंडी के पग 

कैसे सड़कों पर लायें ! 


मील का पत्थर 

पढ़ पढ़ 

मंजिल से निश्चिंत मुसाफिर 

पहुंच पंथ के पन्नी पुट्ठे 

चुन चुन कर घूरों में फेंक रहे,

जगह जगह जलते अलाव 

घेर कर

अलग अलहदा मंतव्यों के 

जन जन जलती आग में 

हाथ उंगलियां सेंक रहे, 


घर की टूटी ठाठ कोरैयां 

पास पड़ोस से मिल कर 

पत्थरबाज 

हेडियों की हेठी का 

साहस खूब बढ़ायें । 


भोलानाथ

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