Friday, 31 May 2024

क्षुद्र क्षीण बेमन सी मिलती

क्षुद्र क्षीण बेमन सी मिलती धाराओं के 

संगम संगम
मेंढकमुखी
सबब के सुने गूंजते चौमासी गुंतारे !

ऊंची उठती लहर डुबोये ताल तलैयों
सागर सागर
पुलियों की क्या अवकात
हिमालय खड़ा अगाडी मुकुट उतारे !

खन खन खोद खेत के ठूंठी ठूंठे बोये बीज
कसौटी कस कस
सच की सपथ गवाह में
रैयत भर भर बोरे गाह रही अफवाह,

दलगत गति की उबी ढुलमुली भरम को
पवन पल्टियों के ढब से अब
फुरसत कहां
सुने जो जन की शाहंशाही की केवल परवाह,

झूठ गवाही लंबित प्रकरण के अनुमानित
गुण दोष दलीलों के
घूरे घुस
सच्चाई का सिरा खोज कर कौन निकारे !

राजा सनकी प्रजा पतोहू परचित पुतलों का
जगजाना दरबार
पिये पूरा मदिरालय
जहन खुमारी ओंठ डकार न आने दे,

चिखना चीखन मुख का घूंट घूंट हिलगंट 
गले की
बुद्धि के बूते बेल पचाने के
उपक्रम का कोढ़ी  कोढ़ न बाहर आने दे,

जिल्लत जिये सीखचों का विस्मय
अनुदान के जैसे
मिली रिहाई
सांठ गांठ की गांठी गांठी गांठ सम्हारे !

नाक कटे की जिल्ल्त कैसी ढीठ टपोरी
अंतरा क्वातरा
खोरी खोरी कटी कलम
उल्हन सी कट कट बढ़ती ढाई बीता रोज,

अचरज आंख जहन भौचक्का
मंत्री मंत्री चोर
न टूटी ओंठ ओंठ की चुप्पी
डाकू सूबेदार बताती रही पुलसिया खोज,

ठहरे रह कर अपनी सीमाओं में
सगले
बख्तरबंद सिपाही
व्यापारी व्यौहार में आंख का सपना हारे !

भोलानाथ

Wednesday, 22 May 2024

मुँह गुरतुर दिल जहर हितैषी

मुँह गुरतुर दिल जहर हितैषी 

अखरे जैसे 

अंगुरी अंगुरी नख के नीचे 

रह रह चुभती फांस !


उलहन उलहन आँख आँसती 

धुंआ रसोई भात भगौना 

भांप  

सांप सी छाती लोटे सांस !


जरन बरन की लपट हवा मिल 

सेंक सेंक कर 

कान के परदे 

जहन में आग लगाये,


हाथ सेंकती भीड़ 

भितरिया जतन जायका 

भेद अलहदा 

मुहदेखी की मुँह बतियाये,


खाली पेट बेदाँत मोलाते 

भेड बकरियों जैसे  

कूते कुटिल कसाई 

जीवित देह का मांस !


चर्चाओं के रंगे बताशे 

कान 

राग बगदरी 

ओंठ के मंजे मंदारी हैं,


सरस्वती पुत्र गणपति के 

साधक 

गरु गुरु जी हरु बोल 

आवर्ती गायन दोधारी हैं,


मौनमुखी सुन देख समझ 

खरभरी  मचा न 

पुआल के भीतर 

अकबकी के आलम धीरे धीरे खांस !


इस उस डार कूद न 

भर किचकार दांत की  

बंदर जैसे 

दूर रहें नटखट उत्पाती,


सत्यम शिवम सुंदरम 

अलख जगायें

जियें जिलायें छोड़ ठगी       

अलखायें न ठकुर सुहाती,


महमह महक उठे पुरवाई 

शरद सूचना देत 

थकें  न हारें 

रन बन फूलें धानी धरती कांस !


भोलानाथ

मधुमासी देह के

मधुमासी देह के 

मचले मन के
भाव ओंठ में
धर अपने तुम
मन के भेद न खोलो !

पढ़ लेता हूँ
जिगर तुम्हारा 
सुन लेता हूँ
आंखों की
केवल आंख से बोलो !

छत की छांव
सहोदर
कानों सुनी दिवारों की
आंत पचे न पानी पाथर
पनघट आग लगाये,

अक्स आंख में अभी अधूरा
पनपे पूरा
कमल सा खिलके
भीतर भीतर
भौंरा मन की गाये,

बनते और बिगड़ते
मौसम का
रुख भांप हवा की
पुरबा पछुआ
चलती नब्ज टटोलो !

कच्चे अनुभव का पक्का
कौतूहल
साझा करते
अपनों के आगे
सांस थमे न स्वर हकलाये,

कर सको जो साबित
कितनी कितनी
आग की नदियों
जल भुन जिये मरे तब
तेरह तीन से बाहर आये,

लैला की
किरदार नहीं तुम
राधारानी का रंग
धीरे धीरे
हृदय में घोलो !

अनुरागी मन के अनुराग का
सहज समर्पण
मान मिले तो
मिल जाने दो
जैसे दूध में पानी,

विज्ञापन सा
लिख देना
उन बंद किताबों की
फटी पुरानी जिल्दों ऊपर
अपनी प्रेम कहानी,

चलन के बाहर
गाल बजाती
फुटकर की जिद
बाहर बजने दो
खींसा नहीं थथोलो !

भोलानाथ

व्यूह परिधि के हाहाकारी

व्यूह  परिधि  के हाहाकारी 

साक्ष्य के  अक्स 
आँख  किस  आँख  को  दे  दे  |

जुमलेबाज शिविर का 
है  क्या  कोई  धनुर्धर 
चील  चीख  सुन  लक्ष्य  जो  भेदे |

किरदार  द्रोण  के  बने  रहे  वे 
थके  न  हारे
पिछलग्गू  जन 
झुक  झुक शीश  नवाते ,

कुओं  के  बाहर  क्षितिज  देख
ऊँचे 
सिर वाले 
ऊँचे  रहे  सदा  टखने  मिजवाते,

भेंट  मिली दुदकार फतोहीं 
देह  ढके  या 
ऊब  उबासी  कन्धों  रे  दे |


उखड़ी नाभि  की  करकस  पीड़ा 
नस  नस  चिलके
ऐंठे  पेट 
न  छूटे  हाथ  का  लोटा,

मींज मसल  पिड़री की  मालिश
वैद्य हकीमी
विफल 
बिराये  खूंटी  टंगा लंगोटा,

गोबर  गुदड़ी 
पुआल  पला सच 
बिलों  में  पलते चूहे सांप रगेदे |

पग  पग  पर्वत  जैसे 
अवरोध हटाते
झरा  पसीना 
समय सार जीवन का  बीता,

भूले  बिसरे  शिलान्यास पढ़ 
चरणबद्ध  पग 
काट  रहा  है 
लोकार्पण  का  फीता,

सूरजमुखी  बिहान  चांदनी 
रात तरैयां 
जुगनू  जैसे  क्षितिज  के  गेदे |

    भोलानाथ  

सिकुड़ी देह दांत बिन

गुंजन गीत परागी नद में 

बूड़ बसंत सिराने करने लगे फसाद !

बूढी काया हाड पासुरियाँ
भर सकोगे क्या फिर यौवन का उन्माद !

सिकुड़ी देह दांत बिन
स्वाद चटोरी जीभ बिसर
पकवान देख
मुँह मुस्का खींच चढ़ाये ,

पुष्प धनुष सर सधे न साधे
लक्ष्य रूप आकार
विविधि सन्दर्भ सार के
रोचक पाठ पढ़ाये ,

बीते जीवन की सडी गठरिया
बड़ बोझ बुद्धि के प्रस्तावित संवाद !

कामकंदला के पग घुंघरू
लय  की थिरकन लहर सांस की  
साध सके तो साध
माधवानल जैसा संगीत ,

ठूंठ हुए बरगद का पता
पूंछ न मिटें महल
महके पुरवाई धुले कोर न काजल जैसे
अमर आँख की प्रीत,

जाया समय फिरे न लौटे
रिसरिस चुये छपरिया जैसे छाती का अवसाद !

भोलानाथ 

चौकीदारी कर या पहरेदारी में

चौकीदारी कर या पहरेदारी में 

विश्वास खपा दे
जाहिल जहन तरन्नुम वाले
स्वर्णिम सीढ़ी रूम रपक कर तोड़ेंगे !

बेअदब की धारा बहे पहाव सा
बहते बहते
हूर बहत्तर के ख्यालों में
बम बारूद देह भर चौखट चौखट फोड़ेंगे !

दूर देश की रणभेरी सुन गांव मोहल्लों 
गोल बना के पल्लम पल्लों
पांवों की रफ्तार बदल
अरदली अवाजें भांज रहीं तलबार,

मत कर जाया समय  घिनौनी चाल
चरित बुनियाद बनें फांसी का फंदा
चेत चौंतरे काट तिलिस्मी
तारों वाले झिलमिल जालों का अम्बार ,

चौराहों की जिन्नाती तकरार के अगुआ
जुम्मे की बारात के
बड़बोले मुख
घोड़ बछेड़ा छोड़ गधी के कान  मरोड़ेंगे !

विश्वासी सदगति सबकी सहयोग सहोदर
मंत्रोत्चारी गीता ग्राहय नहीं जिनको
वे जहन जिहादी
न तब थे न अब हैं वतन विकास के राही,

ब्याध न जाने पीर तीर की कनपट खींच
कमान प्रत्यंचा
बेंधे बिहंग उड़ान उंच न उड़ने दे
कठघरे खड़ा इतिहास जिरह की झूठ गबाही,

निर्वसन प्रपंची पांव ठठा ठोंकी ठुठियों सी
ठगे गांव के गांव
सिकहरे
धरी दुहनियां  निमुआं दूध निचोड़ेंगे !

दउसाख मुख त्याग तबाही तमस पाल न
उजड़ी शाहंशाही की बतकही
समय के साथ नहीं
जिद जंजालों की सुर्योदय तक और भटकने दे,

सत्य सनातन शंख सीप के कुछ छिटके छूटे
बिखरे मोती गहराई के
चुन चुन लड़ियों हार हृदय
संसार की दौलत गिद्ध की आंख खटकने दे,


दिशाहीन बिदके बहकाये अश्वरथी थक हार
अलीक होड़ की
खींच लगामें
टूटे टेक धुड़ों के फटेहाल रथ मोड़ेंगे !

भोला

धुआं धुआं बिगड़े

धुआं धुआं बिगड़े हालातों के बादल 

हटें तो
देखें
घटे कद सूरज क्षितिज के
धर धर के आंखों में आवर्धी शीशा !

ओठों की फुरकी हवाओं में उड़ती
चोरी की दौलत
छुपाई कहां है
फतोहीं के
बाहर या भीतर पखौरों के खींसा !

आवामी ओटों की पोती सफेदी
चेहरे की खातिर
खुलते खुलासों के
आवर्ती झांसों के
कनफोरू जुमलों के झूठे झमेले,

स्वांगी बयानों की युग्मी हवायें रह रह
दिखायें
आदमकद आईने की
छपकी गौरैया
बिम्बित प्रतिबिम्ब खुद का चोंच से उकेले,


रोजगार रोटी का हल्ला अनुदानी गल्ला
पेट में पचा के
आग प्रजनन की 
उन्नति
उराव सबला अदहन के अदरक सा कीसा !

सरोकार साधन व्यवहार हीन शिक्षा
देशाटन की भिक्षा सी
राजा रंक दाता
विधाता न माने
पहचाने केवल कन्धों की रेई अधारी,

धरा धनु बरगद की खोखल लक्ष्य भेद
भूल धनुषधारी
तालियों की ताल में
नपुंषक सा थिरके
पांव बंधी पायल सी बजती लाचारी,

भीतरी भड़ास की अड़बड़ अड़ास की 
समझाईस उलटी पड़ी
कान में अंगुरी डारे
शरणागती
सब गाते रहे मिलजुल के चलीसा !

ऊंचे पहाड़ की प्रदक्षिणा में पांव पांव
फिरते ऊंट की
चुनौतियों का असर बसर
दिखता नहीं
लौट आता है रोज रोज हारा थका छांव में,

तथ्य तकरार के निष्पादन का साक्ष्य नहीं
फिर भी
होड़ में है होड़ के लिये
नफरत के बाजार में
मिली न दुकानें मुहब्बत की, गांव में,

कंगीखानों का लाभार्थी लामबंद
कागजों की कोंख में
हष्ट पुष्ट
पल रहा है
चौरों चढ़ा के  रोटियों का हींसा !

भोलानाथ 

जले भुने मोहरे

जले भुने मोहरे मुखौटों का   

मोहक मुखारविंद
अफवाही
मजमों की मनचाही ओंठ में टिका !

सुनता हूँ जगह जगह मन आई
मन की
भांखते मसौदों में 
देश पूरा परचुनियाँ नून सा बिका !

क्रेता की खबर नहीं उड़ती हवाओं में
अख़बार सी
छपती हैं
रोज नई चटकीली सुर्खियां,

लैया लाटा चना सा भुना सांच
आंच की गवाही में
आजादी
खादी की लील रही कुर्सियां,

मंदबुद्धि बौनों की भीड़ लिख रही है
वक्ष पर
बेकाबू
भालों के आचरण की रफ्तारी भूमिका !

दरम्यानी दरारें दिखें न दिखें
पैबंदी थकती नहीं
हाट 
बाजार बेचेगी गुल प्यार के,

मति मारी रियाया बेसाहेगी श्वांगमुखी
सपने
मधुमासी अमराई
फुलबगिया घर की उजार के,

घिसा चंदन पथरियों का लीपा
लिलारे
चर्चित हवाओं की चर्चा में
चर्चित है खबर सी अनामिका !

तुलसी तासीर के अनुभवियों ने
दिया बार मबरी के नीचे
विनय
स्तुतियां तुलसी की गाने लगे,

गौ सेवा के बहाने मुर्गी पालक सभी
हींग की
गोली गाड़र को
गुड़ में मिला के खिलाने लगे,

नद नदियां रहें न रहें प्यास
उनकी बुझे
चाहे सूखे जले
महमहाती हमारे हृदय की वाटिका !

भोलानाथ 

सुनता हूँ जगह जग

 जले भुने मोहरे मुखौटों का   

मोहक मुखारविंद
अफवाही
मजमों की मनचाही ओंठ में टिका !

सुनता हूँ जगह जगह मन आई
मन की
भांखते मसौदों में 
देश पूरा परचुनियाँ नून सा बिका !

क्रेता की खबर नहीं उड़ती हवाओं में
अख़बार सी
छपती हैं
रोज नई चटकीली सुर्खियां,

लैया लाटा चना सा भुना सांच
आंच की गवाही में
आजादी
खादी की लील रही कुर्सियां,

मंदबुद्धि बौनों की भीड़ लिख रही है
वक्ष पर
बेकाबू
भालों के आचरण की रफ्तारी भूमिका !

दरम्यानी दरारें दिखें न दिखें
पैबंदी थकती नहीं
हाट 
बाजार बेचेगी गुल प्यार के,

मति मारी रियाया बेसाहेगी श्वांगमुखी
सपने
मधुमासी अमराई
फुलबगिया घर की उजार के,

घिसा चंदन पथरियों का लीपा
लिलारे
चर्चित हवाओं की चर्चा में
चर्चित है खबर सी अनामिका !

तुलसी तासीर के अनुभवियों ने
दिया बार मबरी के नीचे
विनय
स्तुतियां तुलसी की गाने लगे,

गौ सेवा के बहाने मुर्गी पालक सभी
हींग की
गोली गाड़र को
गुड़ में मिला के खिलाने लगे,

नद नदियां रहें न रहें प्यास
उनकी बुझे
चाहे सूखे जले
महमहाती हमारे हृदय की वाटिका !

भोलानाथ




आवर्तित आरोप अधूरे

आवर्तित आरोप अधूरे अरझी आधी सांस 

उधार अधारी
पीड़ित कंधों
कांख बंटी न रहे बदलते बारी बारी !71

ओंठ अलख अलखा के बेअदब अर्थ की
नासमझी खैराती बक्कुर का
प्रण सुन सुन 
हने हुमक के हाथों पांव कुल्हारी !71

बेसुरे बिगुल के लय साधक साध रहे
टेढ़े मेढ़े आंगन में 
रीछ नाच के
ठुमकों ठुमकों टूटे घुंघरू के स्वर,70

भटके भाव पलों के खीटे उर उझरीटी
बेल की खींची कलथी
घायल घेंटी
निधड़क नीछें बेच बाजार हया डर,70

भरे पेट नंगदांव हेडियों कान मरोड़ी
उत्साही उत्पात
पड़ा मूड़े माथे 
जस चुंदी चढ़ी चुड़ैलों की किलकारी !71

सांकेतिक शब्दों की हृदय हिलोरी राग रागिनी
जहन जीभ से गायब
ओंठ अड़ी
अपमान ककहरा रट लिया जतन से,70

सन्निपात पथ पांव रुके न हठ जिया
जिया भर
पानी पांव प्रच्छाल छुआ न
कथरी ओढ़ भृकुटियां टेढ़ी रहीं वतन से,70

मुद्दे मूड गठरियों गांठी खोल गिनाते
जैसे भारत गढ़ा इन्होने
नभ धरती की
गतिविधियां हैं इनकी रचनाकारी !71

बदले मौसम की इस तेज धूप की चमक में
कान उटेरे
जख्मी जज्बात सुनें न
अंधियारों से जिन्नातों की बोली,71

बिखरे बिपरीत दिशाओं के थक हारे
मनभाव क्षणों  के
खुले चक्षु टकटकी दृष्टियां
धीरे धीरे उत्तरायण की हो ली, 71

आंख में आंखें डार टटोली नब्ज रोग पहचान
पथरियों
चंदन जैसी
घिसी बूटियां तब तन मन की घटी बिमारी ! 

भोलानाथ 

टेढ़ी भौंह टेढ़ टेढ़ गया

टेढ़ी भौंह टेढ़ टेढ़ गया समय साल 

महुआ सा कूट के
क्या करते 
गली गांव फरका से रूठ के !

स्यासा का घूर लगा अटा आंगन में
धूर धुआं
हार थक
हांफती गिलहरी खोखल में ठूंठ के !

मनभावन अवसर का शव लादे
कन्धों में
सूर्यरथी लीकों की धूल में
उम्मीद ओढ़ी दरी सी बिछायी,

आत्म रक्षा की कोशिश मेहराब की
छिन्न भिन्न धूप सी
अस्मिता का
युद्ध हार सांझ ढले हाशियों में आयी,

परिधि व्यास वृत्त के आवर्ती फेरे
दिनचर्या चाल की
चली चाल
पांव नहीं दिखते हैं झूठ के !


आगत के स्वागत सत्कार की
पुलकावलि
बिगड़े मौसम की झंझवाती
सांझ की संझवाती द्वार धर रही,

शुभकामनाओं की सुरभित सुवासित
उत्साह अर्चन के पुष्प पत्र
अक्षत सा
भीतर की मुंह बोली प्रीत झर रही,

कसालों के कांटे चुभे पांव
चल के
आंचर की झोरी चुने
बेर पर वर्क से लेप हैं जूठ के !

बेजर दुरुस्त है हाजमा खट्टा मीठा करु
सब पेट में
पचा के
जी लेते हैं डांगर सा ढांचा गला के,

ठोकरों के आदी मिन्नतों के घूर नहीं
खरभराते खर्रा में
लेटे हैं
वक्ष की अंगीठियां जला के,

भिन्न भिन्न तुर्रे तब्दीलियों के तेवर
आपदा के
वक्त में
ठाढ़े मरे जैसे मारे हों मूठ के !


भोलानाथ 

जाफरी के परदे खिसका के

जाफरी के परदे खिसका के 

चढ़ते दिन
सोने का
स्वांग छोड़ बाहर आ होड़ के !

राममय नेपथ्य की नकार नहीं
धारण कर
वक्ष में
हिकारत की हेय हिया छोड़ के !

उधर उधर निकर गई फ़ांस की
आखरी कनी
रबा रबा स्मृतियां आंस की
जहन जिगर से खखार के निकार,

शदियों की त्रासदी से उबरे उराव की
धूम में
झरने दे सावन सी
मनभावन उत्सव की बाबरी बहार,

खंड खंड धर्मी उन्माद को
आने दे
वृत्त में
बे मेलों के छोर सिरे जोड़ के !

आसुरी अवसाद अंटी बड़ी बड़ी काली
परछाईयाँ
रौंद रगड़ लौट आये
राम फिर विराजमान तख़्त पर,

अताताईयों का वंश मिटा शेष अंस
हारा है रगड़ रगड़ एड़ियां
जोर नहीं
शरणागत चिन्हित है वक़्त पर,

विधान विमुख बाज को दिखे नहीं
बनी बिगड़ी
लीक में 
छाप चिन्ह वनवासी गोड़ के !

पुण्य के इस यज्ञ में आहूत नहीं
जिनकी आहुतियां
उतारे जा रहे
बाल की खाल बारी बारी बे थके,

ओढ़े लिबास के भीतरी विलास का
बनावटी विलाप
सुनते सुनते
रमधुनियाँ कनपरदे कान कान के पके,

एड़ियों की गोखरू निकाल दिया
समय सुई की
पैनी नोक ने
जड़ गहरी कोड़ कोड़ के !

भोलानाथ 

गुणीजन को जाने दे

गुणीजन को जाने दे सरपट सड़क पर 

धुंधली रजत रेख सी 
लीक पर
हन्ना गुन्ना बे मंजिल चला चल अकेला !

मोलाने दे उनको उनकी सफलता
कूता करें चाहे
तौलें तराजू
काम का नहीं तेरे बाजार मेला !

उदघोष नव प्रभात के प्रारंभिक क्षणों की
चित चेतस गति
साध छंदों के मुखड़े
अनुरूप लय के उन्नयनी स्वर दे,

उजड़े उपवन उजाडों के ठूँठे सुनें न सुनें
भीतर फुदकती
कोयल की कूकी
अहसास मधुमासी अमराई धर दे,

छटने लगे नभ कापासी बादल
चढ़ने लगी धूप
फिर धीरे धीरे
खुश्बू की अंगड़ाइयों में है बेला !

बताशा बहस की बर्तुल तमाशा सी
झरती हताशा का
हिस्सा नहीं तू
फकीरी अलख में अनुभूतियाँ जनहेतु कह ,

रत्नों की ख्वाहिस में मथने दे सागर उन्हें
भूल मत
तू भी आदमी है
आदमीयत की रग रग में रक्त सा बह,

भगीरथ प्रयासों की सूखे हलक
या 
पसीना बहे देह का
जैसे सावन के पानी में पानी का रेला !

गुथ गुथ चंदोबा सजाने दे कलगी
उगाने दे
अंजुरी में राई उन्हें
रहने दे चर्चा में चढ़ती चिलम का धुआं,

सुख दुःख दिवस मास मर खप के जी पूरा
रेतीले वन में
भटकने दे प्यास को
प्यासी ओठों में भर के प्यासा कुआं,

जन्मों की पिटी पीठ सहला के हाथ से
उजागर कर
छूंछे पेट की
बे रोटी तवा छूंछ दाल का तबेला !

भोलानाथ

राखी भरी कलाई काम न आई

राखी भरी कलाई काम न आई 

कर्तव्य पथों पर
लीद उठाते
खप रहे भोजपाल के शाह !

हवन किये अंगुरी जली
धुआं धुआं आकाश
शाहंशाही
गई हाथ से अमरबेल की राह !

छीना झपटी द्वन्द में हारे ताज सितारे
खुले मूंड में
ओलों की बरसात
हवा में पाग पैंतरे लत्ते लत्ते,

अपराधों की पोल न खोले
चढ़ते दिन की छांव
बेड़ियां पांव में डारे
पतझर का ऐलान हंसें सुन पत्ते पत्ते,

विस्थापित पग पगड़ी पीर पचे न
पेट के भीतर
रह रह पनपे
जहन जिया में जले सौतिया डाह !

उज्जैनी की भूली बिसरी राख की
आग दगे न
सुलगे वक्ष रुके न खांसी
मींजे मसले चुभे रेत सी आंख,

रिस्तों का रस पिया जिया मन
फबे नहिं
फतवों के पीसे जतवों का
मनभावन चूरण सरके गठरी कांख,

बरगद की जड़ समझ के पकडे रहे
जकड़ के जिनको
उनने ही
खाई खौंदी केसर बोई बाह !

समझ सल्तनत के आडम्बर
भेद भाव की स्वर्ण जंजीरो में
जकड़ रियाया
मन की खोट न बाहर आने दे,

भूल भुलैयां ब्यूह बधे अभिमन्यु जैसे
राष्ट्रभक्ति
निर्भीक लीक
संघर्ष चेतना की लयराग न गाने दे,

प्रभताई की गंध गली से नाक दबा के
निकले जत्थे
लखा न पूछा
न ही चिन्हित किया गुनाह !
भोलानाथ 

सीधी सड़क अजीब मुखौटा

सीधी सड़क अजीब मुखौटा 

चलता उलटे पांव !

ताल ठोक न भाग यहां से
यह मुर्दों का गांव !

हिले डुले न देह बे पानी
पुतरी नचती आंख
नब्ज दिल
धक धक धड़के
बाण बिंधे से प्राण कल्हारे,

थके हाथ डुगडुगी बजाते
करवट कलथी
चेत दिखे न
टिटरी मार कुहनियां
मुड़ी मुड़ी न पांव पसारे,

लाघव लोच अबोध राग के
औंधे परे निधांव !

मुन्नाहट बगदरी कान की
झरे न झारे आयत आन
जहन के भीतर
अधपक
खिचड़ी दगे न चूल्हे आग,

पुलिया पांव पहुँच के बाहर
धूमिल धूमिल धुंध ढोंग कुछ
पढ़ा न जाये
लिखा
लिलारे कोल्हू पेरा भाग,

आग बरसता सिर का सूरज
पावों लिपटी छांव !

बांधव बंधुल पीठ के भाई
बंधे बांह से
गुपचुप 
जहर उगलते
बखिया फारें घुसे घुसे अस्तीन,


जय विजय पराजय ओढ़ मरे न
हिंसक रहे जनम भर
जबराजोर
अडी में
फटी वक्ष की दरियादिली जमीन,

कांईठ करु हरु किल्लत में
कांखे गांव गिरांव !

भोलानाथ

न तुम कुछ कहो न हम

न तुम कुछ कहो न हम कुछ कहें 

बस देखते रहें
मौन बौरों सा
गली खोर उंच उंच होड़ नंगदांव की !

न बदली कभी न बदलने की उम्मीद है
धीरे धीरे
वसूल रही
धूप कराधान सी शीतलता छांव की !

ऊबी में सूरज सोचे न अपने ढलान की
अमावस के
रोशन दिये
फूंक ढिबरी सा गुड़ खांड गोबर किया,

जुमलों के जाहिर पिटारे के सपने
युवावों की
आखों में आंजे
बुजुर्गों की पूंजी  घी सा पिया,

आशीषे हृदय हांथ गुड़ खाते चेले से
पूंछे
फेंकी खड़ाऊं
कहां किन कोरैयों में पांव की !

गारंटी गायन की वारंटी रही न  
फिर लौटी
जुमलों की बारिस
पेट बांधे युवा बाढ़ बूढ़े बहेंगे,

जिद में है राजमुकुट मरते की
फिकर नहीं  चिंता है
मन मुसेस
बाराती बारात की और कितना कहेंगे,

दावे बहुत हैं दया के दयनीय
बाखें पसलियां
चिन्दी चिन्दी
चड्डियों में घायल है लय गांव की !

पौ पूरी फटी नहीं झलरी हवाओं में
बेलगाम घोड़े 
सूर्यरथ जुआ के
दुआधारी उड़ते बछेड़े,

राजसी रवायत के गिरगिट
बरगद की छांव छोड़
गालों में
दाबे कबीरी ओठों ओछरते बखेड़े,

दंडवत की मुद्रा में  पीड़ा मरोड़ की,
बूटी वैद्य
फिरें नहीं
रोजमर्रा सी आदत है आंव की !

भोलानाथ 

गांव गली चौबारों का फागुन

गांव गली चौबारों का फागुन 

मेरे हिस्से का जी भर
तुम भी जी लेना
अधगादर खेत लहरती बाली सी !

वेद समझ इस चित्र का मुखड़ा
रोज पढूंगा जीवन भर
तिल तिल प्यार का
द्वार खोलती गाल की तिल काली सी !

उपवन भर की महक गुलाबी
मक्के मड़वे की रसभरी सांस
फुलझड़ी दिवाली
पूस फ़ूस खरभरी बिताई रातें,

करना याद गुलाल मले गालों की
उड़ती हवा अबीर
रंगीले आंचर
चुये प्रसंग बिरौनी आंख की बातें,

चुन्नी चुन्नट चूहों का जनमास है
जब से
छप्पर छोड़ गई है हज को
जानी पहचानी वक्ष बिलैया पाली सी !

दोहनी दूध निचोई फेन भरी सी
देह दिखाई आदिम पर्व की
वन्दनवारी
छोड़ सलीका कूद चढ़ी घिरघोरी,

समय सगुन हल्दी अक्षत आंगन
छत विक्षत सुदिन साख
पंचांग की आयत पढ़ पढ़
टूटी कच्चे सूत की पक्की डोरी,

चौके चौरे चर्चाओं के मुख चर्चित
चढ़े पमारे
घूर उघन्नी
ऊंघरी आंखें ओंठ जड़ी ताली सी !

दाढ़ी मूंछ वक्ष के पके बाल की 
नरम शाल
बेरंग रही जो ह्रदय के भीतर
थाती जैसे धरी तुम्हारे नाम,

दग्ध पलाशों के जंगल में भरी अंजुरिया
गुलाल उछाल हवा में
अलबिदा कहूंगा
धुंधरुक धुंधरुक शाम,

केंद्र में कविता के तुम रही सदा
गाया गीत परिधियों का
खुद सुना नहीं
लय लगी सदा ख़ाली ख़ाली सी !

भोलानाथ 

शेष बाढ़ बूड़े के

शेष बाढ़ बूड़े के मुड़थपिया दलदल से उबरे 

साहसी पताके
डोर कटी
बहती पतंग सा परनाली धार में बहे !

आसरों के आसरे में जानबूझ उतरे
अबूझी लहर की बहर में
सुनते हैं
धार कटे तिनकों के काले कहकहे !

बाहरी गुरेर के फेर फिरे वक्त की
छूटती अंगुरियों के पोर पोर
आखिरी
छुअन का अहसास अंकित है वक्ष में,

परचित सा परहेज माथे से माटी की दूरी
अधूरी तिलक का
गौरव बिमुख
जिया डारे जिये खूब गंधाते कक्ष में,

भटकती रही अक्ल ऊसर में
घायल उलूक सी
ख्वाहिशों के पिंजरे में
झूले सुबह शाम तोतिया रटन राग रटते रहे !

आहत अहेरियों की मधुमाखी
संचित शहद
और कितना परोसेगी
गली कूच आवारा कूकुर बिलैयों के आगे ,

जली भुनी मुन्नाती चुचुआते छत्तों में 
लौटेगी कब तक बिवसता
रस की निचोई
आगी धुआं धुंध रह के न जागे,

सहते जुलुम बहुत बीता समय
गुंजाइस नहीं अब जिरह की
पेंचों के बाहर
परपंची बाड़ों में खुल के हित की कहे !

उड़ती चटाई विलासी खटोलों में उड़ते 
सिलबट्टे
निखालिस मलाई
मसालों के झांसों में हल्दी सा कूटें,

घिस घिस के बूटी बिसरी न
दादी की घूंटी पिलाई
नानी के कजरौठे का काजल
केशर तिलक पानी धोये न छूटें,

बाजारू बखत की बोली बिके न
लुटे ठाढ़े ठाढ़े
उछलती रही पगड़ी इन उनके हांथों
कल्पे कुपित मन कलुष के सहे !
भोलानाथ 

चिल्ला चौंथी मत कर

चिल्ला चौंथी मत कर खोंस पटौती 

जंग लगी पुस्तैनी रांपी
खींच और न
आग झुलसती सोये जहन की खाल !66

हिम्मत कहां किसी में रोके कोई
दिन दिन बढ़ती बेरोजगारी
जनसंख्या
विस्फोट पिठाहीं लदा हुआ बैताल !67

घोड़ गधा मन मतान्तरी के हाथ हथौड़े
फोड़ भीड़ न
किरचा किरचा कांच के जैसे
प्रेम पंथ पग त्याग मरोड़ न बांहें,74

नूरा कुश्ती खेल का कोलाहल चल रहा
निरंतर ,चक्रबृद्धि के मकड़जाल की
फेरा फेरी
लुटी रवायत लांघन भरी निगाहें,74

पेट नाभि की गूढी गूढी पापड़ बेले
भूख रसोई
छप्पनभोग के पीढ़ा आसन
पंगत बैठे भिन्न भिन्न घड़ियाल !67

पन्ने पलट देख न रपट लिखाई
मृगछलना सी छले धूप में
लीक लीक का भौदा
भूँजे नीक सूख के चीकन चांदन पांव,74

खपरैलों की खबर लिखें न आंधी पानी
जले खेत खलिहान
आंसुओं का
शैलाब थिराना बूड़ा बाढ़ में डूबा गांव,74

जनम जनम के मथे समुंदर की लहरों में
तितर बितर चुटकी भर
डाल के दाना
राजा फेंके मछली वाला जाल !67

बिजली गुल है झल पंखा झल
देख न सपने खुली आंख के
बंदर बांट विचारों वाली
पगड़ी पाग में राज मुकुट नहीं सजना है,76

चिल्हर वाला समय रहा न इमली वाली शाम
फागुन फ़ाग मुड़ौसों धरके
पिये भांग
दिन रात ढोलकिया राग मजीरे सा बजना है,76

मुंह फूंके आकाश उड़ा न चेहरे चिपकी
धूल हटाते हाथ थके न
टूट टूट कर
झरे बिरौनी अधपक अधपक बाल ! 67

भोलानाथ 

चिलकी पीर अधीर गिरानी

चिलकी पीर अधीर गिरानी कुछ बदली 

कुछ फेर समय का
चढ़े खजूरी खास
और अब चुभता नहीं आंख का पांव में कांटा !

चरती खेत मेड़ भय खाती बाड़ सलामत
रकर चौकडियां
भरे कुलाचें
बैठ भैंस पगुराती खोज में चारा के है नाटा !

बादर बूँद हवा बैहर की जतकत कौंध
बिजुरिया
मिटे धूर में पूर
धरती लोटन पाग पगड़ियां बंधी हैं मूड़े मूड़े,

बेखौप नचें न काठ पुतरियाँ अंगुरी के उकसाये
बे भय
ख़ुशी बेटियां
चहकें रनबन बांध के साहस गजरा जैसे जूड़े,

गरम खून के बहके पांव बचाव कथन के
बिम्बित खोट

मुखौटों धारी 
बीते वक्त के गालों पर है वर्तमान का च्यांटा !

नून लकड़ियों जली गकड़ियों बे छत छप्पर जसतस हुआ गुजरा
शक़्कर खाँड़ मिली न
और मिली न पांत पतरियों गुड़ की भेली,

गिला किया न ठौर बेठौरे रोये,कोल्हू पेरी
तेल धार के
चोर उचक्कों की
मुड़फोरी का उकताया लाठी भांजे तेली,

खिंची लकीरों बंधी डोर की गांठ खोलते
भेद किया न झुका झुकाया
सम्मुख का
संवाद समय पर देहरी द्वार न बांटा !

आरोपों की झड़ी में बूड़ा बहा न भीगा
फ़टे नहीं बकवास के बादल
पवन पटीली पीठ
हिलक हल्दी सी घाव में आई ,

अंधभक्त कहलाने वाली सौम्य रियाया 
धीर वीर सी जगह जगह से घायल
आजादी की
बांह पकड़ कर सिंहासन तक लाई,

चोरों की बारात के बाजे मौसेरों की
राग
फ़ाग सी दुलदुल नाचे
दूल्हे की पड़ताल झांपियों में है लाग लपाटा !

भोलानाथ 

तम्बू तारन तान तमूरा

तम्बू तारन तान तमूरा सारंगी पर झूम 

कूद कचर न झोपड़ झुग्गी
ऊंची ऊंची मलखमियों की
उंच अटारी ऊंचे झंडे नहीं जेब जागीर !

फ़ैल पसर न चौका चौरे लात लथेड़ी मुड़भेली में आसमान नहीं बंटने वाला
पत्थर मार लबेदी
ललकारो से क्षितिज सितारे तोड़ सके न वीर !

दूर की कौड़ी का सुख स्वांग भुनाने वाले
अलख फकीरी के
किरदार मुखौटों चुपरी
झरे अबीरन किरचा किरचा लीपा पोती,

निश्छल हृदय जहर पी पेट मरोड़ की पीर
पचा पहिचाने बिच्छु ब्याल डटइयाँ
बाड़े भीतर
घूम रहे जो गिरगिट लील के  मोती,

बंदरमुखी मुख लोक लुभावन ओंठ की चुपड़ी बात बलैयों
बतकही हवा की गाल गिलौरी
पान चबाती
दिशाधुन्ध में फैली पसरी पाखंडी तासीर !

छू मंतर सा समय हाथ का बे प्रज्ञप्ति
उड़ गया न लौटे खोंपा मोगरी छोड़
बसेरा
बुनते बुनते डार डार की मरी चिरैयां,

ऋतुओं ऋतुओं धूल नहाती पता न पूंछा
बहते जल का
झंझावाती बसर की
हिलकी गाते गाते आँखों भरीं तरैयां,

घाट घाट की दानाडारी पुण्यकमाई
हांथ उंगलियां बांध बांध के
मुट्ठी घुमके हुमक हुमक के
हने पेट में धंसा करेजा आश्वासन का तीर !

नीर नयन भर शेष सम्पदा मुख मोहर
गिरवी धर मोल बिसाही
गुमनाम गुलामी
हुकुम की ड्योढ़ी हिलता मूंड उठी न आंखें,

हां में हां की मौनमुखी फरियादी सूची
पढ़े सुने न देखे सुस्त व्यवस्था
पिचका पेट
घिनौची प्यास घैल सी कलथी बांखें,

सुबह शाम सैलाब सड़क का जन सम्बोधन
स्वयं प्रभा की अजमाईस के अगुआ
लांघ लकीरें फिरें पकाते
ख्वाब की खिचड़ी हंडियों हंडियों खीर !

भोलानाथ 

डटे रहे लीक से

डटे रहे लीक से हटे नहीं तितिर बितिर उपले उबेलों की 

तपते घमेलों की छू छू सतह
कौन लौहपथी गिट्टियां हटाता !

विलासिता की दौर से किसे पड़ी
जूझे जो गांव की हड़ौर से  
बूंद बूंद विथा व्याध
कान कान गाते तो और मजा आता!

बरसाती बाढ़ का उफनते आषाढ़ का
पूस के कंपकपाते हाड़ का
जीते जो जेठ की प्यास का
समुंदर सुरक कर फिर कहते ओंठ की ,

बड़बड़ की हड़बड़ कथन में छूटी कहन
पूरी पूरी
मूंडे उठाती चिलक भूल जाती है
थूका खखारा पीक पुरीआंगन बरोठ की,

फीकी फीकी चमक मुख बांहें चढ़ाये
मुंह के धनी
शाम धमकाने सूरज को
दौड़े चले आते हैं ओढ़ ओढ़ बरसाती छाता!

करतूत कुरुओं की पईलों की खा के
भांते रहे ढेरा
चरखे की आमद खुसामद गिना के
पकाते रहे खिचड़ी चांदी की हंडियां ,

धुंधली नियत धुंध सरकी धजी न
बामी समाई रेरी की फेरी अहेरी
अखाड़ों की  लोटी
लठैती पटीले लकीरें बजा के नगड़ियां,

उड़ती खबर खोंपा मोगरी का कौआ
उड़ उड़ के आंगन अहाता
अपनी जुबानी
सन्देश मईका का अम्मा के कानों सुनाता !

वंशधर पतिंगों की पोंदीपैया में जूझे
जखीरों को
फुरसत नहीं जो उंचा निहारे
आकाशगंगा की बोई झिलमिल तरैयां,

मौनी शहर के मुखरित हुनर को उंचे शिखर की हिलती हिलाती सतह से
बांधो न बंधु और
काम की नहीं हैं यज्ञोपवीती गिरैयां,

अच्छा होता हिकारत हटा कर हृदय से तस्वीर प्रातिभ जनों की
जलसा जुलूसों का दर्पण
क्षेपक सफा की सुरतियां दिखाता !

भोलानाथ 

खाई खुदरी

 खाई खुदरी समय की खंडित उमर कर्ज सी 

जो चुक गई 

जूठन सी छोड़ी बची थोड़ी थोड़ी 

हथेली हाथ ख़ाली खींसों न आई ! 


उम्मीदी झांसों दिलासों की ऊबी उबासी 

लुहर भट्ठियों की  

लाल लाल लौह सी  

कुटती रही ठाढ़ी ठाढ़ी ठंडी निहाई ! 


आधा अधूरा पहिचाने चीन्हे आकार को  

पहचान देने की मन में पाली प्रतिज्ञा 

होम हवन  

गंधमादन फुलहरा के नीचे पारण सी टूटी, 


ओहदे बदलते बदली हैं हूंकियां गरू देह पाढ़ें 

चढ़ चढ़ के पिडरी पसुरियों 

हचर मचर 

मचवे की कलथी करौटों की कांखन न छूटी, 


धुआं धुंध आंखों की धुंधरुक में अपनों के दावे दबी 

दाढ़ चाबे चनों सा 

गुटकती गुड़ घी की चुपरी खुद की परछाईं ! 


पंख आते उड़े अंश लौटे नहीं, खुद कांपती अंजुरियों का भार नहीं उठता,

घरुये का तीन तीन तिनका 

किस लिये और अब नया द्वार खोलें, 


मुमकिन नहीं लौट आना फिर से समय का 

आकाशी घेरे के नीचे 

गेंद सा लुढ़कते रवि को 

सोखी नदी का कैसे पानी उगलने को बोलें, 


ढर्रे बे ढर्रे हाथी निकल गये अरझी हैं पूछें 

हौदों के 

हिचकोले खाती 

बसर की उघन्नी टेंटों की खोंसी छुपाई  ! 


आगे कुआं पीछे खाई पुरी न पक पक झरे 

तन के बाल सारे 

बढ़ते नखों की सिहरन मिटी न 

झरा नूर चेहरे का उड़ा रंग तन फीका फीका, 


बेचैन पिंजरे का पंक्षी गिनता रहा दिन रोजदिना 

तोड़े बहुत पंख पिंजरे से लड़ लड़ 

अधूरी रही 

मन की, बिल्ली के भागों टूटा न सींका,, 


उड़ने के सपने आंखों से हारा बिराता रहा 

खुद 

खोखल का मायावी चिंतन 

सांसें थमी न थमी मन से मन की लड़ाई !


भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...