मधुमासी देह के
मचले मन केभाव ओंठ में
धर अपने तुम
मन के भेद न खोलो !
पढ़ लेता हूँ
जिगर तुम्हारा
सुन लेता हूँ
आंखों की
केवल आंख से बोलो !
छत की छांव
सहोदर
कानों सुनी दिवारों की
आंत पचे न पानी पाथर
पनघट आग लगाये,
अक्स आंख में अभी अधूरा
पनपे पूरा
कमल सा खिलके
भीतर भीतर
भौंरा मन की गाये,
बनते और बिगड़ते
मौसम का
रुख भांप हवा की
पुरबा पछुआ
चलती नब्ज टटोलो !
कच्चे अनुभव का पक्का
कौतूहल
साझा करते
अपनों के आगे
सांस थमे न स्वर हकलाये,
कर सको जो साबित
कितनी कितनी
आग की नदियों
जल भुन जिये मरे तब
तेरह तीन से बाहर आये,
लैला की
किरदार नहीं तुम
राधारानी का रंग
धीरे धीरे
हृदय में घोलो !
अनुरागी मन के अनुराग का
सहज समर्पण
मान मिले तो
मिल जाने दो
जैसे दूध में पानी,
विज्ञापन सा
लिख देना
उन बंद किताबों की
फटी पुरानी जिल्दों ऊपर
अपनी प्रेम कहानी,
चलन के बाहर
गाल बजाती
फुटकर की जिद
बाहर बजने दो
खींसा नहीं थथोलो !
भोलानाथ
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