क्षुद्र क्षीण बेमन सी मिलती धाराओं के
संगम संगममेंढकमुखी
सबब के सुने गूंजते चौमासी गुंतारे !
ऊंची उठती लहर डुबोये ताल तलैयों
सागर सागर
पुलियों की क्या अवकात
हिमालय खड़ा अगाडी मुकुट उतारे !
खन खन खोद खेत के ठूंठी ठूंठे बोये बीज
कसौटी कस कस
सच की सपथ गवाह में
रैयत भर भर बोरे गाह रही अफवाह,
दलगत गति की उबी ढुलमुली भरम को
पवन पल्टियों के ढब से अब
फुरसत कहां
सुने जो जन की शाहंशाही की केवल परवाह,
झूठ गवाही लंबित प्रकरण के अनुमानित
गुण दोष दलीलों के
घूरे घुस
सच्चाई का सिरा खोज कर कौन निकारे !
राजा सनकी प्रजा पतोहू परचित पुतलों का
जगजाना दरबार
पिये पूरा मदिरालय
जहन खुमारी ओंठ डकार न आने दे,
चिखना चीखन मुख का घूंट घूंट हिलगंट
गले की
बुद्धि के बूते बेल पचाने के
उपक्रम का कोढ़ी कोढ़ न बाहर आने दे,
जिल्लत जिये सीखचों का विस्मय
अनुदान के जैसे
मिली रिहाई
सांठ गांठ की गांठी गांठी गांठ सम्हारे !
नाक कटे की जिल्ल्त कैसी ढीठ टपोरी
अंतरा क्वातरा
खोरी खोरी कटी कलम
उल्हन सी कट कट बढ़ती ढाई बीता रोज,
अचरज आंख जहन भौचक्का
मंत्री मंत्री चोर
न टूटी ओंठ ओंठ की चुप्पी
डाकू सूबेदार बताती रही पुलसिया खोज,
ठहरे रह कर अपनी सीमाओं में
सगले
बख्तरबंद सिपाही
व्यापारी व्यौहार में आंख का सपना हारे !
भोलानाथ
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