Friday, 27 March 2026

बांध दिया रे बांध दिया घंटी

 बांध दिया रे बांध दिया घंटी 
ठाढ़ी है 
भौंचक मुंडेर की बिलैया ! 

साहस नहीं देख दुःसाहस 
मूंस की 
उबाल में है गांव की तलैया ! 

भंडाभेर गुलमछरियों के 
द्वंद में 
दहिया महिया है 
भंड़री तलैया का पानी, 

बिलबिलाती गहरे में सहमी 
मछलियां 
लिखने लगीं  
घाट की भूली बिसरी कहानी, 

रांध लिया रे रांध  लिया 
दाल 
दिया देख सीझी परैया ! 

बार बार प्रस्तुत प्रस्तावों की 
विफल 
चर्चनाओं के  
कोरम  रहे आधे आधे, 

कह वक्त तू ही अपने इरादे 
परे 
कल्पना के 
रहे लक्ष्य कैसे पुस्तों के साधे, 

उन्माद जिया रे उन्माद
जिया  
थिरक रहे ठाठ के नचैया ! 

कृत्यों कुकृत्यों का त्याग कर 
हज को जाये 
न जाये 
छोंड़ छप्पर की यह पहरेदारी, 

रुकनी नहीं है कुतरती रहेगी 
जड़ें आस्था की 
गोबर 
गणेशों की मूसक सवारी, 

जिहाद हिया रे जिहाद 
हिया 
जिये  देह दंश उड़ती बर्रैया  ! 

भोलानाथ

नहीं हुये स्वीकार

 नहीं हुये स्वीकार समूचा शहर 
रहा अनजान
बाटिका दिया जलाते 
शाख उलूक ऐंठ मुख रहा बिराता ! 

प्राण वार अंकवार गले अब 
वक्ष से वक्ष नहीं मिलते 
शहद ओंठ 
झरनों सा है मसखरी का नाता ! 

अपनी हांक गिराने वाले साख 
और की टिके न धरती पांव 
उड़े 
अनजान हवा में टूटे तृण के लेखे, 

शब्द खेल की प्रभुताई का अंधा 
गुरूर गिर गया रपट के  
फिर भी पासे 
उलट पलट के चली चाल के देखे, 

ब्रम्हवंश के मोह में फेंके ब्रम्हफाँस के 
बंधन में 
टिड्डे सा 
हर प्रातिभ तड़प तड़प मर जाता ! 

घुड़दौड़ में अब्बल भले ही हों हम 
खच्चर का संबोधन पा कर 
गली के 
कांटों जैसा हरदम गये हटाये, 

जोर बटोरी मुंहजोरी की धन्नासेठी 
चोरी चोरी इस उसकी 
गा कर 
सोहरत अपनी जन जन शहर रटाये, 

कान पटे उपदेशों का सारा निचोड़ 
निमुआं रस जैसा 
दूध 
नदी के मुहाने बूंद बूंद टपकाता  ! 

सौंदर्यबोध की मुख्य धुरी से बंधे 
प्राण 
मदहोश भ्रमर सा 
गिनते गांठें रमे रहे कुचबंधों की, 

रत्ती भर युगबोध जिया न जिनने 
उनकी 
उंगली ही उठती है 
पीर न जानें दोहरी पीठ पके कंधों की, 

बौरे नहीं भरी भीतर मक्कारी 
हर हर गंगे का 
केवल जयकारा 
रपट परे मन मोक्षदायिनी गाता !
भोलानाथ

चाक़ू चाबुक भाई चारा

 चाक़ू चाबुक भाई चारा बटे कटे की
सच्ची सच्ची सीख  
समझ न आई 
जिगर जिया में पलती रही बिमारी ! 

उपयुक्त नहीं अब मरहम का उपचार 
वैद्य जी 
काढ़ा मिश्रित दिव्य रसायन 
भर भर घोंटा घोंघा डारो सारी! 

विषम विषाक्त जहन से निकले 
पिघले सायद 
धीरे धीरे पाप परत की 
पीड़ा दायक परी हृदय की गांठ, 

दशकों का यह मर्ज पुराना 
अँकबार भरे है 
तन मन जैसे 
दूध दही का सींका बंधा पुरानी ठाठ, 

बौनी कूद कुलांचों की कोंची 
हर कोशिश 
देहरी द्वार पटौती आले 
विष बुझी बूटियां घिस घिस हारी ! 

दांत तोड़ती मुक्कों जैसीआह 
हलक की 
सुई चुभन सी बिधी कलेजा 
दया धर्म निर्पेक्ष आड़ सब छोड़, 

कदमताल ड्योढ़ी का भभ्भड़ 
विस्फोटक बर्ताव के 
बहते घाव का  गुल्ल्क 
खुद के बूते ठाढ़े ठाढ़े फोड़ , 

गुलुर गुलुर बतकही के मोहक मर्मी 
मुस्कानों के जाल फेंक न 
भींच 
मुट्ठियां तोड़ किवाड़े भय के भारी ! 

धुरी बंधे हैं माह प्रहर दिन 
रोग विथा के 
चुटकी चूरन उपयुक्त नहीं 
गहन शोध के विषय वस्तु हैं ये, 

बांस चढ़े नट जैसा केवल 
पात्र नहीं करतब के 
उस्ताज तपी 
तन हंता मन क्रम वचन तथास्तु हैं ये, 

हूरों वाली जन्नत के तलबगार 
बह रहे 
तिलिस्मी सुर्रा में 
जानें कैसे तालीमों की नातेदारी  ! 

भोलानाथ

खैर ख़्वाह ख्वाब किये

 बिदा होते वर्ष  का अनुभव और आते नये वर्ष पर कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं !

खैर ख़्वाह ख्वाब किये घर द्वार आंगन 
छोड़ गया 
बागी वीरानियां 
तोड़ गया कठपुलिया गहरी दरार की ! 

बीता बरस असमंजस की उहापोह 
पलकों के भीतर 
पतिंगों सा बीता  
किरकिर रही कोर अंधड़ व्यार की ! 

कंधों में सपनों का अंधड़ अम्बार लिये 
फिर आया नया साल 
काल के 
कपाल लिखी रेखायें उसको ही पढ़ना है, 

स्वागत समारोह में आज जूझा जमाना 
भ्रम भारी 

भरोसों में डूबा 
अचीन्ही शिला शिल्प उसको ही गढ़ना है, 

हरी होंगी अमराईयाँ कुछ और कुछ 
मुरझाएंगी 
रेंगते ख्वाब 
झाकेंगे झुक झुक बगिया उस पार की ! 

भोलानाथ

विसफारित आँखों के उपजे अचम्भे

 विसफारित आँखों के उपजे अचम्भे 
पाल नहीं धीर धर 
परख पूरे आसार 
फिर नाथ नथुने से तमतमाते बैल को!

हादसा सा अनुभव वक्ष में समेट के 
ओढ़ नहीं और के भरोसे 
कूद फांद 
आने दे बाड़े में बिदके बिगडैल को!

भय खाते भागे बहुत नाचे रीछों सा 
डफली की लय 
दीर्घ होती रही 
बाल बिकते रहे तैंती गंडो में भरके,

जीने की जिद में हिलाया बहुत पूँछ 
फिर पोंछ पिछवाड़ा 
साहस बटोरा 
पेट का बैर सुग्गे सा पिंजरे में धर के,

पीछा करती रही सिर चढ़े भूत की 
आगे पीछे सरकती परछाईयाँ 
समझा सही 
जब मल मल धुला आँख की मैल को!

सुन शहतूती पुचकार मुख की 
भाव सहमति में जब तब 
सहज सिर हिलाई के 
अनुबंध खोटे प्रक्षेपण के पहले ही टूटे,

हल्दी अक्षत के टीके की होलिहारी 
तन मन तीर सा चुभी 
मुंह मिट्ठू मित्रता 
गडेरी के खेतों में महुआ सा कूटे,

मोहभंग भंगिमा की ताज़ा मुंहजोरी 
मिर्ची बघार सी 
नथूनों में भर भर 
बांध खूंटे से खींच कर नकैल को!

आयुधिया गंध चढ़ी त्योरियां लठ लठैती 
क्षम्य नहीं 
फूँक बिगुल होने दे 
रार रण तोडना है ब्यूह यह विनाश का,

उहा पोह दौर की तमतमाती त्रासदी की 
वक्षबेध पीड़ा थमे नहीं 
जैसे 
छिंगुरिया की नख में रवा दता फांस का,

डुगडुगिया फतबों की रेर सुन सहमे 
हिरण सा सकते में हांफे 
गांव शहर 
बाहुबली रूँध रहा निस्तारी गैल को! 

भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...