Friday, 11 June 2021

और क्या किया

 गीत जिया मुझमे 

मैं गीत में जिया !

खेमों से दूर 

विष सामर्थ भर पिया !

और क्या किया !

देखा है दूर से

बैठे जो घूर से

तमाखू का पान खा

ऊपर को पिच्च पिच्च

थूक रहे,

खबरों में रहने को

मठाधीश

गीत ऋषियों की 

प्रभापुंज 

गांजा सा फूँक रहे,

भरी चिलम चुंगी सा

सुट्टा मार लिया !

और क्या किया !

गीत की खुमारी है

गुनगुनाना जारी है

भय कैसा 

विषवंश का

गीत गरुण की मुडेर पर,

अंतर्हित कुंठा के 

कीचड़ में 

घुटकी तक धंसे धनी 

खुआ खोज रहे 

भूसे के ढेर पर,

पानी में बुझी 

बुद्धि भाव की दिया !

और क्या किया !

हमले की हालत में

गीत की बकालत में

माफिया 

कचहरी के

अपराधी सा खड़े रहे,

पगड़ी उछालने के 

लंगड़े हथकंडे 

वक़्त की 

बहती धारा में 

पतझर पहाव से बहे,

बजती रही बांसुरी 

ओंठ साथिया !

और क्या किया !

भोलानाथ

Tuesday, 8 June 2021

खुली आंख का सपना है

खुली आंख का 

सपना है
बंद किये की वीरानी है !
क्या खोया
क्या पाया
जांगर जुगत जुबानी है !
तू अर्थ खोज न
जीवन का
वक़्त का पहिया
आगे आगे जाना है,
किया धरा
पीछे का गुल
बुझी राख में
लपट आग नहीं आना है,
रिव्यू देखकर
नाच न पगले
छूटी हुई कहानी है !
आत्मजयी
किरदारों का खालीपन
अर्जित श्रुति
कीरत कद तोल,
बगलगीर
अभ्यास पर्व की
पीठ गठरिया
गिन गिन गाठें खोल,
अर्जित रौनक
बड़ी बड़ाई
केवल अंध बयानी है !
बासी महक
न बांध नाक से
पग पग पथरीले पथ
रोप चमेली,
जैसे नदिया की
कलकल धारा में
लहरों की
नूतन अठखेली,
पूंछ न मतलब
सरेराह
हर तजबीज सयानी है !
भोलानाथ

Saturday, 5 June 2021

आड़े तिरछे कुबड़े कन्धों टाँगे जाल

 आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

छोड़ दिया है 

कांटेदार बबूल 

की टहनी 

लिया बसेरा 

महुआ बरसज 

चोंच पकी है 

चार चिरौंजी 

तेंदू का विश्राम, 

नीम निमौली 

शीतल छाया 

पके पपीता 

आँख बसे हैं 

पानी पनघट 

की रहवासी 

चतुर चिरैया 

हो गई चारो धाम, 

पिंजरे की 

गल गईं 

सलाखें 

पंख कुतरतीं 

कैंची देखें 

आँख फाड़कर 

मैना बैठी 

किले कंगूरे 

फतवा फ़ाँसी पढिये ! 

आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

नीलकंठ की 

चोंच बंधा है 

नया दशहरा 

क्षितिज को छूने 

नई उड़ाने 

खोजें आँखे 

भूली बिसरी 

दूध की नदियाँ,   

सारस सहज नहीं 

दिन काटे 

भूखे रह कर 

लडे चील से 

लोहित पखने 

हरे घाव हैं 

पानी पी पी 

बीती कितनी शदियाँ,  

बाज उलूकों 

की चालाकी 

कोयल भांपे 

जब तब 

मौन रही 

समय समझ 

सुर साध के बोली 

कठकोली से माफिक 

माटी मूरत गढ़िये !

 आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

कलाबाज कौआ 

अचरज में 

हंस उड़ानों 

के संभावित 

चिन्हों की 

दिशा दशा 

रंगीन तितलियों के 

पंखों से पूंछे, 

बतबढ़ उद्देश्यों का 

महारथी 

कथा सुनाकर 

प्यासे पपीहे को 

सागर के 

चुल्लू भर 

पानी में 

डाल रहा घट छूंछे, 

गिद्ध गरुण  

चीलों के 

पंजों ने 

बहुत लिखे 

चुनगुन की छाती 

मौजी हिंसक 

आखेटों के किस्से 

हारिल कलगी 

घाव नहीं मढिये !

आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये ! 

भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...