गीत जिया मुझमे
मैं गीत में जिया !
खेमों से दूर
विष सामर्थ भर पिया !
और क्या किया !
देखा है दूर से
बैठे जो घूर से
तमाखू का पान खा
ऊपर को पिच्च पिच्च
थूक रहे,
खबरों में रहने को
मठाधीश
गीत ऋषियों की
प्रभापुंज
गांजा सा फूँक रहे,
भरी चिलम चुंगी सा
सुट्टा मार लिया !
और क्या किया !
गीत की खुमारी है
गुनगुनाना जारी है
भय कैसा
विषवंश का
गीत गरुण की मुडेर पर,
अंतर्हित कुंठा के
कीचड़ में
घुटकी तक धंसे धनी
खुआ खोज रहे
भूसे के ढेर पर,
पानी में बुझी
बुद्धि भाव की दिया !
और क्या किया !
हमले की हालत में
गीत की बकालत में
माफिया
कचहरी के
अपराधी सा खड़े रहे,
पगड़ी उछालने के
लंगड़े हथकंडे
वक़्त की
बहती धारा में
पतझर पहाव से बहे,
बजती रही बांसुरी
ओंठ साथिया !
और क्या किया !
भोलानाथ
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