Saturday, 5 June 2021

आड़े तिरछे कुबड़े कन्धों टाँगे जाल

 आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

छोड़ दिया है 

कांटेदार बबूल 

की टहनी 

लिया बसेरा 

महुआ बरसज 

चोंच पकी है 

चार चिरौंजी 

तेंदू का विश्राम, 

नीम निमौली 

शीतल छाया 

पके पपीता 

आँख बसे हैं 

पानी पनघट 

की रहवासी 

चतुर चिरैया 

हो गई चारो धाम, 

पिंजरे की 

गल गईं 

सलाखें 

पंख कुतरतीं 

कैंची देखें 

आँख फाड़कर 

मैना बैठी 

किले कंगूरे 

फतवा फ़ाँसी पढिये ! 

आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

नीलकंठ की 

चोंच बंधा है 

नया दशहरा 

क्षितिज को छूने 

नई उड़ाने 

खोजें आँखे 

भूली बिसरी 

दूध की नदियाँ,   

सारस सहज नहीं 

दिन काटे 

भूखे रह कर 

लडे चील से 

लोहित पखने 

हरे घाव हैं 

पानी पी पी 

बीती कितनी शदियाँ,  

बाज उलूकों 

की चालाकी 

कोयल भांपे 

जब तब 

मौन रही 

समय समझ 

सुर साध के बोली 

कठकोली से माफिक 

माटी मूरत गढ़िये !

 आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये !  

कलाबाज कौआ 

अचरज में 

हंस उड़ानों 

के संभावित 

चिन्हों की 

दिशा दशा 

रंगीन तितलियों के 

पंखों से पूंछे, 

बतबढ़ उद्देश्यों का 

महारथी 

कथा सुनाकर 

प्यासे पपीहे को 

सागर के 

चुल्लू भर 

पानी में 

डाल रहा घट छूंछे, 

गिद्ध गरुण  

चीलों के 

पंजों ने 

बहुत लिखे 

चुनगुन की छाती 

मौजी हिंसक 

आखेटों के किस्से 

हारिल कलगी 

घाव नहीं मढिये !

आड़े तिरछे 

कुबड़े कन्धों 

टाँगे जाल 

डाल डाल कर 

हाथ का दाना 

बाग बगीचे 

ओट में हीचे 

झुरमुट 

भौंचक हुये बहेलिये !     

तीतुर लावा 

मोर परेबा 

गलगलियों ने 

सीख लिया है 

जाल काटना 

अमुआं डारी 

छाँव दुलारी 

सुआ हुये 

चोंचों घोडचढिये ! 

भोलानाथ

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