Sunday, 31 March 2013

भोलानाथ के नवगीत [पेट और ]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!.....

पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
शिवालय से लेकर
बीहड़ तक उतरे
सोमरस सुभीतों की
पुश्तैनी मटकी में
भर भर के ताड़ी,
काले कपालों के
भीतर का भेजा
शिकारी रंगों में
कंठों तक डूबा
अँधा अनाडी,
अँडज पखेरुओं के
चूजों की
ऊँची उड़ानें
खोखल में सिमटीं
पूंछों में बांधे
गुलामी का फीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
जगायेगा कब तक
बंजारा सूरज
सांसत में चंदा
चापलूसी के माहिर हैं
झिलमिल सितारे,
साधकों का चिंतन
संजीवनी
जाने न बकरा
सिलौंटियों में घिसे कौन
उठ कर भिनसारे,
गंगा नहाई
बैतरणी की बछिया
मवादों की धारा में
मछली सा डूबी
पगुराती
थूथुन भर लीले सुभीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !
तिलक तर्जनी लगाकर
अंगूठे दिखाते
बिदुरों को शकुनी
दूध भरी नदिया
फेक रहे पाशे,
चक्रव्यूह तोड़ते
मच्छर से मरते
अभिमन्युं
परसादी सा बांटते
कौरव अर्जित बताशे,
क्या करेंगे पीटकर
युयुत्सी
सोच के नगाड़े
झूठ मूठ कसमें
मठाधीश खाते
दाबे कखरियों में गीता !
पेट और जनेंद्रियों के
इर्द गिर्द घूमते
वर्तुली सवालों के
चिरजीवी
प्रश्न पत्र पढ़ते
समय सार बीता !
आँखों की पीड़ा
नथुनों में उतरी
आँतों की पत्थरी
घुली नहीं
बूटियों का काढ़ा
कढ़ाई से रीता !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – 8989139763

Saturday, 30 March 2013

भोलानाथ के नवगीत [रहते हम शहरों में]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नया गीत विद्रूप यथार्थ की धरातल पर सामाजिक व्यवस्था और प्रबंधन की चरमराती लचर तानाशाही के कुरूप चहरे की मुक्म्मल बदलाव की जरूत महसूस करता हुआ नवगीत !
साहित्यिक संध्या की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर है!....

रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
दरबारी दरबार के नहीं
और न ही नवरत्न हैं उज्जैनी राज के,
कौन सुने तर्जनी की पीड़ा
अंगूठे सब रत्न हुए राजा के ताज के ,
क्या कहिये
हचर मचर बग्घी के पहिये
टूटेगी धुरी छोड़ हारे हम कह कह के !
हारे हम कह कह के टूटेगी धुरी छोड़
टूटेगी धुरी छोड़ हारे हम कह कह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
यक्ष की पीडाएं भूलकर
गढने लगे कालिदास सूक्तियां अनूठी ,
फाड़ फाड़ मछली के पेट को
खोज रहे साकुंतली अनुपम अंगूठी ,
खप गईं पीढियां
चढ चढ रेतीली सीढियां
सूख गये आंसू आँखों से बह बह के !
आँखों से बह बह के सूख गये आंसू
सूख गये आंसू आँखों से बह बह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
गहरा है ,नया नया घाव है
चुटुक वैदिया में पक पक के हो गया नासूर ,
जीते जी चींटियाँ लीलेंगी अजगर
मिटटी के शेर का क्या है कसूर ,
पत्थर क्या जानें
सांसें पहचानें
छाती की पीड़ा प्राणों को दह दह के !
प्राणों को दह दह के छाती की पीड़ा
छाती की पीड़ा प्राणों को दह दह के !
रहते हम शहरों में
भेड़ियों के पहरों में
बन रहे निवाले हम रह रह के !
हम रह रह के बन रहे निवाले !!
बन रहे निवाले हम रह रह के !
लारियों के
अजनवी शिकारियों के
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !
चीर हरण सह सह के हांथों हम हीचे
हांथों हम हीचे चीर हरण सह सह के !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर ,
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989193763

Friday, 29 March 2013

भोलानाथ के नवगीत [जब तक तुम थे]

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

जब तक तुम थे
पास हमारे
हंस हंस
फूले फूल परागी
ओंठ हंसी झरने !
छोड़ गये जब से
ठग ठग तुम
गोकुल की गलियाँ
पतरोई सा
हम भी लगे बिखरने !
ऊबे ऊबे चहरे
ऊबी हैं पहचाने
तितर बितर
दिखती हैं
ग्वालों की टोलियाँ,
यमुना की लहरों में
लिखते हैं हम भी
अँखियों संदेशे
पढ़ पढ़ के
कोयल की बोलियाँ,
रंग बिरंगे
छंद नहीं दिखते
मुरली बिन
पायल की भाषा
पल पल लगी अखरने !
जब तक तुम थे
पास हमारे
हंस हंस
फूले फूल परागी
ओंठ हंसी झरने !
छोड़ गये जब से
ठग ठग तुम
गोकुल की गलियाँ
पतरोई सा
हम भी लगे बिखरने !
माधव उद्धव से
कह दो और सुनायें ना
हमको अब
मथुरा के
चौपाली चर्चे,
केसरिया कानों में
छापें ना
रह रह
बिरहाकुल संशय के
कोई अब पर्चे,
भीतर नगरी
बाहर कस्वे
काँस कंटीले
बगियाँ बाग़
खेत सा लगे बखरने !
जब तक तुम थे
पास हमारे
हंस हंस
फूले फूल परागी
ओंठ हंसी झरने !
छोड़ गये जब से
ठग ठग तुम
गोकुल की गलियाँ
पतरोई सा
हम भी लगे बिखरने !
बंसवट बौराई
पवन पियासी
फुनगी बैठी
रो रो फोड़े
कांच के कंगना,
ओंठों की
मुँह भर मुस्कानें
सूख गई हैं
जैसे सूखे
महुआ अंगना,
छाती थाती
धरी हैं ताती
छवियाँ मोहक
आँखें देती
नहीं बिसरने !
जब तक तुम थे
पास हमारे
हंस हंस
फूले फूल परागी
ओंठ हंसी झरने !
छोड़ गये जब से
ठग ठग तुम
गोकुल की गलियाँ
पतरोई सा
हम भी लगे बिखरने !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

Wednesday, 27 March 2013

भोलानाथ के नावगीत [रंग रंगीली ]



रंग रंगीली
शुभ संध्या की
भेज रहा हूँ
सखा सभी को
जिया दिवस भर
ओंठ ठिठोली !
कर ली ठंडी होली !!
गीतों भरी
जिया की बातें
गाया खूब
महकते सपने
गालों मला
गुलाल मनाई होली !
कर ली ठंडी होली !! 
जिया रंगा है
रंग में अपने
ओंठों चढ़ी
बुखार उतारी
खेली फूहर रंग बिरंगी 
बोली हमने बोली !
कर ली ठंडी होली !!


भोलानाथ

Tuesday, 26 March 2013

भोलानाथ के नवगीत

लिख लिख 
फूलों भेज रहा हूँ 
सखे तुम्हें मैं 
होली के पैगाम ! 
सोन सुबह 
चन्दन की रोली 
चम्पई दुपहरी 
अबीरों टीका 
और गुलाली 
मोर्पंखिया शाम ! 
कानों मिशरी 
घोली तुमने 
ओंठों धर के 
दुनियाँ भर मिष्ठान,
रंग बिरंगी 
हंसी ठिठोली 
कैसे भेजूं पैक पन्नियों 
मावे के पकवान,
मूवर सभी 
आज मौज में 
रंग रंगीली होली खेलें 
और उछालें 
फूहर बातें
सखियों के ले नाम ! 

भोलानाथ
लिख लिख 
फूलों भेज रहा हूँ 
सखे तुम्हें मैं 
होली के पैगाम ! 
सोन सुबह 
चन्दन की रोली 
चम्पई दुपहरी 
अबीरों टीका 
और गुलाली 
मोर्पंखिया शाम ! 
कानों मिशरी 
घोली तुमने 
ओंठों धर के 
दुनियाँ भर मिष्ठान,
रंग बिरंगी 
हंसी ठिठोली 
कैसे भेजूं पैक पन्नियों 
मावे के पकवान,
मूवर सभी 
आज मौज में 
रंग रंगीली होली खेलें 
और उछालें 
फूहर बातें
सखियों के ले नाम ! 

भोलानाथ

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध भोर रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

घोरो ना पानी 
पानी में रंगों की 
रंग भरी डिबियाँ 
पिचकारी भरो ना 
कपोलों मलो ना 
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया ! 
आई है होली 
अंखियों से खेलें 
बनकर रंगोली 
फिजाओं ने 
आँचर भिंगोया 
अंगिया गुलाबी आगी लगी है 
बाँहों के झूले झुलाओ पिया ! 
शतरंगी रंगों से रंगी है 
भीतर की दुनियाँ
आँखों कमल दल 
पलकें पलाशी 
कोरों का काजल 
गुलाबी बनाओ 
जूड़े में मेरे गज़रा सजाओ, 
अंतर में गूंजे 
प्राणों में घोले 
मेहंदी की रंगत
ओंठों को नदिया 
मन को मछरिया 
तन को तलैया 
भगोरिया वनों की कोयलिया बनाओ,
हल्दी की उबटन 
फागुन का चन्दन 
बांगों में फूलों के मेले 
ख्वाबों की गाडी में 
हम हों अकेले 
अनुरागी ताड़ी 
पी के मस्ती में हांको पिया !
घोरो ना पानी 
पानी में रंगों की 
रंग भरी डिबियाँ 
पिचकारी भरो ना 
कपोलों मलो ना 
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया ! 
आई है होली 
अंखियों से खेलें 
बनकर रंगोली 
फिजाओं ने 
आँचर भिंगोया 
अंगिया गुलाबी आगी लगी है 
बाँहों के झूले झुलाओ पिया ! 
गा गा कर बाहर 
बिस्तर के किस्से 
चादर की सिलवट
विज्ञापन बनाकर 
दिखाओ टँगाओ न 
चौराही बरगद के ऊपर
फागुन को सौंपो फागुनियाँ रागें,
परती दिलों में 
बरसो न बनकर 
बरसाती बादल
उगेगी थूहर भयानक 
अबीरों की आभा 
गुलालों की लाली 
चुटकी भर सेंधुर हम तुमसे मांगे, 
फूहर है भाषा 
फूहर है बोली 
रंगों की होली मुह भर ठिठोली 
कामकेलि रागिनी 
चौपाली चरचा 
फरका गली में 
मतवाली मोरिनी नचाओ पिया !
घोरो ना पानी 
पानी में रंगों की 
रंग भरी डिबियाँ 
पिचकारी भरो ना 
कपोलों मलो ना 
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया ! 
आई है होली 
अंखियों से खेलें 
बनकर रंगोली 
फिजाओं ने 
आँचर भिंगोया 
अंगिया गुलाबी आगी लगी है 
बाँहों के झूले झुलाओ पिया ! 
आगी लगी है 
कोठवा की छानी 
बुझती नहीं है बदरी की बानी 
चलनी में चालो न 
मटकी का दूध मिला पानी
चुल्लू भर सींचो 
तो प्यास बुझे मन की,
नदियों नहाई 
पलाशी वनों से 
फगुआ की रस्में निभाती
मादल नगाड़ों की 
मनचली कोरस रसीली 
कंचुकी की चौकड़ी 
भूल गई सीमायें तन की, 
धानी चुनरिया 
रंगों से लथपथ 
अंगों से लपटी 
होली के उत्सव 
अधरों में मुक्त हंसी लहरी 
भीतरी गोवर्धन 
उंगली में अपने उठाओ पिया !
घोरो ना पानी 
पानी में रंगों की 
रंग भरी डिबियाँ 
पिचकारी भरो ना 
कपोलों मलो ना 
अबीरी अँजुरियाँ
तुम्हारे रंगों में रंगा है जिया ! 
आई है होली 
अंखियों से खेलें 
बनकर रंगोली 
फिजाओं ने 
आँचर भिंगोया 
अंगिया गुलाबी आगी लगी है 
बाँहों के झूले झुलाओ पिया ! 

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत तो नहीं है फिर भी आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
औंध औंध
रेत और बालू में
खोज खोज चकमक
पानी में धूनी
सुलगाई है
गीतों की हमने,
बहते पहावों की
लकड़ी जुटाई
न उपले
खैरातों में पाई
सोंसों की समिधा
हवन किये सपने,
रोकेंगे
काने
कुटिल मछुआरे
कब तब तक
जाल में
सूरज अवारा !
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
कानाफूसी
कनातों की
उलझाती नजरें
विज्ञापन ओढ़े रुपहले
हंसते रहो
बडबोली मुस्काने,
रहने दो
पर्दों के पीछे हमें
महुओं की खोखल में
सुग्गों के जैसे
सुविधायें हम
भी तो जाने,
पखनों में
अपने
क्षितिज
हम भरेंगे
फकीरी अदा के
बहरे बंजारा !
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !
फूल की तरह ही
उछाले हैं आपने
अंगारे जलते
जब तब
सतरंगी धोतियों की
भाव भरी उलियाँ,
फसलें भरी हैं
कविता की आपने
तुलसी कबीरा की
ड़ीहों की माटी
से निर्मित
बखारी कुठुलियाँ,
फिर भी
नहीं दिखता
अउनों से
झिरता
जुगुनुओं का
कर्पूरी उजियारा ! ४३
रहने दो
छोडो
अभी देखा
कहाँ है अनचीन्हा
दम ख़म
आपने हमारा !
छेड़ें
अगर लय
हम अपने
गीतों की
नाचेगी नदिया
छोड़ कर किनारा !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
प्राण भेदी चितवन
एक नज़र
हम पर भी डारो,
लहरों में
बनाये
रेत के घरौंदे उबारो,
मीरा संग राधा
आज रास तुम नाचो
साथ में हमारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
यमुना की
लहरी में झांके
पूनम की चंदा,
तुम भी निहारो
कमल मुख कलियाँ
डारो न फंदा,
आँचल का फागुन
पलाशों का फींचा
गलियाँ निहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !
डारे कदम की
डारी हमने
बाहों के झूले,
प्राणों में मेहदी
अमलतास
साँस फूले,
खेलेंगे हम भी
गोकुल की होली
प्रीत के सहारे !
एक बार चल कर
तो आओ कन्हैयाँ
यमुना के किनारे !
देखेंगे हम भी
सजती मुरलिया
ओंठ में तुम्हारे !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989139763
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चकमक सी प्रहरी 
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी 
राग नहीं बिसरी 
नदिया के घाटों 
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती 
गहनों से लदी फंदी परियाँ ! 
छनकाती पायल 
मधुमय रंगीली 
गूलर छबीली 
कहुओं की 
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी 
चारा चुगातीं फँसाती 
मछेरिन जाल में मछरियाँ ! 
सिंदूरी संध्या 
पलकों में उतरी
मधुमास परचित 
कपोलों में 
फूला गुलाबी, 
कमल मुख रंगीली 
आँचल महकती 
छुअन आँख 
आँखों की चितवन 
चितौनी शराबी, 
अहसासी सांसें 
खिली हैं सिराने 
बिम्ब हैं बिराने
दर्पण में मेरे
इन्द्रधनुष हेरे 
आखेटी 
गंध की कुलांचें 
फूली हैं भीतर भर जरियाँ ! 
चकमक सी प्रहरी 
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी 
राग नहीं बिसरी 
नदिया के घाटों 
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती 
गहनों से लदी फंदी परियाँ ! 
छनकाती पायल 
मधुमय रंगीली 
गूलर छबीली 
कहुओं की 
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी 
चारा चुगातीं फँसाती 
मछेरिन जाल में मछरियाँ ! 
झरती है झर झर 
पियूष पिये 
प्रीत की 
मकरंदी ओंठों से 
निर्झर निर्झरणी धारा,
अर्झी है आँखों में 
मछली की आँख सी 
हस्ताक्षर 
हीन उड़ा 
सतिया गुब्बारा, 
बहते सैलाब में 
थमे नहीं पाँव 
पनघट की छाँव 
कोयल की बोली 
देह भर ठिठोली 
रस बोरी लुकाछिपी 
अंतर की आगी 
यौवन की सींची अँतरियाँ !
चकमक सी प्रहरी 
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी 
राग नहीं बिसरी 
नदिया के घाटों 
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती 
गहनों से लदी फंदी परियाँ ! 
छनकाती पायल 
मधुमय रंगीली 
गूलर छबीली 
कहुओं की 
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी 
चारा चुगातीं फँसाती 
मछेरिन जाल में मछरियाँ ! 
भगोरिया वनों सी 
सतरंगी 
चुनरी तुम्हारी 
पुरवा की 
बांहों में रह रह झूले,
भौरों के रेवड़ 
संशय में 
अटके 
मचलती निगाहें 
जूही बेले चंपा को भूले,
फागुनी उमंगों में 
गीतों के रसिया 
मचली बतसिया 
रंग भींजे आवरण
देह ढके आचरण 
ओंठों की चुप्पी 
प्राणों में उतरी 
बंद कर किमरियाँ !
चकमक सी प्रहरी 
पुन्य हुये
पत्थर की नगरी 
राग नहीं बिसरी 
नदिया के घाटों 
गूँजते ठहाकों
चौकड़ियाँ भरती 
गहनों से लदी फंदी परियाँ ! 
छनकाती पायल 
मधुमय रंगीली 
गूलर छबीली 
कहुओं की 
जल छूती डारी
लहरें कुवांरी 
चारा चुगातीं फँसाती 
मछेरिन जाल में मछरियाँ !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा !
साहित्यिक अर्ध रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
देखो तो मुड़कर
आंगन में मेरे
गुलाबों की बगिया
फूली नहीं
रुकी है तुम्हारी
उँगलियों की पावन
छुअन के लिये,
जन्मों की सूखी
पोखर तलैया
सजल हुई
चाहत की बूँदे
आँखों से छलकी हैं
जब से तुम्हारे
हमारे मिलन के लिये,
वन भर फूले
फुलचुहियों के बिरवे
गुलमोहर उत्सव
पलाशी परव के
भावों की भूमि
राधा छवि की आरती उतारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
तुलसी सी सुधियों
रंगों की नदियों
डूबी कोयलिया
तोतों की बोली
प्रणय प्रीत घोली
जिया में
कटारी सी उतरी,
भौंरा ना हांको
अंतस में झांको
टेशुओं की लाली
फागुन की पाली
सोनजुही
सूरत तुम्हारी
आँखों की पुतरी,
नीलकंठ मैना
बसंत ऋतु रैना
महुये की
बांहों में मचली
बिना फूले गूलर
गुलाबी हुई है नदिया किनारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !
सेमल सी फूली
पपीहे की बोली
अमलतास पाती
समय सगुन थाती
और झुकी हैं
अमुआं की
बौर से डरईयाँ,
महक रही
चेहरे भर चांदनी
पी पी के मादनी
झूम झूम चूम रही
बरगद की फुनगी
भींगी हैं
देह भर चिरईयाँ,
सांसें उसांसें
संसय से अरझीं
पनघट में डारे
बांहों ने
हंस हंस
फूलों के झूले रेशम के नारे !
अभी क्या हुआ है
कैसी है दूरी
कैसी मजबूरी
ओंठों में आहें
झलकती है पीड़ा
आँख में तुम्हारे !
गुलाबी है फागुन
मौसम सुहाना
कैसा बहाना
गोदावरी बन भीतर बहो
रहो हरदम
सांस में इतर सी हमारे !

भोलानाथ
डॉराधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क – ८९८९१३९७६३

मेरे अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल होगा ! 
साहित्यिक रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !

और आवाहन करता हूँ "हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...

अबकी फगुआ 
भी गाऊंगा 
रंग बिरंगे 
गीत मैं होली के ! 
भरे अबीरी 
हाथ मलूँगा 
गाल 
रँगूँगा बँधन चोली के !
हवा में मह मह महकी
साँस तुम्हारी 
बहकी गलियाँ गलियाँ, 
मेरे प्राणों 
छुअन कुवाँरी 
जूड़े बँधीं जुही की कलियाँ, 
भौजी मिली 
मिली न सखियाँ 
लिखूँ कुतुहल कच्चे 
किस हमजोली के !
अबकी फगुआ 
भी गाऊंगा 
रंग बिरंगे 
गीत मैं होली के ! 
भरे अबीरी 
हाथ मलूँगा 
गाल 
रँगूँगा बँधन चोली के !
अँग अँग के रँग रँग से 
नाम तुम्हारे 
भरी है हमने पिचकारी,
झरे अबीरी बादल बरखा 
मेरे रंग में 
भींजो प्राण पियारी,
ढोल नगाड़े 
मादन बरसे 
रंग रंगीली 
अलख जगी मुह टोली के !
अबकी फगुआ 
भी गाऊंगा 
रंग बिरंगे 
गीत मैं होली के ! 
भरे अबीरी 
हाथ मलूँगा 
गाल 
रँगूँगा बँधन चोली के !
अंतर यौवन की 
अमृत सिसकारी 
भाँग पिये घुंघरू पग नाचें, 
आदिम पर्व के 
उत्सव की 
खुली किताबें द्वारे द्वारे बाचें,
मधुरस ओंठ 
गगरिया छलकें
घूँघट खिले 
पलाश ठिठोली के !
अबकी फगुआ 
भी गाऊंगा 
रंग बिरंगे 
गीत मैं होली के ! 
भरे अबीरी 
हाथ मलूँगा 
गाल 
रँगूँगा बँधन चोली के !

भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989139763

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...