मेरे
अपने सभी सुधि पाठक ,सुधि श्रोता और नवोदित, वरिष्ठ,तथा मेरे समय साथ के
सभी गीतकार,नवगीतकार और साहित्यिक मित्रों को समर्पित आज का यह नवगीत
फागुनी उमंगों का गीत है आशा करता हूँ ! आपको भी तरंगायित करने में सफल
होगा !
साहित्यिक रात्रि की सुन्दरतम शीतल बासंती बेला में निवेदित कर
रहा हूँ !आपकी प्रतिक्रियाएं ही इस चर्चा और पहल को सार्थक दिशाओं का
सहित्यिक बिम्ब दिखाने में सक्षम होंगी !
और आवाहन करता हूँ
"हिंदी साहित्य के केंद्रमें नवगीत" के सवर्धन और सशक्तिकरण के विविध
आयामों से जुड़ने और सहभागिता निर्वहन हेतु !आपने लेख /और नवगीत पढ़ा मुझे
बहुत खुश हो रही है मेरे युवा मित्रों की सुन्दर सोच /भाव बोध /और दृष्टि
मेरे भारत माँ की आँचल की ठंडी ठंडी छाँव और सोंधी सोंधी मिटटी की खुशबु
अपने गुमराह होते पुत्रों को सचेत करती हुई माँ भारती ममता का स्नेह व
दुलार निछावर करने हेतु भाव बिह्वल माँ की करूँणा समझ पा रहे हैं और शनै
शैने अपने कर्म पथ पर वापसी के लिए अपने क़दमों को गति देने को तत्पर ...
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
हवा में मह मह महकी
साँस तुम्हारी
बहकी गलियाँ गलियाँ,
मेरे प्राणों
छुअन कुवाँरी
जूड़े बँधीं जुही की कलियाँ,
भौजी मिली
मिली न सखियाँ
लिखूँ कुतुहल कच्चे
किस हमजोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
अँग अँग के रँग रँग से
नाम तुम्हारे
भरी है हमने पिचकारी,
झरे अबीरी बादल बरखा
मेरे रंग में
भींजो प्राण पियारी,
ढोल नगाड़े
मादन बरसे
रंग रंगीली
अलख जगी मुह टोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
अंतर यौवन की
अमृत सिसकारी
भाँग पिये घुंघरू पग नाचें,
आदिम पर्व के
उत्सव की
खुली किताबें द्वारे द्वारे बाचें,
मधुरस ओंठ
गगरिया छलकें
घूँघट खिले
पलाश ठिठोली के !
अबकी फगुआ
भी गाऊंगा
रंग बिरंगे
गीत मैं होली के !
भरे अबीरी
हाथ मलूँगा
गाल
रँगूँगा बँधन चोली के !
भोलानाथ
डॉ,राधा कृष्णन स्कूल के बगल में
अन अच्.-७ कटनी रोड मैहर
,जिला सतना मध्य प्रदेश .भारत
संपर्क -08989139763
No comments:
Post a Comment