बरगद के नीचे कौओं का
हगा बीज
उग अंकुरा पतवार मरेगा
मधुमास तो आने दो !
काई कांदो चौमास चकौड़ा
सावन भादों के
उमस भरे दिन
अनुज इन्हें हरियाने दो !
बेल बौल चढ़ डाली डाली
धूप चमकती हथकड़ियों सा
कस फुनगी पेढ़ी
उलहन विवस मायूस लौंचियाँ,
किलकारी भर पांव पैजनियां
पौढ़ पालने
ऐडी ऐडी खौंद गदेलियाँ
बालकृष्ण सी बाँह पौचियाँ,
नंद महल सा उत्सव उत्साह
दशहरा भोर
गोधूलि दीवाली
माखन मिशरी भोग लगाने दो !
डांग बंधी दधि हंडिया ऊंची
कलाबाज उस्ताद गिरेंगे
टूटेंगे मुख
जीभ कटेगी निज दांतों से,
अखरा ओंठ नहीं फूटेंगे
होगा हलक मरुस्थल जैसे
फागुन के रंग नहीं
निथरेगा मल आंतों से,
खड़िया लेप उड़ेगा झर झर
चेहरे से
उज्जैनी के पाखंड को
बड़भागी क्षिप्रा के घाट नहाने दो !
गिरगिट का किरदार निभाते
मठाधीश रौंदेंगे
कबिरा की और मौलिकता
तरबे चांट जियेंगे गोड़ गुलामी,
जाति धरम कुनबों में बंधे न बांधी
बौद्धिक क्षमता
अविरल बहे नदी सी
आती जाती क्षेपक रही सुनामी,
मेट सकी न श्रजन प्रकृति का
तहस नहस उत्पात की
लीला का
खुद उसको इतिहास बनाने दो !
भोलानाथ