Thursday, 28 October 2021

ठुमका ठुमको

 ठुमका ठुमको 

बड़ी प्यारी है थिरकन तुम्हारी ! 


चेहरा नहीं भीड़ के 

निभती निहु हिस्सेदारी! 


ओढो बिछाओ 

बेहाली 

गुजारे को हाजिर हैं 

चिथरा चिथरियाँ,

खैरात खाये 

ओढाये उपन्नों के 

भीतर से 

झाकें थेगरियाँ, 


किचराई आखों से 

चुचुआ के झरती लाचारी ! 


गांठों के 

सिरे गिरे कहाँ 

तजबीज बोध 

दूर दृष्टि नही तेरी,

अजायब मठों के 

अजायब अघोरी 

अपने नहीं हैं 

न इनकी फेरी, 


रहने दो जय जयकारों के

स्वर दुनिया दारी ! 


गाये तजुर्बे 

कानों को फबे न 

तुम्हारे

मुनमुनाते बगदर सा झाडा,

जिया औघड़ आराध्य सा 

आंखों जहन के 

सपने 

मुखौटों के बाड़ा, 


अकारथ कटी उमर 

नाचते निभाते जिम्मेदारी ! 


भोलानाथ

Tuesday, 26 October 2021

लोहा लाल पकड़ संसी से

लोहा लाल पकड़ संसी से 

बैठे बैठे
भट्ठी में उकड़ू उकताये
गरमा गरम हथौड़ा
मार न पाये
हचर पचर पचरे खांचे के
रही पलटती निहाई !

रोज रोज का गरम नरम
व्यापार समेटा
फेका गोबर घूरे
फोंका फांक फकीरी
भोर उज्जैनी दुपहरी तक्षशिला
संझा
वृंदावन की हृदय समाई !

उड़ा रंग भीतर का भले
फक्क सफेदी
कभी न बाहर आने दी
रंगीन लबादे के भीतर रह
हंसी खुशी
मेहनत कस पौरुष
भस्मी का किरदार जिया,
बेसुरी भैंस के आगे
बजती रही बीन
लय कभी न टूटी
बदली घरु जरूरत के वाजिब
कोरम की संख्या भरपाई के
अनुपालन का
परिचय हर बार दिया,

राग द्वेष की धूप छांव
आवाजाही के
उभरे पदचिन्हों की
भिन्न भिन्न आकृतियों के
अनुकूल आकलन की
सूची में
अंकित है अकूत गहराई !
निजी स्वार्थ सहन के
बाहर जीने का ख्याल किया न
भवबंधन से बंधे रहे
रेफ न कौंधी जहन गिले की
चल रही परिधि के भीतर
लीला जीवन यापन की,
हांक रहे निर्बाह की रेवड़
जस तस
रजत पुलक दिख रही दूर
बारीक बहुत उम्मीदों की
रंगविरंगी
घिसल पट्टियां
साझेदार हैंअपने ज्ञापन की,

अंदाज छोड़ खारिज कर
पुश्तैनी परम्परा के
तुक्ष्य सुभीते
गहिरे गिरे हैं
हीरे मोती माणिक मणियों की
लोक लुभावन
लाजहीन लहजा की खाई !

अफसोस बहुत है
अक्षय विरासत की जड़ से
कट  वस्त्र विरत हो
स्विममिंग
पूल में तैर नहाने का
याद आते हैं घाट पाट वे
पावन नाव बिहार नदी के,
खाई खन्दक की दलदल से
मुमकिन रहा न बाहर आना
वैताल विक्रमी हाल
सम्हाल सके न
पाँव रेंगते
गांव शहर की ओर
उजली भोर निहार सदी के,

उंची कोठी उजले बंगले
रंगीन
पूछ अजगर की
पकड़ मरोड़ तिलिस्मी
उलट पुलट तन तोड़े
पढ़े न आंखों कान सुने न
संवेदन की चीख रुलाई !

भोलनाथ









Saturday, 23 October 2021

दीवार कवच हैं

दीवार कवच हैं 

राजदार हैं
हर धड़कन की
नहीं खींचती रेखाएं !

रखती हैं
खिड़की दरवाजे
मौसम के अनुकूल
आचरण की आदत अलखाएँ!

गतिरोधों के
परियाय से बाहर
सोच अलहदा
ताक झांक कर
भीतर अपने,
दिवारहीन परिवेश में
रहकर
भावावेग भटकते
जिये उमर भर
टूटे सपने ,

मूंड गोड
मर्यादा की रक्षक
बाहर के कांटा कंटक
कितना भी बल खाएं !

छोड़ भरम के सिरे
फकीरी लीक
भ्रांति के
भुतिया बोली का
केवल झूठ तंत्र है,
पावन मनोगति की
भावभूमि का
बन अनुगामी
सच्ची सच्ची
मुह की कही मंत्र है,

बेतरतीब बहस की
अनुपयोगी
बढी लताओं की
छांट सही कर शाखाएं !

इस उस पार की
बात न कर
सब तेरे अपने हैं
झांक न जंगले
खोल किवाड़े,
धूप छांव सिर
गंध रोटियों की
आने दे
पत पानी की
बतबड़ आये न आड़े,

पके बाल की
चांद सफेदी
पोत न पालिस
लहराने दे अधपकी पखाएँ
भोलनाथ

Friday, 22 October 2021

नटनियों नटों डंगचढ़ियो के करतब

 नटनियों नटों 

डंगचढ़ियों के करतब
कूंचों के
गलियों में रहते
धमनियों शिराओं न बहते !

इष्ट मान
पीछे पीछे जो भागे
शरणागत हो बजाओ
देवालय की घंटियां
अल्ला अजान सांई कहते !

तुम्हारे आदर्शों के
बेधर्मी घोड़ों ने
खाया खेत
चरी गाढ़ी कमाई की
लहलहाती
फसलें तुम्हारी ,
नाचे
पाँव बांध घुंघरू
पड़ोसी के आंगन
बरदौरी विदेशी
जने गांव खच्चर
बेलगाम रही करियारी,

छोरो डांग नटनी रसरिया
भद्द से
भाड़ में गिरेंगे
सिरे आ पंडा के
बकुरेंगे दहिया सा दहते !

हल्दी नेउना लगा
कूट देते पहले नसी
फिर नशेड़ीऔलादें
कैसे परोसती
देश को
ड्रग्स की बियारी,
वंशावली पढ़
न्यालय न आती दलाली
लीप पोत बिल मुसकुर के
चूल्हा चढ़ाने
मिर्चा मसालों की
गबड़ी तरकारी,

चश्मे के पीछे आंखों के
आगे
पुड़िया के सच का
गढ़ते मंसूबा थकते नहीं
झूठ पर झूठ तहते !

खाकर के ठोकर
मुह के बल
गिरता जब जोकर
झाड़ पोंछ मुखड़ा
उठाने उमड़ता है
बुद्धिहीन पुतलों का रेला,
प्राणवान पाप धोने को
कैमरे के आगे
भाग
मीडिया के जागे
कवर हुआ ज्यों
शिप्रा उज्जैनी का मेला,

जाने न कोई समझे न कोई
बीतें दिन
चालबाज
भेड़ियों की खाल में
सियारों की खुराफ़ात सहते !

भोलानाथ

Thursday, 21 October 2021

रूह दिवाल तोड़कर

रूह दिवाल तोड़कर 

विधवा जैसे लाज समेटे
घूंघट में जी गई जिंदगी
खाक अतीत जवानी
थकन छांव से सकुच  निहारे !

महक छोड़ उड़ गई न जाने
सांस चिरैयां
प्रेम विहीन हुईं निरमोही
लावारिस सपनों की खैरात
भविष्य की गणना सगुन विचारे !

खुले केश औंधती
सीप सी पलकें
झर झर अंसुआ खालिश
खरी खोट की सावन झड़ियां
झरे बिरौनी
बुझी बुझी है ओंठ की लाली,
रंगविहीन सफेद घूँघटा
पहचान निरीह
प्रतीक अमंगलकारी
पीड़ा परियाय उंगलियां
मिश्री ओठ
निगाह साध बाघ मतवाली,

चली चाल नातेदारी रिश्तों के
बिम्ब बदलते रहे युगों से
कभी किया न पूंछ परख 
कितने सच्चे हैं
खरबूज छुरी के गुनतारे !

जिया झूठ उधारी बलभर
खाया पिया सुकून विलासी
खौले खून देह जश्न को
निबल निरीह
टेंटुआ
जैसा चाहा वैसा खूब मरोड़ा,
गांव की
बेबा बेटी बहन बनी न
निर्लज्ज आंख की
नजर निहारें तौलें तन
रंगीन लबादे का
कोढ़ चुये भीतर से थोड़ा थोड़ा,

टटिया पेल घनी बौछार
उमड़ती बाढ़ की धार
दिवार की मिट्टी चियां चियां
थर घोले बेबस नीव
लाज छांव कस हालात सम्हारे !

इतिहास का साक्ष्य
समझ में आया
तन अधम अधोगति
जिया हमेशा देवी दुर्गा
काली के काटे भी
जरासंध सा उठ होता रहा खड़ा,
सुमति रही होती यदि गाडर में
मृत्यु परे
क्या हिम्मत होती साउज की
भीड़ चीर खा जाता
अपने नाम किये
भय का तमगा बहुत बड़ा,

जागो उठो दौड़ चलो
परिवर्तन के पथ पर जिये न कोई
अनभल आँचर खिल्ली तंगहाल
टिमटिमी के जैसे
जब चाहे तब फूंके बारे !

भोलानाथ

Tuesday, 19 October 2021

अखर गया बिजली का गुल होना

अखर गया 

बिजली का गुल होना
लिथड़े रहे पसीने से
जैसे घाट गुजरिया का
जल कलश मूंड में फूटा !

बहुतेरी कोशिश विफल हुई
जुड़ सके न
सांझ कलम से
भरी अलाप कंठ की
काव्य पाठ का पहला मौका छूटा !

भौहें खिंची कमान हुईं
रौनक मुह की उतरी
पुलक हृदय की हुई नदारद
हतप्रभ रहे देखते
साख सिराने
शहद की शीशी जैसे फूटी,
बेंडहा बैल समय बन आया
औचक घात भाव
वैभव विक्षोभ के कोडों की
असह वेदना से 
कराह कर
करवट करवट नींद रात की टूटी,

नाक कटी पगरैत तमाशा
बाजा वालों की अगुआई
बुझे बुझे बाराती
जैसे
महुआ मोगरी का कूटा !

चूक मामूली बात बड़ी थी
भरा रहा विस्वास लबालब
संभावित विघ्न का कोई
विकल्प न खोजा
साधनहीन चले
कूबत का करतब दिखलाने,
औचक आई आंधी में
उड़ गई छतरियां
भीगा विग लथपथ
चिकनी चांद के गंजेपन में
रह रह उठती खुजली
उंगली करती रही बहाने,

हूँकी हामी किचिर पिचिर
भीतर की समझ न आये
बेचैन हृदय का
उठता बड़ा बबाल
सुकून जहन का लूटा !

गाते अनुभव अपने
थके नहीं
रहे खोलते गांठ रूढ़ियों की
गोरखधंधा सांठगांठ
बतलबरी के
चढ़े नहीं सोपान सीढियां,
पछतावे की युद्धभूमि में
लड़ रहे निहत्थे
आज स्वम् से
अर्जित ज्ञान ग्रंथि का
सूरज अंधियारे में डूबा
राहगीर सी लगी पीढियां,

आज अकेलेपन का
अहसास हुआ
अवकात हमारी
हमको समझ में आई
भ्रामक भ्रम विवेक का टूटा !

भोलानाथ

Saturday, 16 October 2021

कुछ दूर तक तुम मेरे साथ हो प्रिये

कुछ दूर तक 

तुम मेरे साथ हो प्रिये 

और रिश्तों के रागी बिखरे पड़े हैं !

सहेजा समेटा 

बहुत इन हाथों से अपने 

कंधों के ढोये जिद पर अड़े हैं ! 

समझाऊं कैसे

रटाऊ तोते के जैसे

खोखल के बाहर 

गुलेलों की शातिर निगाहें

बन कर चुनौती खड़ी हैं,

बचने बचाने को इनसे 

कोई गुरुकुल नहीं है 

जुगत शेष रहने की 

अनगिन विधाएँ

जहन में जंग खाती पड़ी हैं,

तुम ही कहो 

गुर कुछ सीखें प्रिये 

अभी नरम टांठ माटी के कच्चे घड़े हैं ! 

तुलसी सुमति का संज्ञान 

रट कर 

आचरण को अपने भिगोयें

भेंट पायी पुरखों के हाथों 

छलकती गंगाजली से,

विद्रोही उमर के ज्वाला मुखी को 

पहिना कर सिंगौटी 

सांड़ों सा साधें 

फिर 

वाणी का अमृत ढारें गली से,

पनघट परिंदों सा चहकें

धूप छाँव 

बरखा के भींजे हम भी खड़े हैं ! 

समझौते समय से हमने किये 

रूठे न खीझे किसी से 

ख्वाहिश की 

आगी में जब तब 

उपलों के जैसे सुलगते रहे हैं, 

न जिद की माँ से 

न बाबू को चिंतित किया है

बह निकले पानी सा 

दशा दिशा तय की काट काट चट्टाने 

नदिया के माफिक बहे हैं,

हिलाई न चौखट कभी 

न तोड़े दरवाजे 

जैसे थे वैसे घुये गहरे गड़े हैं !


भोलानाथ

Friday, 15 October 2021

आखिर मूस घूस सा घुस गया

आखिर मूस घूस सा 

घुस गया
यहां भी
जहर जाति का
पंथ समूहों में बंट
कब तक और नकारोगे!

मलयागिरि रहबासी
भील के
बाड़े रोपा चंदन
जहन बिलोय
महकती लकड़ी
अपने चूल्हे बारोगे!

मूंछ मरोड़ का
समय रहा
न शिकार की आजादी
पूंछ हिलाना
भूल गये
हिरनी के शावक
उंची उंची भरें कुलांचें,
एक जमात एक पंथ के
इतिहासों का
न्याय नहीं
कुटिल इरादों के
व्यापक
षड्यंत्रों का
उजला चिट्ठा बांचें,

भीगी बिल्ली
धूप सेंक
चढ़ गई सिकहरे
जंग लगे
हंथियारों से कैसे
मूंछ के बाल उखारोगे !

चढ़े खराद खुरों सा
उपज रहेआक्रोश
परिधि में
शकुनि वाली चाल
द्रोण दक्षिणा
के गुर
कुछ काम नहीं आएंगे,
अधिकार हनन के
घन का दस्ता टूटा
खीला पचरा मार
जोड़ की
झूठ कवायत
सरगर्मी
पचड़े कितना भरमायेंगे,

साहस नहीं यह
अनुचित जिद की
अड़ी में
नाहक कंधे उचकाये
मगजमार की
शिला लिलारों फोरोगे!

कहना मान छोड़
यह सर्पिल पगडंडी
खींच लकीर नई
सीधी सड़क की दौड़
सभी के
साथ दौड़ कर
साबित कर अपनी गति,
चलन के बाहर की
चिल्हर खनकाकर
धन की
डींग डुगडुगी बजा कर
और हांक न
फाड़ बही चुकता कर
पिछली बिकटअति,

उधर रहीं
परतें पालिश की
हिम्मत बटोर
स्वयं साफ कर 
यह चिन्दी चिन्दी
पपड़ी कब तक टोरोगे !

भोलानाथ

Thursday, 14 October 2021

खोज रहा हूँ शहर शहर

खोज रहा हूँ शहर शहर 

अपने बचपन की 

स्मृतियों का 

वह 

सुघर सलोना हिंदुस्तान ! 


हियोतता 

वह जोत की सरगम 

दांय गडायन

गांव के बाहर 

गोबर लिपे सजे खलिहान ! 


पगडंडी ढर्रों की गौधूलि 

माटी गंध 

गौंखरिया बाड़ा 

बाहर के दालान बैठका 

कंकरीट ने 

चील के जैसे डैनों दाबा,

बाजार दुकानों ने 

घेरा घर 

हांक दिया गौवों की रेवड़ 

रहीं न आंगन रकर कुलांचें 

नकली 

दूध की धार मिलावट मावा, 


घुंघरू घन्टे 

वाले बैलों की 

रुनझुन 

सींग सिंगौटी 

रंगों रंगी कंधौरे शान! 


सुबह सुनहरी धूप 

साँझ रंगीन छटाएं 

हारिल सुआ नीलकंठ की 

आवाजाही बिहग बसेरा 

कलरव जैसे 

हल्दी अवसर के सहगान,

तरह तरह के फसलों वाले 

खेतों की हो रही तरक्की 

उपज विलक्षण 

उत्पाद में बदली

रही न अब जोहड़ 

कस्बे की पिछली पहचान, 


धुआं उगलती 

फैक्ट्रियों के 

हेम कशीदों में 

पकड़ के छाती 

खांस रहा है किसान ! 


देखासिखी अमल से 

बढ़ी जरूरत 

चरम विलास की आपाधापी 

सुध बुध मर्म भूमि का भूली 

देशधरम ढर्रों का 

नहीं कुछ ख्याल किया,

बढ़े पाँव पर पांव

प्रच्छाली 

चादर रही सिकुड़ती 

खींचतान अजमाईस 

फ़टी छोर का चिथड़ा चिथड़ा 

जाता नहीं अब और सिया, 


कहाँ मिलेगी 

मेड पलाशी 

छांव गंध गुड़ घी की 

होने लगे 

गांव शहरी मेहमान! 


भोलानाथ

Monday, 11 October 2021

सुचिता सरलता

सुचिता सरलता 

बोलों कुबोलों से
जब तब
हमने सुना है कलम बोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

संदर्भित सुभीता
सुख सार
दुख छल मसौदों के
बड़े बड़े राज खोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

कई कई रातों के
ख्वाबों कुख्वाबों
मंगल
अमंगल के
गहरे रहस्यों में जाके,
लिपे पुते चेहरों की
परतों के पाप पुण्य
पीड़ा
अनबूझ हैसियत की
कैफियत गिना के,

उल्टी सीधी
युग्मी हवाओं के
रुप रंग 
सरेआम हाट बाट तोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

मुह देख बीड़ा
पोंद देख पीढ़ा
की कथनी नकार
निहित स्वार्थ की
गठान खोल खबर लिखे,
चिकनी चुपड़ी
लीकों के बाहर
अंधेरों के गांव में
हाथों की
जलती मशाल दिखे,

दूध की दोहनियों में
स्याट लय
घिनौचियों में
सुधा सार घोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

ताजो तख्त
सल्तनत की मिली भगत
माठा मथानी के
मलिन स्वांग सदा
हवा में उछाले,
व्यवस्था के
गंधाते आचरण को
वस्त्रों सा
फीच फीच
धार में समय के प्रच्छाले,

प्रतिरक्षा की
ख्वाहिशों में
नदियों की
धार धार नौका सी डोलती है !
हमने सुना है कलम बोलती है !

भोलानाथ

Wednesday, 6 October 2021

कभी जो अर्जित हुआ नहीं

कभी जो 

अर्जित हुआ नहीं
छूट न जाये
बेगाने भय से
बढ़ी रही धुकधुकी हमारी !

खाया पिया
लगा न जी में
जिया उमर भर
सेतमेत की चिंता
बढ़ती रही बिमारी !

हैरत औचक अचरज में
दिन बीते
रात अतीत की उठाधरी
बुद्धि विवेक के
इस कोठे से उस कोठे के
रेक अलियाँ बनी रही,
कहाँ की घाटी
कहाँ के घोड़े
युद्धभूमि का पता नहीं
कनपथियों की रेवड़ में
चेत चुनौती
उंगली उंगली तनी रही,

जारी जतन
जीवनी जीने की
भिन्न सूत्र से
लड़ते लड़ते
आस्तीनों से हारी !
सिंहासन बत्तीसी की
उड़ती रही पुतलियां
प्रश्नों का
बैताल रहा उलझाये
गिनाता युगों युगों से
दाढ़ी मूछ के बाल,
जद्दोजहद बेनामी मुद्दों की
पान गिलौरी जैसे
गलुओं में दबी रही
पीक स्वाद सी
मजे मजे
दिल धरती रही बबाल,

खाली ख्याल पुलावी
खाली खाली
थाली बरतन जैसे
बजते
मती मौन की मारी !

देखा दंगा
सुना लखीमपुर खेरी का
कौंधी जगी चेतना
जैसे सोते से उठ जागा
लीले मेंड़
खेत नहीं लेय डकारे,
बाहुबली राजा का
सेनापती कसाई
कुचले कार
किसान कमेरे करिन्दे
रोने का अधिकार छीन
सच साक्ष्य को गिन गिन मारे,

बेबात ही
जाया किया समय
सपनों से डर कर
असल जिंदगी का
पल पल जिया उधारी !

भोलानाथ

Monday, 4 October 2021

मेरे मुह में दही जमा है

मेरे मुह में दही जमा है

जब चाहे तब
काट काट के कतरा कतरा
राजा खाये
ले जा तू भी आजा तू भी
लेजा भर भर दोना
काढ़ के माखन घी छांछ बना ले !
आग बहुत है
उंची लपटें दबी कलेजे में
भात पतीला दाल भगौना
अदहन धर
या सेंक रोटियां
फूंक मार बीड़ी सुलगा के
मुह का बीड़ा गांछ बना ले !

लूट मची है गांव इकट्ठा
शहर भौचक्का
मूक बधिर सी सामूहिक सुधबुध
सजग लुटै
घर आंगन गली मोहल्ले
विवस उक्तियाँ
देशधर्म ले डूबा ठाढ़े ठाढ़े,
राजपाट हो गया लुटेरा
राजा लूटे
लूटें करिन्दे
सरेआम बाजार का डाका
पशुवत हांका
प्यासी ओंठ उसेये चेहरे
दिखते तेल के काढ़े काढे,

कभी खत्म न होने वाले
लवण खनिज के
श्रोतों की उद्गम
इस जरजर देह की
अस्थि पंजर पुर्जों को
अपने तृष्णाओं के तरकश
तीर सी भौहें बांछ बना ले !

दर्द कराहों का कितना भी
कुआं जिऊँ मैं
मुह उतरे या देह ढले
जनम जनम से
मेरे अर्थों का पुतला
पलक मुट्ठियां जबड़ा भींचे
मुझमे जीवित रहा सदा,
आईं गईं पीढियां कितनी
बिगुल क्रांति के हाथी हौदे
फूंक पाँव में दबी रही
धूप जेठ कसमसी क्वांर की
पीठ घमोरी
चिलक
चेतना चमकी यदा कदा,

मन की कलप तड़प दिन दूना
अंध आंधियों जैसे
बढ़ती ऊब उबासी
कुंठाओं की गहरी खाई
रह रह उगले
कुबेर खजाना
बसनी बांध लपेटा काँछ बना ले !

कहन कहावत की कथरी का
ओढ़ लबादा
जी रही बेहोशी
फतबों के अल्फाज सुने न
अखबारी ऐलानों की
डुगडुगी के आगे
जख्मों की पीड़ा दर्ज कराये,
जब तक चली चलाई
टूट बिखर कर खूब चलाया
जिया खांड़ सा
उठ बटोर अब
खुद में खुद को सहेज बाँह बल
फेंक हांथ का भारी भरकम
भाला देख जहां तक जाये,

अहसास और न हरदम
ऐसे बौरे रहने की मजबूरी
अब बदल व्यवस्था
पहचान मंत्र
यह प्रजातंत्र का
खर पतवार गुल्म गांछ
दुनियादारी के चांछ बना ले !

भोलानाथ




Saturday, 2 October 2021

भोली प्रजा

भोली प्रजा बेधर्म राज के 

क्रिया कलापों पर
गूंगी बहिर प्रलापी
विपदाओं के
अवतरण द्वार पर कैसे
भारी भरकम शिला चढायें !

नंगा नाच मौत के किस्से
किये गये दुष्कर्मों के
पाप पुण्य का लेखा जोखा
जैसे हतप्रभ बाली को
किरदार
राम के अंतिम पाठ पढ़ायें !

विपरीत प्रकृति के
जब कदम उठाये
भोगे नहीं प्रजा
निर्वाह करे कर्तव्यों का
बेदखल
सिंहासन घोषित करदे
राजधर्म का धर्म निभाये,
नुक्कड़ नुक्कड़ नहीं गिनाये
होती हिंसा हत्याओं की
थाना चौकी
रपट लिखी दुसवार सूचियां
नगर दरोगा
जन गण
मन का विस्वास जगाये,

लगा बुझाई लांच की
आंच से बाहर
धार तेल की देखे
आगी अंगरे न्याय के चूल्हे 
भेदभाव के ख्याल
खलल न खौले चढ़ी कढ़ायें !

गली तिराहे
तिरका तीन चौगड्डे
पर्व प्रबंधन के
प्रस्तावित नक्शे
खींच सके न अलग से रेखा
दहशत हिंसा हत्या
हातिमताई अदहरा,
मौके पर मौके
खोज रही जो भीड़ भाड़ की
चूक फिदाईन
जहन बताशा
हूर बहत्तर गांठ गडाइन
जिमजिम पानी
पीर फकीरों का पहरा,

भूत प्रेत नहीं
वे मरघट के
जीते जी पाले जिन्नों के
जीवित जिगर जिनाउर
आतंकी आकाओं के
मनुहार मरें बेहिचक अढ़ाये!

फीच फीच परदनी के जैसे
घाटों धांधर नहीं निचोयें
ढोरे पानी
धान पान खीरा थर 
अर्चन
तुलसी चौरा
दिया सहारा जले रात भर,
सिंहासन की
अर्दली त्याग कर
क्षितिज का सूरज
देता रहे प्रकाश
अंधियारों की चिकनी चुपड़ी
सुने नहीं
न हो विचलित बगदरी बात पर,

झूठ खरीदे
बिके नहीं आस्था
जयकार जुलूसों के भीतर
चीख न बूडे
फिरें न जुलमी द्वारे द्वारे
भगवा चेहरे फ्रेम मढ़ाये !

भोलानाथ

चलते चलते अजाने सफर में

चलते चलते अजाने सफर के हारे थके लड़खड़ाने लगे हैं समतल सतह के खुरदरिया पांव! मंजिल का कोई ठिकाना पता न झुकी रीढ़ के बोझ पर बोझ धरती रही ...